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संहार में भी सृजन को समेटे हुए हैं दुखहर्ता- कल्याणकर्ता शिव

शिव को भले ही 'संहारक' कहा जाता हो लेकिन मूलत: वे सृजेता ही हैं। शिव सृजेता हैं कल्याण के। संहार किए बिना सृजन होता नहीं। सृजन हुए बिना कल्याण होता नहीं।

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अजहर हाशमी

कवि और साहित्यकार
मेरे मौलिक मत में 'शिव' दीनमित्र पहले हैं कुबेर मित्र बाद में, दुखहर्ता पहले हैं देवाधिदेव बाद में, मासूम पहले हैं महाकाल बाद में, दयादाता पहले हैं दंडदाता बाद में, कल्याणकर्ता पहले हैं ताण्डवकर्ता बाद में। दीनमित्र की दरियादिली, दुखहर्ता की दृष्टि, मासूम की मुस्कान, दयादाता की दिव्यता, कल्याणकर्ता की करुणा जब एकाकार हो जाती है तो 'शिव' हो जाती है। इस प्रकार शिव नाम है कल्याण का। शिव आ धाम है कल्याण का। इस संदर्भ में काव्य-पंक्तियां भी हैं- शिव यानी कल्याण है, शिव यानी उत्थान , शिव चिंतन, शिव-चेतना, शिव में निहित निदान, शिव समत्व के सारथी, शिव शुभता, शिव खैर, शिव के प्रेम प्रभाव में, प्राणी भूलें गैर, तुरंत: प्रसन्न इसीलिए, नाम है आशुतोष, शिव का मतलब सादगी, शिव यानी संतोष, तप में हों तल्लीन या हो गौरी के साथ, निर्विकार-निश्छल सदा, शिन हैं भोलेनाथ। स्पष्ट है कि शिव का पारमार्थिक प्रवाह है कल्याण। शिव का नीतिगत निर्वाह है कल्याण। शिव की रीतिगत रवानी है कल्याण, शिव की प्रीतिगत कहानी है कल्याण। इससे सिद्ध होता है कि शिव का आध्यात्मिक स्वरूप भी कल्याण है और दिव्य रहस्य भी कल्याण है।
प्रश्न उठता है कि कल्याण किसका? कल्याण कैसे? पहले प्रश्न का उत्तर है कि शिव को भले ही 'संहारक' कहा जाता हो लेकिन मूलत: वे सृजेता ही हैं। शिव सृजेता हैं कल्याण के। संहार किए बिना सृजन होता नहीं। सृजन हुए बिना कल्याण होता नहीं। इसको यों समझिए। एक इमारत का निर्माण होना है तो उसकी दीवारों को आकार सीमा और संतुलन देने के लिए ईंटों को जोडऩा होगा। लेकिन, सही शक्ल देने के लिए कुछ ईंटों को तोडऩा भी होगा। इन ईंटों को तोड़े बिना अर्थात 'संहार' किए बिना निर्माण नहीं होगा। यानी सृजन नहीं होगा। अगर इमारत का निर्माण नहीं होगा तो लोगों को रहने के लिए आसरा नहीं मिलेगा। आसरा नहीं मिलेगा तो उनकी रहने की समस्या का समाधान नहीं होगा। अर्थात कल्याण नहीं होगा। तात्पर्य यह है कि शिव, संहार में भी सृजन को समेटे हुए हैं, जिसमें कल्याण निहित है। यह कल्याण उसका होता है जो समर्पण के संस्कार से युक्त हो। दूसरा प्रश्न यह कि कल्याण कैसे? इसका उत्तर यह है कि जब कोई समर्पण से भरा होता है तो शिव उसके प्रति स्वयं समर्पित हो जाते हैं और कल्याण कर देते हैं। जैसे शिव ने श्री विष्णु का कल्याण किया। जब उन्होंने यह देखा कि विष्णु ने कमलपुष्प खो जाने पर अपना नेत्र ही शिव को चढ़ा दिया। तब शिव ने प्रसन्न होकर कमल को सुदर्शन-चक्र में परिवर्तित करके विष्णु को दे दिया। इस प्रकार शिव के द्वारा विष्णु का कल्याण हो गया। इसी तरह समुद्र-मंथन के बाद कालकूट विष कंठ में लेकर भी शिव ने सृष्टि का कल्याण किया। शिव का यह कल्याणकारी आध्यात्मिक स्वरूप इस प्रकार है।
पाप को पुण्य में भुगतान की आदत है मुझे, यानी हर दर्द के सम्मान की आदत है मुझे, तुम्हें अमृत हो मुबारक, मैं जहर पी लूंगा, मैं तो शंकर हूं विषपान की आदत है मुझे।