
'माड़साब' ने बनाया राजस्थानी भाषा का इनसाइक्लोपीडिया
डॉ.नरेन्द्र सिंह लालस
भाषा के बिखरे शब्दों की माला बनाना बहुत ही कठिन कार्य होता है। इसे चुनौती मान कर जिस मनीषी ने राजस्थानी शब्दकोश का सृजन किया था वह एक साधारण अध्यापक डॉ. सीताराम लालस थे। उन्होंने दो लाख से ज्यादा शब्दों का संग्रह तैयार कर सभी को चकित कर दिया। लालस का जन्म 29 दिसंबर 1908 को हुआ। ढाई वर्ष की उम्र में ही पिता का देहांत हो गया। इसके बाद नाना सादूल सिंह ने उनका लालन पालन किया, जो साहित्य प्रेमी थे और बालक सीताराम को डिंगल का पंडित बनाना चाहते थे। दिलचस्प बात यह है कि सीताराम लालस की पढ़ाई उस उम्र में शुरू हुई, जिस उम्र में लोग पढ़ाई छोड़ देते है। अध्ययन के बाद लालस 17 जुलाई 1929 को अध्यापक के रूप में मंडोर स्थित चैनपुरा स्कूल में नियुक्त हो गए। इसी समय उनकी मुलाकात जयपुर के अग्रणी साहित्यकार हरिनारायण पुरोहित से हुई। उनमें परस्पर पत्र-व्यवहार भी होने लगा। सीताराम लालस परिचितों के बीच 'माड़साब' के नाम से जाने जाते थे। एक बार उन्होंने मुरारीदान के डिंगल कोश की टीका-टिप्पणी में खरी बात लिख दी। इसके बाद पुरोहित ने पत्र लिखा कि,'डिंगल कोश में जो खोट निकाला है, उसका पूरा प्रमाण दें। नामी विद्वान के ग्रंथ में गलतियां निकालना ठीक नहीं है। अगर आप ऐसा कोश बना सकते हैं, तो मालूम चले'।
हरिनारायण पुरोहित के कड़वे शब्दों ने राजस्थानी शब्दकोश की नींव रख दी। 'माड़साब' ने पक्का इरादा कर लिया और हिन्दी शब्द सागर, संस्कृत अंग्रेजी कोश को एक नहीं बीसों बार पढ़ा। उन्होंने मई 1932 में राजस्थानी शब्दकोश का कार्य प्रारंभ कर दिया। सर्वप्रथम सूरज प्रकाश ग्रंथ फिर राजरूपक, रघुनाथरूपक, बांकीदास ग्रंथावली से लगभग पंद्रह हजार शब्दों की स्लिपें बनाईं और उन्हें करीने से जमाकर पुरोहित जी को बताया। पुरोहित जी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने शब्दकोश प्रकाशित कराने का वादा किया। इस वादे के बाद लालस शब्दकोश के सृजन में लग गए। अध्यापक की छोटी नौकरी के कारण आर्थिक परेशानियां बहुत थीं। कागज खरीदने के लिए पैसा नहीं था, तो छोटी-छोटी पर्चियों पर लिखते। सन् 1954 में उनसे मिलने कैम्ब्रिज के प्रोफेसर डॉ. एलन आए। उन्होंने डॉ. एलन को शब्दकोश का खाका बताया। डॉ. एलन ने उन्हें शब्दकोश से पहले व्याकरण लिखने की सलाह दी, जिस पर अमल करते हुए उन्होंने राजस्थानी की व्याकरण लिखी, जो वर्ष 1954-55 में प्रकाशित हुई।
मनोयोग के धनी इस सरस्वती पुत्र ने छियालीस वर्ष की साधना के बाद अठारह लाख स्लिपें तैयार कर ढाई लाख शब्दों का शब्दकोश वर्ष 1978 में पूर्ण कर दिया। यह आज भी भारत की प्रांतीय भाषाओं तथा हिंदी से भी बड़ा शब्दकोश है। यह एक तरह से राजस्थानी भाषा का एक इनसाइक्लोपीडिया है। इस वजह से इनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेन में डॉ. सीताराम लालस को 'राजस्थानी भाषा की जुबान' कहा गया है।
राजस्थानी भाषा, संस्कृति और साहित्य के ध्वजवाहक लालस को राजस्थान साहित्य अकादमी ने मनीषी की उपाधि दी, तो वर्ष 1976 में जोधपुर विश्वविद्यालय ने डी.लिट की उपाधि से नवाजा। भारत सरकार ने वर्ष 1977 में उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया। बाद में उन्होंने एक संक्षिप्त कोश भी बनाया। राजस्थान प्राच्य प्रतिष्ठान के एक अधिकारी के हठ के कारण यह कोश ताले में बंद हो गया। साहित्यकारों के काफी प्रयासों तथा अदालत में अपील के बाद 1996 में यह संक्षिप्त कोश बाहर आया। लेकिन, इस संक्षिप्त कोश को पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस देख नहीं पाए तथा 29 दिसंबर 1986 को उन्होंने यह नश्वर संसार छोड़ दिया। लालस भले ही विदेह हो चुके हैं, लेकिन राजस्थानी शब्दकोश के रूप में उनकी अनुपम कृति हमेशा उनका स्मरण कराती रहेगी।
Published on:
29 Dec 2022 07:00 pm
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