
witch hunting in india dayan
- नजमा खातून, स्वतंत्र टिप्पणीकार, मुस्लिम अध्येता, समसामयिक विषयों पर लेखन
पाखंडी बाबाओं, ओझाओं और भोपों के विरुद्ध जागरूकता प्रयासों से एक मोर्चा खुला जरूर है। इन्हीं प्रयासों को त्वरित गति प्रदान करते हुए सक्रिय कानूनी प्रशासनिक व्यवस्था डायन निवारक कानून को सख्ती से लागू करे।
इब्ने मरियम हुआ करे कोई, मेरे दर्द की दवा करे कोई, मशहूर शायर मिर्जा गालिब की ये पंक्तियां महिला सशक्तीकरण की बात करने वाली प्रशासनिक व्यवस्था पर जोरदार प्रहार करती दिखती है। कानूनी प्रावधान के बावजूद सामाजिक व्यवस्था कुरीतियों से पीडि़त महिला को न्याय नहीं दिला पाती, ऐसे में दरकार है कानूनी व्यवस्था को अमली जामा पहनाने की। वर्षों पुरानी डायन प्रथा ने २१वीं सदी में भी ग्रामीण आदिवासी इलाकों में अपने पैर जमा रखे हैं। सदियों से सामाजिक ताना-बाना कुछ ऐसे बुना गया है जिसमें महिला को तरह-तरह से प्रताडि़त किया जाता रहा है।
कुछ कुरीतियों पर लगाम कसी गई है तो वहीं देश के विभिन्न राज्यों में डायन हत्या निवारक अधिनियन जैसे सख्त कानून के बावजूद महिलाओं की हत्याएं हो रही हैं या उन्हें अमानवीय तरीकों से प्रताडि़त किया जा रहा है। ओझा व भोपों द्वारा छोटी-छोटी बातों का दोष महिला पर डालकर उन्हें डायन घोषित कर जिस प्रकार प्रताडऩा दी जाती है उसे देखकर इंसानियत की रूह कांप उठती है। महिला की हत्या करना, मुंह काला करना, पत्थर मारना, उसे निर्वस्त्र कर घुमाना, इंसानियत को शर्मसार कर देता है। पीडि़त महिला की शर्म से झुकी नजर, याचना करती उसकी नजरें, उसकी लाचारी पर हंसती संवेदनहीन भीड़ और पीडि़त महिला की अस्मत को तार-तार होने से बचा पाने में अक्षम, लाचार प्रशासनिक व्यवस्था तमाम महिला सशक्तीकरण के दावों की पोल खोल देते हैं।
ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या औचित्य है ऐसी कानूनी व्यवस्था का जो निवारक अधिनियम बनाकर उसे लागू करने के प्रयास में विफल सिद्ध हो जाती है। अशिक्षित आदिवासी ग्रामीण इलाकों में पनपती इस कुरीति की जहरीली बेल का जड़ से खात्मा करना आवश्यक हो गया है। वर्तमान में पाखंडी बाबाओं, ओझाओं और भोपों के विरुद्ध जागरूकता सम्बंधी प्रयासों के फलस्वरूप एक मोर्चा खुला है। इन्हीं प्रयासों को त्वरित गति प्रदान करते हुए सक्रिय कानूनी प्रशासनिक व्यवस्था डायन निवारक कानून को सख्ती से लागू करें और ग्रामीण इलाके की पंचायत राज व्यवस्था में प्रधान और पंच-सरपंचों को इस कुप्रथा के विरुद्ध सख्ती से पाबंद करें।
साथ ही उन तमाम महिलाओं से गुजारिश है कि वे परिवार या समाज के भय से घबराए बिना नकारात्मक परिस्थितियों को बदलने का जोखिम उठाएं और अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखें। मेरा मानना है कि अंधविश्वास के खिलाफ समाज के जागरूक वर्ग का संगठित प्रयास निश्चित रूप से इस सामाजिक कलंक को मिटाने में सफल होगा।
Published on:
04 Oct 2017 01:17 pm
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