
Indian Parliament
देश में परिवर्तन की हवा बहाने के बड़े-बड़े दावे करने वाले राजनेता और राजनीतिक दल राजनीति में बदलाव को ही तैयार नहीं होते। नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले चुनाव सिर पर आते ही सारी नैतिकता भूल जाते हैं। कर्नाटक विधानसभा में होने जा रहे चुनाव इसका ताजा उदाहरण है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , भाजपा अध्यक्ष अमित शाह , कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी हों या मुख्यमंत्री सिद्धारमैया। पिछले एक माह में सैकड़ों धर्मस्थलों पर माथा टेक चुके हैं।
रैलियों में राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के दावे किए जा रहे हैं। टिकट बांटने की बारी आई तो सारा आदर्शवाद धरा रह गया। धनबल,भुजबल, वंशवादी और अपराधी फिर हावी हो गए। हों भी क्यों ना। दलों को जीत की गारंटी इन्हीं लोगों में दिखाई देती है। कांग्रेस ने ४८, भाजपा ने ३० और जनता दल (एस) ने १७ दागियों को टिकट दिए हैं। कुल में से १३ प्रतिशत उम्मीदवारों पर पर गंभीर आरोप हैं। चुनाव आयोग लाचार है, न्यायालय के आदेश नेता मानते ही नहीं।
चुनाव आयोग मांग कर चुका है कि दागियों के चुनाव लडऩे पर आजीवन रोक लगा दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने सजायाफ्ता माननीयों की सदस्यता खत्म करने और दागियों के खिलाफ आपराधिक मामलों को निपटाने के लिए विशेष अदालतें बनाने का आदेश दिया। सब ठंडे बस्ते में हैं। लोकसभा में ३४ फीसदी, राज्यसभा में १९ फीसदी और विधानसभाओं में करीब ३३ फीसदी माननीयों के खिलाफ गंभीर आपराधिक केस चल रहे हैं। फिर कैसे देश में अपराध व भ्रष्टाचार खत्म करने की कल्पना भी की जा सकती है। आजादी के ठीक बाद देश में समाज सुधारक, शिक्षाविद्, स्वच्छ छवि वाले राजनीति में आते थे, अब अपराधी राजनीति का उपयोग ढाल के रूप में करने लगे हैं।
संसद या विधानसभा की सीट नोट मशीन की गारंटी बन गई, तभी तो संसद और राज्यों के विधानसभाओं में ७१ फीसदी सदस्य करोड़पति हैं। राजनीति में दागियों से निजात दिलाने का दारोमदार जनता और राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व पर ही है। जनता ठान ले कि उसके क्षेत्र में यदि कोई दागी नेता चुनाव लड़ता है तो उसको वोट नहीं देने का अभियान चले। ऐसे लोगों के खिलाफ खुलकर सामने आना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं है। युवा वर्ग तैयारी कर ले सफाई की, तो शायद देश में सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान होगा।

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