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भ्रष्टाचार : मंशा पर खड़े होते सवाल

निष्पक्ष जांच के बिना भ्रष्टाचार पर काबू पाना असंभव है। सर्वोच्च न्यायालय में पिछले हफ्ते से चल रहा घमासान इसी सिद्धांत पर केंद्रित है।

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Sunil Sharma

Nov 19, 2017

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- निखिल डे, सामाजिक कार्यकर्ता

कोर्ट के पास जाने पर रोक लगाना हमारे संविधान पर एक निष्पक्ष एजेंसी पर रोक लगाने से ज्यादा खतरनाक है। न्यायपालिका संविधान के तीन स्तंभों में से एक है। जनसेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत को न्यायालय के पास ही ले जाने का रास्ता था।

निष्पक्ष जांच के बिना भ्रष्टाचार पर काबू पाना असंभव है। सर्वोच्च न्यायालय में पिछले हफ्ते से चल रहा घमासान इसी सिद्धांत पर केंद्रित है। उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और कामिनी जायसवाल का कहना था की मुख्य न्यायाधीश सहित किसी भी न्यायाधीश को अपने खुद से संबंधित मामले की जांच से दूर रहना चाहिए। लोकपाल आंदोलन भी निष्पक्ष जांच की व्यवस्था की मांग के साथ उठा था। देश में आज तक लोकपाल कानून लागू नहीं किया गया है।

भ्रष्ट लोकसेवकों के बचाव में राजस्थान सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश में नागरिकों की निगरानी और निष्पक्ष जांच के सिद्धांत को दफनाने का प्रयास किया गया है। इसके तहत, जनता कहीं भी भ्रष्टाचार का मामला ना तो उठा सकती है और ना ही सरकार के अलावा किसी के पास अपनी शिकायत ले जा सकती है। कोर्ट के पास जाने पर रोक लगाना हमारे संविधान पर एक निष्पक्ष एजेंसी पर रोक लगाने से ज्यादा खतरनाक है। न्यायपालिका संविधान के तीन स्तंभों में से एक है।

जनसेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत को न्यायालय के पास ही ले जाने का रास्ता था। यदि नागरिकों की कहीं सुनवाई न हो तो उनको मीडिया के पास जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यदि मीडिया को किसी आरोप या घटना में किसी सरकारी व्यक्ति का नाम प्रकाशित करने से रोका जाता है तो इससे साफ होता है कि सरकार न तो भ्रष्टाचार रोकना चाहती है और न ही नागरिकों को इसके खिलाफ आवाज उठाने देना चाहती है। मौजूदा प्रावधानों के अनुसार सरकार ही जनसेवक के खिलाफ अभियोजन की अनुमति देती है।

वैसे होना यह चाहिए कि उसके जांच के सारे आयाम आम जनता के बीच मीडिया में प्रकाशित हो। राजस्थान सरकार ने सारे औजार अपने पास रखने का प्रयास किया है जिसके तहत सरकार किसी को भी भ्रष्ट घोषित कर उसके खिलाफ कार्रवाई कर सके। यह केवल भ्रष्टाचार उन्मूलन पर ही नहीं, लोकतंत्र पर भी प्रहार है। यह सच है कि न्यायालय स्वतंत्र है लेकिन उसके पास स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं है। जनसेवक की शिकायत करने के लिए कोर्ट ही एक ऐसी निष्पक्ष व्यवस्था थी जहां नागरिक अपनी शिकायत ले जा सकते थे। यदि कोई भी न्यायालय मामले को दर्ज करवाकर जांच शुरू करवाए तब भी जांच पुलिस द्वारा ही की जाती है और पुलिस की चाबी सरकार के हाथों में होती है।

भ्रष्टाचार से लडऩा है तो एक स्वतंत्र जांच एजेंसी की अत्यंत जरूरत है। बिना स्वतंत्र जांच एजेंसी के भ्रष्टाचार बढ़ता जाएगा। निजी स्वार्थ और सरकार के बीच में एक ऐसा गठबंधन बनेगा जिससे हमारी पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचारियों के हाथों में चली जाएगी। इसलिए जरूरी है कि लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून 2013 के प्रावधानों के अनुसार लोकायुक्त कानून में संशोधन हो ताकि लोकायुक्त के पास एक स्वतंत्र अनुसन्धान और अभियोजन एजेंसी हो। लेकिन सरकारें स्वतंत्र व्यवस्था कायम करने के ठीक विपरीत काम कर रही हैं। राजस्थान सरकार के इस रवैये के और भी उदाहरण हैं।

सामाजिक अंकेक्षण राजस्थान के नागरिकों द्वारा ही बनाई गई एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत नागरिक समूह खुद ही ऑडिट करके बता सके की सरकारी कर्मचारी या अधिकारी अपना काम सही तरीके से कर रहे हैं अथवा कागजों और हकीकत में कितना अंतर है। हमारा पैसा, हमारा हिसाब का नारा इस राज्य से गूंज कर पूरे देश में सूचना के अधिकार और जनता ऑडिट के रूप में फैला। लेकिन आज सामाजिक अंकेक्षण अपनी ही जन्म भूमि में कानूनी रूप से दबाया जा रहा है। पिछले माह भारत सरकार ने राजस्थान सरकार सहित छह राज्यों के मुख्य सचिवों को चिठ्ठी लिखी, कि इन राज्यों की सरकारें एक स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण की इकाई नहीं बना रही है।

यह भारत के महालेखाकार और उच्चतम न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है। गैरजवाबदेही से पीडि़त लाखों नागरिक अपनी शिकायतों को लेकर जगह-जगह परेशान होते हुए भटक रहे हैं। सरकारी अधिकारी काम नहीं करते। लोगों को अपने कानूनी हक प्राप्त नहीं होते। जनता को प्रशासनिक स्तर पर ठीक से जवाब नहीं मिलता। किसने काम किया और किसने नहीं किया यह पता ही नहीं चलता। कई वर्षों से नागरिक समूह मांग करते आए हैं कि पारदर्शिता के संघर्षों और प्रावधानों से भ्रष्टाचार, सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारी की निष्क्रियता साबित हो जाती है लेकिन उन पर कोई कार्रवाई सुनिश्चित नहीं होने से नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन होता रहा है।

इस प्रकार का कानून लाया जाए जो नागरिकों को सशक्त करे और सरकारी कर्मचारी को अपना काम सही तरीके से करने के लिए बाध्य करे। भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए हमें राजस्थान सरकार को अपने लोकतंत्र विरोधी और भ्रष्टाचार को शरण देने वाले अध्यादेश को वापस लेने के लिए बाध्य करना ही पड़ेगा। हमें एक ऐसा जन आंदोलन भी खड़ा करना चाहिए जिससे एक कारगर लोकायुक्त कानून पारित हो, जो लोकपाल और लोकायुक्त कानून-2013 के अनुरूप हो। एक स्वतंत्र एजेन्सी स्थापित हो जो नागरिकों को अपने हक दिला सके साथ ही एक जवाबदेही कानून पारित किया जाए जिसके तहत जनसेवकों की जवाबदेही तय हो सके।