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कामकाजी महिलाओं के बारे में बदलें सोच

- महिलाओं को कामकाज के बराबर अवसर देने के मामले में हम 55 देशों की सूची में 52वें नंबर पर हैं।

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कामकाजी महिलाओं के बारे में बदलें सोच

कामकाजी महिलाओं के बारे में बदलें सोच

देश में 37 फीसदी कामकाजी महिलाओं को आम पुरुष कर्मचारियों के मुकाबले कम तनख्वाह मिलती है। इस तथ्य पर भी गौर करना होगा कि महिलाओं को कामकाज के बराबर अवसर देने के मामले में हम 55 देशों की सूची में 52वें नंबर पर हैं। इस सूची में न्यूजीलैंड पहले नंबर पर और अमरीका जैसा विकसित देश चौथे नंबर पर है। हमारा पड़ोसी चीन भी 29वें नंबर पर है। दरअसल, ये आंकड़े हमें खुद से सवाल पूछने के लिए प्रेरित करते हैं कि आखिर हम कौन सी दुनिया अपने आस-पास बुन रहे हैं। क्या हम अब भी लैंगिक भेदभाव से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं? क्या हमें अब भी महिलाएं कमतर दिखाई देती हैं?

खासकर ऐसे वक्त में, जब हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले बेहतर काम करने की हिम्मत दिखा रही हैं और परिणाम देने की कोशिश कर रही हैं। लिंक्डइन के एक सर्वे के मुताबिक, अब भी कार्यस्थलों पर कामकाजी महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है। महिलाएं पुरुषों के बराबर तनख्वाह के लिए भी संघर्ष कर रही हैं। यहां तक कि पदोन्नति में भी उनके साथ भेदभाव हो रहा है। हम महिलाओं को पुरुषों के बराबर खड़ा करने की वकालत तो करते हैं, लेकिन हकीकत में ऐसा हो नहीं पा रहा। इस विषय पर बहस हो सकती है और तर्क-वितर्क भी आएंगे, लेकिन अगर कुछ नहीं आता है तो सिर्फ समाधान। अब भी सवाल यही है कि आखिर कैसे कार्यस्थलों पर महिलाओं को बराबर का सम्मान और हक मिले? यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि कामकाजी महिलाओं को दोहरी भूमिका निभानी होती है। उन पर घर की जिम्मेदारी के साथ अपने कामकाज की भी जिम्मेदारी होती है।

इसके बावजूद उन्होंने हमेशा बेहतर परिणाम देने की कोशिश की है। इसलिए कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव से रहित माहौल बनाने की कोशिश आवश्यक है। कार्य विभाजन से लेकर दूसरी जिम्मेदारियों में लैंगिक नजरिए से बंटवारा नहीं होना चाहिए। काम का आकलन परिणाम पर आधारित होना चाहिए, न कि लैंगिक आधार पर। यह वक्त सोच बदलने का है और नियोक्ता से ज्यादा सोच बदलने की जरूरत है सहकर्मियों को। महिलाएं चाहे जिस भी क्षेत्र में कार्य कर रही हों, उनके काम को कम आंकने की मानसिकता खत्म करनी होगी। सहकर्मियों का एक वर्ग ऐसा भी है जो महिला सहकर्मियों के प्रति सद्भावना तो रखता है, लेकिन उन्हें कमजोर मानता है। मात्र सद्भावना रखने से काम नहीं चलने वाला, बल्कि उनका मजबूती से साथ देना भी आवश्यक है।