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Patrika Opinion: नौकरशाहों की दलीय निष्ठा पर अंकुश जरूरी

सरकार चाहे किसी भी दल की हो, सत्ता में बदलाव के साथ ही नौकरशाही में फेरबदल की प्रक्रिया भी साफ बताती है कि अहम पदों पर पदस्थापन भी दलीय निष्ठा को देखकर होने लगा है। सेवा में रहते हुए कई नौकरशाह तो किसी राजनेता की तरह ही बर्ताव करने लगते हैं।

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Patrika Desk

May 03, 2022

प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

सुप्रीम कोर्ट ने नौकरशाहों के लिए राजनीतिक तटस्थता की अनिवार्यता की बात कहते हुए सेवानिवृत्ति के बाद अथवा इस्तीफा देकर राजनीति में आने वाले नौकरशाहों के लिए 'कूलिंग ऑफ पीरियड' लगाने से इनकार कर दिया है। 'कूलिंग ऑफ पीरियड' का आशय उस व्यवस्था से है जिसमें एक तय अवधि के बाद ही ऐसे लोग राजनीति से नाता जोड़ सकें। न केवल नौकरशाह बल्कि आज के दौर में तो न्यायपालिका तक से जुड़ाव रखने वालों को सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद अहम पदों पर नियुक्तियां मिलने लगी हैं। यह सवाल भी कोई आज का नहीं, बल्कि बरसों से उठता रहा है। खास तौर पर चुनावों के मौके पर राजनीतिक दल जब नौकरशाहों को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद टिकट देते हैं तो यह बहस फिर शुरू हो जाती है।

क्या 'कूलिंग ऑफ पीरियड' तय किए बिना ऐसी परिपाटी को उचित ठहराया जा सकता है? यह सवाल इसलिए भी उठता है ताकि देश के नौकरशाहों पर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि के रूप में काम करने के आरोप नहीं लग सकें। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, सत्ता में बदलाव के साथ ही नौकरशाही में फेरबदल की प्रक्रिया भी साफ बताती है कि अहम पदों पर पदस्थापन भी दलीय निष्ठा को देखकर होने लगा है। सेवा में रहते हुए कई नौकरशाह तो किसी राजनेता की तरह ही बर्ताव करने लगते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव लड़ना जिस तरह से किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है उसी तरह उम्मीदवार तय करने का अधिकार राजनीतिक पार्टियों को भी है। लेकिन जब सरकारी सेवा से निवृत्त होकर या बीच में ही इस्तीफा देकर कोई नौकरशाह अचानक से किसी दल के साथ बतौर उम्मीदवार सामने आता है तो उसके कार्यकाल को लेकर भी राजनीतिक दल से प्रभावित होने का संदेह उठ खड़ा होता है। 'कूलिंग ऑफ पीरियड' का कानून बनाने का जिम्मा सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका पर छोड़ दिया है। यानी कानून बने तब जाकर ही चुनाव प्रक्रिया में सुधार का नया दौर शुरू हो सकता है। चुनाव आयोग तक 'कूलिंग ऑफ पीरियड' तय करने का पक्षधर रहा है लेकिन महज सुझावों से बात नहीं बनने वाली।

कोई एक दशक पहले भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली ने तो जजों के लिए भी 'कूलिंग ऑफ पीरियड' की वकालत की थी। उनका कहना था कि सेवानिवृत्ति पूर्व किए गए फैसले सेवानिवृत्ति बाद मिलने वाले पद की चाहत से प्रभावित होते हैं। राजनीतिक तटस्थता की सुप्रीम कोर्ट की नसीहत अपनी जगह सही है लेकिन कोई तटस्थ क्यों कर रहेगा जब उसे सियासी भविष्य 'निष्ठाओं' में ही नजर आता होगा। नौकरशाहों की ऐसी दलीय निष्ठा पर अंकुश जरूरी है।