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क्योटो से दुबई तक जलवायु पर्यटन में बदलती जलवायु परिवर्तन की चिंता

कॉप28: अब तक होती रही है नए लक्ष्यों और पुराने संकल्पों को दोहराने की रस्मअदायगी

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Nitin Kumar

Nov 27, 2023

क्योटो से दुबई तक जलवायु पर्यटन में बदलती जलवायु परिवर्तन की चिंता

क्योटो से दुबई तक जलवायु पर्यटन में बदलती जलवायु परिवर्तन की चिंता

डॉ. विवेक एस. अग्रवाल
संचार और शहरी स्वास्थ्य विशेषज्ञ
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आगामी 30 नवम्बर से 12 दिसम्बर तक समूचे विश्व का शीर्ष नेतृत्व दुबई में कॉप-28 (कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज यानी पक्षों के सम्मेलन) के लिए जुटेगा और फिर एक बार जलवायु परिवर्तन से मानवता एवं समस्त जीव जंतुओं को हो रहे नुकसान के बारे में चिंतन करते हुए, आगे की राह के लिए प्रस्ताव पारित करेगा। 1995 में जर्मनी के बर्लिन से शुरू वार्षिक सम्मेलनों के इस सिलसिले में इस बार पिछले सम्मेलनों की अपेक्षा सर्वाधिक सहभागिता की संभावना है।
इस वर्ष के घोषित उद्देश्यों में जलवायु परिवर्तन के प्रकोप को रोकने के लिए संसाधनों की उपलब्धता तथा सुलभता को चर्चाओं का केंद्र माना गया है। साथ ही, जलवायु संक्रमणकाल एवं अनुकूलन पर भी चर्चा होना प्रस्तावित है। सम्मेलन के दौरान उर्जा संक्रमण तथा उसको 2030 तक येन केन प्रकारेण कम करने पर भी चर्चा होगी। इस बार जलवायु परिवर्तन को मात्र राष्ट्रों एवं सम्बद्ध संस्थाओं के विषय तक सीमित न रखते हुए उसके केन्द्र में मानव, जीव एवं आजीविका को रखने का मानस भी है ताकि इस पर समेकित चर्चा हो। ये चर्चाएं कितनी सार्थक होंगी और कितनी धरातल पर उतरेंगी यह तो समय के गर्भ में है, पर इन वार्षिक आयोजनों की सार्थकता और गत 27 वर्षों में हुए गहन चिंतन की परिणति कहीं भी परिलक्षित नहीं होती। जलवायु परिवर्तन के लिए संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क ऑन क्लाइमेट चेंज के तहत आयोजित ‘पक्षों के सम्मेलन’ को लेकर काफी उत्साह रहता है और अपेक्षा की जाती है कि कुछ निर्णायक कदम उठाए जाएंगे और संकल्प पारित होंगे। संकल्प पारित होते भी हैं, पर धरातल पर शीघ्र धराशायी भी हो जाते हैं।
जलवायु परिवर्तन मानव सभ्यता पर खतरा बढ़ाए जा रहा है और परिणामस्वरूप तूफानों की संख्या व आवृत्ति में वृद्धि, वायु प्रदूषण, तापमान में अभिवृद्धि, सूखा पडऩे की आवृत्ति, बढ़ते रेगिस्तान, महासागरों में उफान, खाद्यान्न की कमी, गरीबी और अवस्थापन में वृद्धि इत्यादि रुकने का नाम नहीं ले रहे। हर बार नए लक्ष्यों और पुराने संकल्पों को दोहराने की रस्मअदायगी के बीच औद्योगिक व विकसित देश आज भी निरंकुशता के साथ पर्यावरण को आघात पहुंचाए जा रहे हैं। इस पूरे 28 वर्ष के दौर में अमरीका समेत अनेक राष्ट्रों के रूठने-मनाने के प्रयासों से भी ठोस कदमों को अंजाम देने में गंभीर रुकावटें झेलनी पड़ी हैं। 2001 में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के राष्ट्रपति बनने के साथ अमरीका ने चर्चाओं में हिस्सेदारी की जगह मात्र पर्यवेक्षक की भूमिका अदा करने का निर्णय ले काफी बड़ी रुकावट पैदा की थी, जो 2009 में बराक ओबामा द्वारा जलवायु परिवर्तन को मिशन रूप में अंजाम देने की घोषणा के साथ दूर हुई। नई दिल्ली में 2002 में आयोजित कॉप-8 में हालांकि नई दिल्ली कार्ययोजना अनुमोदित की गई पर रूस ने इस पर असहमति जाहिर करते हुए सम्पूर्ण कार्यकम को विलंबित कर दिया था।
कॉप का पहला निर्णायक कदम क्योटो में आयोजित कॉप-3 के दौरान उठा था, जब ‘क्योटो प्रोटोकोल’ पर सहमति बनी थी। यह पहला ऐसा कदम था जिसके तहत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी के प्रति कटिबद्धता हेतु कार्बन ट्रेडिंग, क्लीन डवलपमेंट मैकेनिज्म और संयुक्त क्रियान्वयन की आवश्यकता प्रतिपादित की गई थी। हालांकि इसमें भी एक अलग प्रस्ताव के जरिए सैन्य गतिविधियों और बंकर ईंधन से हो रहे उत्सर्जन को राष्ट्रीय उत्सर्जन के योग से अलग रखा गया था। यदि, सैन्य गतिविधियों के उत्सर्जन की गणना की जाए तो यह संभवतया जलवायु परिवर्तन के बहुत अहम कारक के रूप में स्थापित होगी। बीते एक वर्ष से चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध, हाल ही के इजरायल-हमास युद्ध या पूर्व में इराक, अफगानिस्तान, सीरिया आदि में हुई सैन्य गतिविधियों ने कई टन कार्बन उत्सर्जित कर वातावरण को दूषित किया है। 25 वर्ष पूर्व क्योटो में कार्बन उत्सर्जन में 1990 के स्तर से 6 से 8 प्रतिशत तक कमी हेतु 11-15 वर्ष का समय निर्धारित किया था, पर अपेक्षित सफलता अब तक नहीं मिली। इसी तरह 13 वर्ष बाद कैनकुन में कॉप-16 (2010) के दौरान ग्लोबल वार्मिंग (भूमण्डलीय ऊष्मीकरण) 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य अनुमोदित किया था, जो वर्तमान में भी दूर की कौड़ी है।
बीते 28 वर्षों के मंथन में शब्दों के मायाजाल या जंजाल, परिभाषाओं की रचना, कमेटियों के गठन, जलवायु परिवर्तन हेतु विभिन्न नामों से कोष की स्थापना के अमूर्त संकल्प और राजनीतिक प्रस्तावों के दीगर ठोस वैज्ञानिक कार्रवाई, विकल्पों की सृजनता व जैविक सभ्यता के संरक्षण के लिए प्रगति को गौण ही माना जा सकता है। नुकसान एवं विनाश कोष की स्थापना की अवधारणा को संकल्प तक पहुंचने में 10 वर्ष लग गए। यह कुछ इस तरह है कि ‘बस चिंता करना जरूरी है, चाहे उस चिंतन से चितवन बने या ना बने।’ सम्मेलन से पूर्व आमजन से संवाद स्थापित कर तथ्यों की स्थापना करने पर ही ये सम्मेलन सार्थक होंगे, अन्यथा हर वर्ष ‘जलवायु पर्यटन’ का नया स्थल बन कर ही रह जाएंगे।