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चंद्रकांता संतति की तिलस्मी दुनिया संजोए है चुनार का किला

बताया जाता है कि चुनार किले का इतिहास महाभारत काल से भी पुराना है। सम्राट काल्यवन, उज्जैन के प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य, पृथ्वीराज चौहान से लेकर इस पर सम्राट अकबर और शेरसाह सूरी जैसे शासकों ने शासन किया। चुनारगढ़ के निर्माण को लेकर बहुत सारे संशय और संदेह हैं। वास्तव में इसका निर्माण किस शासक ने कराया है, इसका कोई प्रमाण नहीं है।

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Patrika Desk

Dec 28, 2022

चुनारगढ़

चुनारगढ़

संजय शेफर्ड
ट्रैवल राइटर और ब्लॉगर
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इस बार की यात्रा वाराणसी यानी न्यू काशी की थी। न्यू काशी इसलिए क्योंकि यह पुरानी काशी का नया रूप-रंग और कलेवर प्रस्तुत करती है। इसलिए अपना बैकपैक लिया और बस निकल पड़ा। बनारस के घाट, गंगा आरती, पतली गालियां, हथकरघा उद्योग, सारनाथ और काशी विश्वनाथ मंदिर घूमने के दो-तीन दिन बाद समझ में आया कि अब थोड़ा ऑफबीट जाना चाहिए और सुबह जल्दी ही निकल पड़ा नौगढ़, विजयगढ़ और चुनार किले यानी कि देवकीनंदन खत्री की रची चंद्रकांता की दुनिया में।

सबसे पहले वाराणसी से चलकर चुनार किले में पहुंचा जो कि मिर्जापुर जिले में आता है। इस किले को देखकर ही समझ में आ गया कि चंद्रकांता की इस नगरी से इतिहास के पन्नों में स्थान बनाने वाले चंदौली के चकिया तहसील क्षेत्र में रहस्य ही रहस्य दबे पड़े हैं। साथ में कुछ और लोग भी थे, सभी देवकीनंदन खत्री की रचना ‘चंद्रकांता संतति’ की रहस्यमयी वादियों के तमाम स्थलों पर जाने को बेताब दिख रहे थे।

हमने अपने घूमने का सबसे पहला स्थान चुनार किला चुना, फिर सोचा औरवाटांड़ जलप्रपात जाएंगे और फिर वापसी में राजदरी-देवदरी जलप्रपात। इस तरह मिर्जापुर की सीमा में पहुंचने के बाद चुनार किले के दीदार करने पहुंच गए। बताया जाता है कि चुनार किले का इतिहास महाभारत काल से भी पुराना है। सम्राट काल्यवन, उज्जैन के प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य, पृथ्वीराज चौहान से लेकर इस पर सम्राट अकबर और शेरसाह सूरी जैसे शासकों ने शासन किया। चुनारगढ़ के निर्माण को लेकर बहुत सारे संशय और संदेह हैं। वास्तव में इसका निर्माण किस शासक ने कराया है, इसका कोई प्रमाण नहीं है।

कुछ ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि इस पहाड़ी पर महाभारत काल में सम्राट काल्यवन का कारागार था। फिर सम्राट विक्रमादित्य का समय आया। कहा जाता है कि विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भर्तृहरि राजपाट का त्याग करके संन्यासी हो गए थे। गुरु गोरखनाथ से ज्ञान लेने के बाद वह चुनारगढ़ आए और तपस्या करने लगे। एक मान्यता है कि तब यहां घना जंगल होने के कारण जंगली जानवरों का खतरा बहुत ज्यादा था, इसलिए सम्राट विक्रमादित्य ने उनकी रक्षा के लिए इस जगह का जीर्णोद्धार करा किले का निर्माण कराया।

यात्रा के दौरान हम राजा भर्तृहरि समाधि स्थल, सोनवा मंडप और कुछ गहरी व रहस्यमयी सुरंगों तक ही पहुंच पाए। यह सब कुछ दूर था पर इसके महत्त्व को कम नहीं आंका जा सकता। फिर आगे हम औरवाटांड़ की तरफ बढ़े।
नौगढ़ कस्बे से कुछ ही दूरी पर है औरवाटांड़ जलप्रपात जो चंदौली जिले के विशेष पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। इस जगह पर कर्मनाशा नदी का सौंदर्य देखते ही बनता है। जलप्रपात के पास खड़े होकर पहाडिय़ों को देखना अद्भुत रोमांच पैदा करता है। पूरा जलप्रपात बड़े पत्थरों से घिरा है जहां रॉक पेंटिंग भी देखी जा सकती हैं। यहां से हम काशी वन्य जीव प्रभाग के चंद्रप्रभा वन्य जीव विहार की ओर बढ़े, जहां राजदरी-देवदरी का मनोहारी जलप्रपात है। इस जगह को देखना मन को प्रफुल्लित कर देता है। इस जगह पर पार्क, झूले, वाचनालय, वॉच टावर, नेचर सेंटर आदि मौजूद हैं। हमारे समूह के सभी सदस्यों ने इस जगह का भरपूर लुत्फ उठाया और महसूस किया कि जब भी वाराणसी घूमने का मौका मिले, आसपास की जगहों की यादें बटोरना बिल्कुल भी नहीं भूला जाए। यह जगह आपको पर्यटन का एक अलग तरह का अनुभव कराएगी।