
प्रो. पंकज जैन
विभागाध्यक्ष, मानविकी व भाषाएं एवं पीठाधिपति इंडिया सेंटर, फ्लेम यूनिवर्सिटी
एक विदेशी मुल्क में मैंने एक बार एक छात्र को किताबों की सीढ़ी बनाकर उस पर चढ़ते-उतरते देखा। उनकी संस्कृति में इस कृत्य के लिए कोई वर्जना नहीं है। इसके विपरीत भारत में किसी भी वस्तु या व्यक्ति को पैर से छूने को गलत माना जाता है। हमारे सांस्कृतिक अभ्यास, त्योहारों और प्रतीकों का गहरा महत्त्व है, जिनकी परतें हमारी परंपराओं, इतिहास और दर्शन से जुड़ी हैं। हमारे पूर्वजों ने ऐसे आचरण का अभ्यास कर उसे हमारे पास पहुंचाया, जिसने हमारे अंदर अपने अतीत के साथ निरंतरता और संबंध की भावना पैदा की। पूर्वजों के लिए भारतीय शब्द 'पितृ' है।
पितृ पक्ष यानी एक पखवाड़ा हमारे पूर्वजों को समर्पित एक पवित्र कालावधि है। यह उनके प्रति हमारी कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का अवसर और उत्सव है। हमारी संस्कृति ने इन दो हफ्तों को विघटन के प्रतीक गणेश विसर्जन और विकास व जन्म के प्रतीक दुर्गा तथा गरबा (गर्भ से निकला) के बीच रखा है। अतीत के विघटन और नूतन के सृजन के बीच हमें अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए। वर्ष के ये पंद्रह दिन किसी भी नए कार्य की शुरुआत न करने या यात्रा के निषेध के लिए होते हैं। पितृ पक्ष में ऐसी वर्जना का उद्देश्य यह है कि हम भविष्य की योजना बनाने की बजाय वर्तमान से कुछ विराम लेकर अतीत के प्रति आभार प्रकट करें। पितृ पक्ष की दूसरी शिक्षा यह है कि हमें भी सांसारिक भौतिकवादी लक्ष्यों को पीछे छोड़कर अपने पूर्वजों के बताए मार्ग का अनुगमन करना होगा। यह अपने अस्तित्व को समझने एवं जीवन के परम लक्ष्य पर विचार करने का समय है। इसलिए हमें श्राद्ध को श्रद्धा के साथ करना चाहिए।
श्राद्ध शब्द श्रद्धाजनित है, जो विनम्रता और कृतज्ञता का प्रतीक है। यह समय अपने आप को विनम्र करने और अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और प्रशंसा दिखाने का है। पितृ पक्ष के अनुष्ठानों में बिहार के गया ( अर्थात 'प्रस्थान कर चुका') की यात्रा करना और ब्राह्मणों, गायों तथा कौओं को भोजन कराना शामिल है। भगवद गीता में बताया गया है कि सच्चे ब्राह्मण जन्मना नहीं, अपितु अपने गुणों और कर्मों से होते हैं। हम उन लोगों का सम्मान करते हैं, जिन्होंने हमें ज्ञान और संस्कारों का उपहार दिया। ब्राह्मण उन सबका प्रतीक हैं। हम ज्ञान, धन, नदियों, पशु-पक्षियों, सरीसृपों, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा और पूरे ब्रह्मांड की पूजा करते हैं। ये सभी पूजनीय धारणाएं हमारे पूर्वजों से आई हैं। इसलिए, यह समय है कि हम उन सभी के प्रति आभार व्यक्त करें। अद्वैत वेदांत के अनुसार ब्रह्मांड में ब्रह्म व्यापक है, इसलिए हर कण दिव्य है। हम अनुष्ठानों में ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ जीवों का प्रतीकात्मक रूप से पूजन करते हैं। यथा गाय स्तनधारियों की, कौआ पक्षियों का, गंगा नदियों की और हिमालय पर्वतों का प्रतीक है। यह कोई अंधविश्वास या कट्टरता नहीं है। हमें हर कण में दिव्यता देखनी चाहिए। इसे लागू करके, हम सभी जातियों और धर्मों के लोगों, दुनिया के हर व्यक्ति और यहां तक कि पशु-पक्षियों, पौधों, मछलियों आदि में भी दिव्यता देख सकते हैं। किसी के निधन के बाद उसकी अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया जाता है। गंगा को दिव्य माना जाता है। वह भौतिक संसार को पार कराने वाली वैतरणी है। गंगा अंतत: महासागर में मिलती है। हम इस प्रकार अपने भौतिक शरीर को पांच महाभूतों अर्थात वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और आकाश में लौटा देते हैं। हम ऐसा अन्य पवित्र नदियों में भी कर सकते हैं। पितृ पक्ष पूर्वजों से हमें प्राप्त गहरी जड़ों और परंपराओं की याद दिलाता है।
यह पवित्र काल केवल अनुष्ठानों का ही नहीं, बल्कि विनम्रता, कृतज्ञता और आत्मचिंतन का समय है। यह हमें उन लोगों की विरासत का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है, जिन्होंने हमारे जीवन को आकार दिया। श्राद्ध को श्रद्धा के साथ करने से हम जीवन की निरंतरता और भौतिक अस्तित्व से परे की आध्यात्मिक यात्रा को स्वीकार करते हैं। पितृ पक्ष वह समय है, जब हम अपने पूर्वजों द्वारा दी गई बुद्धिमता, मूल्यों और सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव मनाते हैं। साथ ही यह सुनिश्चित करते हैं कि उनकी विरासत आने वाली पीढिय़ों का मार्गदर्शन करने के साथ प्रेरित करती रहे।
Published on:
02 Oct 2024 08:40 pm
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