
जमानत के मामले में स्पष्ट कानूनी व्यवस्था आवश्यक
प्रो. हरबंश दीक्षित
पूर्व डीन, विधि संकाय, एम.जे.पी.रोहिलखंड, विश्वविद्यालय बरेली
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश डी.वाइ. चन्द्रचूड़ ने जमानत के मामलों की सुनवाई में होने वाली देर पर चिंता व्यक्त की है। हाल ही एक कार्यक्रम में देशभर से आए न्यायाधीशों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को स्वतंत्रता से वंचित करना उचित नहीं है। उन्होंने न्यायाधीशों से कहा कि हमें जेल भेजने की बजाय जमानत देने का विकल्प चुनना चाहिए। अभी 25 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एस.के. कौल तथा न्यायाधीश एम.के. सुन्द्रेश की पीठ ने भी इस बात पर चिंता व्यक्त की थी कि कई विचाराधीन कैदी ऐसे हैं, जो पिछले एक दशक से अधिक समय से जेल में बंद हैं और उनकी जमानत अर्जी पर सुनवाई भी नहीं हो पा रही है। कोर्ट ने इस मामले में सरकार और इलाहाबाद उच्च न्यायालय से कहा था कि या तो वे इस तरह के मामलों में निर्णय लें, अन्यथा यह जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट खुद उठा लेगा। जरूरत पडऩे पर ऐसे सभी मामलों के लिए व्यापक आदेश पारित करके सभी को जमानत दे दी जाएगी। भारतीय जेलों में कुल बंदियों की दो तिहाई से अधिक संख्या विचाराधीन कैदियों की है। अभी उनके ऊपर लगे आरोपों के संबंध में अदालत को निर्णय लेना है कि उन्होंने वास्तव में अपराध किया है या नहीं। उनमें से तकरीबन आधे कैदी ऐसे हैं, जो छोटे-मोटे जमानत योग्य अपराधों के आरोपी हैं। कानून के मुताबिक जमानत मिलना उनका अधिकार है, लेकिन जागरूकता के अभाव में या कई बार तकनीकी कारणों से वे लम्बे समय से बगैर दोष साबित हुए जेल में बंद हैं।
जमानत के प्रार्थना पत्र का शीघ्रता से निस्तारण करना संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का हिस्सा है। ऐसे प्रार्थना पत्रों का एक समय सीमा में निस्तारण होना चाहिए और जब तक कि ऐसी परिस्थिति नहीं हो, जिसमें अभियुक्त को छोड़ देने से न्याय पर प्रतिकूल असर पडऩे की सम्भावना हो, तब तक उसे जमानत देने से इनकार नहीं किया जाना चाहिए। मुश्किल यह है कि जमीनी हकीकत इससे अलग है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 में कहा गया है कि जमानती अपराध के अभियुक्त का यह अधिकार है कि उसे जमानत दे दी जाए। यदि वह जमानत भरने को तैयार है, तो वह मुकदमे के किसी भी चरण में जमानत की मांग कर सकता है और उसे जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता। गैर जमानती मामले, जमानती मामलों से अलग होते हैं। उनमें अभियुक्त अधिकार के रूप में जमानत की मांग नहीं कर सकता। इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जमानत नहीं दी जा सकती। कानूनी उपबन्धों के अलावा उच्चतम न्यायालय ने समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करके यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि किसी अभियुक्त के साथ अन्याय न हो। फिर भी ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाती है कि दस से पन्द्रह वर्ष तक भी जमानत की अर्जी पर निर्णय ही नहीं हो पाता।
जमानत की पहली अर्जी जिला अदालतों के सामने आती है। वहां पर अदालतों की व्यावहारिक परेशानियां हंै, जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुछ मामले ऐसे होते हैं, जो मीडिया के माध्यम से तूल पकड़ लेते हैं। अदालतों पर ऐसा दबाव बन जाता है कि न्यायाधीश जमानत देने का जोखिम नहीं उठा पाते। वे तकनीकी रूप से चाहे जितने सही हों, किन्तु समाज उनकी उस अच्छाई को समझने के लिए अब तक परिपक्व नहीं हो पाया है। दूसरी वजह यह है कि उनके ऊपर संभावित जांच का खतरा बना रहता है। न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ निराधार शिकायत करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कई बार जांच की संभावना और सतर्कता विभाग की संभावित जांच भी उनके ऊपर इस तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव तैयार कर देती है कि किसी विवाद से बचने के लिए जमानत से इनकार कर देते हैं।
गैर जमानती मामलों में जमानत देते समय बहुत कुछ अदालत के विवेक पर निर्भर करता है। संवेदनशील न्यायाधीश को न्याय देने के साथ ही अपने करियर और प्रतिष्ठा की चिंता भी रहती है। यही कारण है कि कई बार कोई निर्णय न लेना सबसे सुरक्षित विकल्प होता है। इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए यह जरूरी है कि जमानत देने या इनकार करने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था हो, ताकि अभियुक्त के साथ न्याय हो और न्यायाधीश को अपने करियर को लेकर कोई चिन्ता न रहे। ग्रेट ब्रिटेन, अमरीका, त्रिनिदाद और टोबैगो, बारबडोस, जमैका तथा न्यूजीलैण्ड और श्रीलंका ने जमानत के लिए अलग से कानून बनाया है। इसके अच्छे परिणाम आए हैं।
Published on:
03 Aug 2022 09:11 pm
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