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बीआरआइ से इटली के अलग होने से चीन को लगा झटका

बीआरआइ परियोजनाओं के नाम पर चीन द्वारा विकासशील देशों में सैन्य अड्डे बनाने की खबरें भी आती रही हैं। बहरहाल, इटली का ऐतिहासिक निर्णय न केवल पश्चिमी देशों से उसके संबंधों को बेहतर बनाएगा, बल्कि कई अन्य देशों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

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Gyan Chand Patni

Dec 14, 2023

बीआरआइ से इटली के अलग होने से चीन को लगा झटका

बीआरआइ से इटली के अलग होने से चीन को लगा झटका

बीआरआइ से इटली के अलग होने से चीन को लगा झटका

विनय कौड़ा

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ

जद्दोजहद के बाद आखिरकार इटली बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) से पूरी तरह अलग हो ही गया। निश्चित रूप से यह भारत के लिए अच्छी खबर है जो हमेशा चीन की इस महत्त्वाकांक्षी भू-राजनीतिक परियोजना की आलोचना करता रहा है। भारत के विरोध का सबसे बड़ा कारण यह है कि बीआरआइ की अनेक परियोजनाएं पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरती हैं। यही नहीं, भारत और अमरीका दोनों ने कई देशों को निरंतर चेताया है कि बीआरआइ चीन की 'ऋण-जाल कूटनीति' का एक हिस्सा मात्र है जिसके जरिए चीन उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के संसाधनों पर कब्जा जमाना चाहता है।

बीआरआइ परियोजनाओं के नाम पर चीन द्वारा विकासशील देशों में सैन्य अड्डे बनाने की खबरें भी आती रही हैं। बहरहाल, इटली का ऐतिहासिक निर्णय न केवल पश्चिमी देशों से उसके संबंधों को बेहतर बनाएगा, बल्कि कई अन्य देशों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इटली का बीआरआइ से अलग होना चीन की वैश्विक छवि और उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग की राजनीतिक प्रतिष्ठा के लिए एक बड़ा आघात है। इटली का यह निर्णय यूरोप और चीन के बीच राजनीतिक विश्वास में कमी का प्रतीक माना जा सकता है। चूंकि पश्चिमी दुनिया और चीन के बीच विश्वास में तेजी से गिरावट आ रही है, ऐसे में भारत उन पश्चिमी देशों के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित करके लाभ उठा सकता है। आज भारत और इटली के बीच व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे अनेक मुद्दों को लेकर नजदीकियां बढ़ रही हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार दो वर्षों में दोगुना से अधिक हो गया है, जो 2022 तक रेकॉर्ड 15 बिलियन यूरो तक पहुंच गया है। दरअसल बीआरआइ छोडऩे का इटली का फैसला नाकाम उम्मीदों की अभिव्यक्ति है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की प्रतिबद्धता पर भी आधारित है।

पिछले कुछ महीनों से इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि इटली की पिछली सरकार का बीआरआइ में शामिल होने का फैसला गलत था और अब बीआरआइ में इटली की दिलचस्पी खत्म हो चुकी है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मेलोनी ने जिनजियांग प्रांत में जातीय अल्पसंख्यकों के साथ दुव्र्यवहार और कोविड-19 महामारी के घोर कुप्रबंधन के लिए चीन की आलोचना करने का साहस दिखाया है। उन्होंने चीन को ताइवान पर किसी भी संभावित हमले के जोखिम के बारे में भी चेतावनी दी है। लेकिन चीन को आखिर तक यह उम्मीद थी कि इटली बीआरआइ से पूरी तरह से हटने की बजाय उसकी कुछ परियोजनाओं को ही रद्द करेगा। लेकिन इटली के साहसिक फैसले से चीन हैरान-परेशान नजर आ रहा है। हालांकि मेलोनी ने यह कहा है कि इस कदम के बावजूद उनकी सरकार चीन के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहती है। बीआरआइ से इटली का बाहर निकलना और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ मेलोनी की मित्रता यूरोप में भारत की विदेश नीति की सफलता का संकेत माना जाना चाहिए। हाल ही में दुबई में आयोजित कॉप-28 वार्ता के दौरान मेलोनी ने मोदी के साथ अपनी एक सेल्फी सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी, जिसने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। कई बरसों की असहमति के बाद भारत-इटली संबंध एक नई ऊंचाई पर हैं। इटली, हिंद-प्रशांत क्षेत्र और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने का इच्छुक है।