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चाबहार पर संकट: प्रतिबंध से भारत की रणनीति डगमगाई

राहुल लाल, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार
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टैरिफ समस्या को सुलझाने की कोशिशों के बीच अमेरिका ने भारत को एक और झटका दे दिया है। अमेरिका ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में काम करने के लिए प्रतिबंधों में दी गई छूट को समाप्त करने का फैसला लिया है। यह फैसला 29 सितंबर से लागू होगा। अमेरिका के इस निर्णय से भारत का चाबहार में 120 मिलियन डॉलर का निवेश और पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान व मध्य एशिया तक पहुंचाने की उसकी कोशिश खतरे में पड़ गई है। ट्रंप के इस फैसले से भारत की पहली विदेशी बंदरगाह परियोजना पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

ट्रंप के प्रथम कार्यकाल 2018 में ‘ईरान फ्रीडम एंड काउंटर प्रॉलिफरेशन एक्ट (आईएफसीए)’ के तहत दी गई यह छूट भारत को चाबहार बंदरगाह को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए एक प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने की अनुमति देती थी। ट्रंप प्रशासन की ‘ईरान पर अधिकतम दबाव’ डालने की नीति के तहत यह कदम पश्चिम और मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक और आर्थिक महत्त्वाकांक्षाओं को बाधित कर सकता है। यह निर्णय सीधे तौर पर भारत की सरकारी कंपनी ‘इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल)’ को प्रभावित करता है, जो 2018 से बंदरगाह पर शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का प्रबंधन कर रही है।

1947 में देश के विभाजन के बाद संपूर्ण मध्यपूर्व, मध्य एशिया और यूरोप से भारत भौगोलिक तौर पर दूर हो गया, जिसे पाटने में चाबहार की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के कारण चाबहार पोर्ट भारत के लिए अहम है। ग्वादर पोर्ट ‘चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी)’ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पाकिस्तान स्थित ग्वादर पोर्ट के जरिए चीन भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। चीन को लगता है कि वह ग्वादर के जरिए यूरोप के देशों तक भारत की पहुंच को रोकने में कामयाब रहेगा, लेकिन ईरान में चाबहार के जरिए भारत ने चीनी मंशा को मुंहतोड़ जवाब दिया है। चाबहार पोर्ट से ग्वादर पोर्ट की समुद्री दूरी 100 किमी से भी कम है। ईरान और चीन के बीच वर्ष 2020 में 400 बिलियन डॉलर की महत्त्वाकांक्षी डील हुई थी, जिसके अंतर्गत ईरान चीन को बेहद सस्ते मूल्य पर गैस और तेल की आपूर्ति करता है और बदले में चीन ईरान में निवेश करता है। वर्ष 2018 में अमेरिका एकतरफ़ा रूप से ईरान के साथ न्यूक्लियर डील से बाहर हो गया था। अप्रैल 2019 में ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया कि भारत-ईरान से तेल नहीं खरीदे और भारत ने मई 2019 से ईरान से तेल खरीदना पूर्णत: बंद कर दिया। ईरान से तेल आयात करने वाले देशों में भारत, चीन के बाद दूसरे स्थान पर था।

ईरान भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर से बेहद कम दर पर तेल दे रहा था। ईरानी तेल गुणवत्ता की दृष्टि से दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वहीं दूसरी ओर चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज करते हुए ईरान से दुनिया का सबसे सस्ता तेल जमकर खरीदा और अपनी ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत की। लेकिन भारत ने ट्रंप के प्रतिबंधों का पालन करते हुए ईरान से तेल का आयात पूर्णत: बंद कर दिया और लगातार नुकसान उठाया। अंततः ट्रंप की ईरान पर अधिकतम दबाव की रणनीति का लाभ चीन को ही मिलता दिख रहा है। अगर भारत ने जल्द ही इस मामले का कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकाला, तो चाबहार का संपूर्ण प्रोजेक्ट भारत से निकलकर चीन के हाथ जा सकता है। बीजिंग खाड़ी देशों में जहां 'अमेरिका विरोधी ईरान' से घनिष्ठ संबंध बना रहा है, वहीं अमेरिका के परंपरागत मित्र सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी कॉम्प्रिहेंसिव पार्टनरशिप पर लगातार वार्ता कर रहा है। चीन इस क्षेत्र में अमेरिका और रूस की तरह उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका किस हद तक प्रतिबंध लगाएगा? क्या प्रतिबंध केवल कुछ कंपनियों के खिलाफ होंगे या व्यापक आर्थिक व वित्तीय संस्थाएं भी प्रभावित होंगी।

भारत को अमेरिका के साथ वार्ता में स्पष्ट करना होगा कि चाबहार प्रोजेक्ट भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं में क्यों है तथा उसका उद्देश्य क्या है? अमेरिका के इस कदम से भारत को साझेदारी की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाने होंगे। भारत को ईरान से भी चर्चा करनी होगी कि वह कौन-से तरीक़े अपनाता है, जिससे प्रतिबंधों का जोखिम कम हो। भारत के लिए आवश्यक है कि वह ‘चाबहार’ को अमेरिका एवं चीन की जटिल कूटनीति से बाहर रखे, क्योंकि यदि चीन चाबहार पोर्ट को अपने प्रभाव में लेगा तो न सिर्फ भारत की कनेक्टिविटी प्रभावित होगी, अपितु ऊर्जा सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह वाशिंगटन के साथ सीधे टकराव से बचते हुए चाबहार कैसे बचाए। ताज़ा प्रतिबंधों के साथ भारत के विदेशी पोर्ट का भविष्य अधर में है।