
-प्रो. हेमंत पारीक
भारत तीव्र शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है। शहरों की बढ़ती आबादी, सीमित भूमि, बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताएं, खाद्य सुरक्षा की चिंता और पर्यावरणीय असंतुलन ने शहरी जीवन को जटिल बना दिया है। ऐसे समय में सतत विकास की अवधारणा केवल एक नीतिगत शब्द न रहकर व्यवहारिक समाधान की मांग करती है। इसी संदर्भ में अर्बन फार्मिंग (शहरी कृषि) और सोलर रूफटॉप प्रणाली का संयोजन भारत के शहरों के लिए एक अत्यंत प्रभावी और व्यावहारिक मॉडल के रूप में उभर रहा है। शहरी कृषि का अर्थ है शहरों के भीतर उपलब्ध सीमित स्थानों- जैसे छत, बालकनी, आंगन, खाली भूखंड और सामुदायिक क्षेत्रों- में खाद्य फसलों, सब्जियों, फलों और औषधीय पौधों की खेती। यह न केवल ताजा और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराती है, बल्कि शहरों को अधिक आत्मनिर्भर और पर्यावरण के अनुकूल बनाती है। वहीं दूसरी ओर, सोलर रूफटॉप प्रणाली स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बनकर उभरी है।
आज भारत के लाखों घरों में छतों पर सोलर पैनल लगाए जा चुके हैं, जिससे बिजली उत्पादन तो हो रहा है, परंतु अधिकांश मामलों में छत का बड़ा भाग अनुपयोगी रह जाता है। यहीं पर शहरी कृषि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सोलर पैनल इस प्रकार लगाए जाते हैं कि उनके नीचे और आसपास पर्याप्त स्थान तथा आंशिक छाया बनी रहती है। यह छायादार क्षेत्र कई प्रकार की सब्जियों और पौधों के लिए अत्यंत उपयुक्त होता है। पालक, धनिया, मेथी, पुदीना, सलाद पत्तियां, अदरक, हल्दी तथा अनेक औषधीय पौधे ऐसी परिस्थितियों में अच्छी तरह पनपते हैं। इस प्रकार सोलर पैनल और शहरी खेती एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं और छत का अधिकतम, बहुउद्देशीय उपयोग संभव हो पाता है। यह संयोजन तापमान संतुलन की दृष्टि से भी लाभकारी है। केवल सोलर पैनल लगी छतें अत्यधिक गर्म हो जाती हैं, जिससे पैनलों की दक्षता कुछ हद तक कम हो सकती है। यदि उसी छत पर हरियाली और पौधे मौजूद हों, तो वाष्पोत्सर्जन के कारण आसपास का तापमान नियंत्रित रहता है। इससे सोलर पैनलों की कार्यक्षमता बेहतर बनी रहती है और उनकी आयु भी बढ़ती है। दूसरी ओर, पैनलों की छाया पौधों को तीव्र गर्मी से बचाती है, जिससे पानी की खपत कम होती है। यह एक प्राकृतिक संतुलन का उदाहरण है, जहां ऊर्जा और कृषि एक-दूसरे को सहयोग प्रदान करते हैं।
शहरी क्षेत्रों में जल संकट एक गंभीर चुनौती है। सोलर रूफटॉप और शहरी कृषि का संयुक्त मॉडल जल प्रबंधन में भी सहायक सिद्ध होता है। सोलर पैनल संरचना से वर्षा जल संचयन को जोड़ा जा सकता है, जिससे बारिश का पानी सीधे पौधों की सिंचाई में उपयोग हो सके। इसके अतिरिक्त, ड्रिप सिंचाई और अन्य सूक्ष्म तकनीकों से कम पानी में खेती संभव है। घरों से निकलने वाले जैविक कचरे से कम्पोस्ट तैयार कर पौधों के लिए खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार यह मॉडल ऊर्जा, जल और कचरे के समन्वित प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण बन जाता है। स्वास्थ्य और सामाजिक दृष्टि से भी यह मॉडल अत्यंत उपयोगी है। घर पर उगी सब्जियां रसायन-मुक्त, ताजा और पोषक होती हैं, जिससे शहरी परिवारों का स्वास्थ्य बेहतर होता है। पौधों के साथ समय बिताना मानसिक तनाव को कम करता है और जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाता है। बच्चों और युवाओं में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है, जो भविष्य की पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक है।
आर्थिक दृष्टि से सोलर रूफटॉप और शहरी कृषि का संयोजन आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है। एक ओर सोलर पैनल बिजली बिल में कमी लाते हैं, वहीं दूसरी ओर घर पर उगा भोजन बाजार पर निर्भरता को कम करता है। अतिरिक्त उत्पादन को स्थानीय स्तर पर बेचकर अतिरिक्त आय भी अर्जित की जा सकती है। यह मॉडल विशेष रूप से मध्यम वर्ग, गृहिणियों और सेवानिवृत्त नागरिकों के लिए अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है। पर्यावरणीय स्तर पर यह व्यवस्था कार्बन उत्सर्जन को कम करने, वायु गुणवत्ता सुधारने और शहरी हीट आइलैंड प्रभाव को घटाने में सहायक है। यदि अधिक से अधिक छतें ऊर्जा-सक्षम और हरित बनें, तो शहरों का पर्यावरणीय संतुलन स्वाभाविक रूप से बेहतर होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शहरी नियोजन, स्मार्ट सिटी मिशन और सरकारी नीतियों में सोलर रूफटॉप और शहरी कृषि को एकीकृत दृष्टिकोण से अपनाया जाए। प्रशिक्षण, प्रोत्साहन और जन-जागरूकता के माध्यम से इसे जन-आंदोलन बनाया जा सकता है। अंतत: अर्बन फार्मिंग और सोलर रूफटॉप का संयुक्त मॉडल केवल संसाधनों के बेहतर उपयोग का समाधान नहीं है, बल्कि यह भारत के शहरों को आत्मनिर्भर, स्वस्थ और सतत बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। यदि इस दिशा में संगठित प्रयास किए जाएं, तो आने वाले समय में शहरी छतें केवल कंक्रीट की सतह नहीं रहेंगी, बल्कि ऊर्जा और हरियाली से भरपूर जीवनदायी केंद्र बन जाएंगी।
Published on:
08 Jan 2026 06:29 pm
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