दुर्योधन बाहर निकला और पितामह को लगा जैसे उनका सारा संसार बदल गया है। वे अपने शिविर में एक सिरे से दूसरे सिरे तक टहलते रहे। कभी क्षण भर को रुक जाते तो अगले ही क्षण फिर चल पड़ते। उन्होंने बहुत टाला था, पर शायद अब निर्णय का क्षण आ गया था।
दुर्योधन बाहर निकला और पितामह को लगा जैसे उनका सारा संसार बदल गया है। वे अपने शिविर में एक सिरे से दूसरे सिरे तक टहलते रहे। कभी क्षण भर को रुक जाते तो अगले ही क्षण फिर चल पड़ते। उन्होंने बहुत टाला था, पर शायद अब निर्णय का क्षण आ गया था।
भीष्म ने और कुछ चाहा हो या न चाहा हो, गृहकलह कभी नहीं चाही, कुरुवंश को नाश से बचाने के लिए उन्होंने क्या नहीं किया। माता सत्यवती को उन्होंने वचन दिया था कि वे कुरुवंश की रक्षा करेंगे।
दुर्योधन के जन्म से पहले ही, जब युधिष्ठिर के जन्म का समाचार पाकर गांधारी ने अपने गर्भ को नष्ट करने का प्रयत्न किया था, उसी दिन से भीष्म के मन में कुरुकुल के भविष्य को लेकर आशंकाएं जन्म लेने लगी थीं।
बाहरी आक्रमणों से भीष्म को कोई भय नहीं था। भीष्म जानते थे कि उनके जीवित रहते कोई बड़े से बड़ा योद्धा भी हस्तिनापुर की ओर आंख उठाकर नहीं देख सकता। अपनी दिग्विजयों के अभियानों में जरासंध जैसा योद्धा भी हस्तिनापुर की ओर नहीं आया किंतु गृहकलह का दमन तो भीष्म के शौर्य से नहीं हो सकता था।
जब भीष्म ने यह दायित्व स्वीकार किया था, तब क्या वे जानते थे कि भविष्य में पुरु और देवव्रत जैसे पुत्र नहीं होंगे। उन्होंने कभी सोचा था कि अब पुत्र, पिता की संपत्ति नहीं होगा, पिता ही पुत्र की संपत्ति हो जाएगा।
वे क्या जानते थे कि पिता की एक इच्छा पूरी करने के लिए अपने संपूर्ण जीवन दे देने वाले पुत्रों के स्थान पर पिता और पितामह को वध की धमकी देने वाले पुत्र और पौत्र जन्म लेंगे।धृतराष्ट्र की धूर्तता और लोभ को वे भलीभांति पहचानते थे।
भोग, सत्ता और अधिकार के लिए उसकी लपलपाती जिह्वा को कौन देख नहीं सकता था। गांधारी की शालीनता और पति-भक्ति जैसे लोक-विश्रुत गुणों के पीछे छिपी उसकी प्रकृति भी भीष्म से छिपी हुई नहीं थी।
राजसत्ता और स्त्री-भोग के प्रति पांडु में भी कम दुर्बलता नहीं थी। भीष्म सब कुछ देखते रहे थे और केवल एक ही प्रयत्न करते रहते थे कि किसी प्रकार कुरुकुल के भीतर शांति बनी रहे।
पांडव जब से हस्तिनापुर आए थे, दुर्योधन अनवरत उनके पीछे पड़ा हुआ था। कितना अत्याचार किया था उन पर। भीष्म को सदा उनसे सहानुभूति रही। वे सदा उनके हितैषी रह किंतु एक भी बार वे पांडवों की सहायता कर पाए? दुर्योधन ने भीम को विष दिया किंतु भीष्म उसे दंडित करने की बात सोच भी नहीं सके। वारणावत का कांड हुआ।
न्याय की बात होती तो धृतराष्ट्र और दुर्योधन- दोनों को जीवित जला कर भस्म कर दिया जाना चाहिए था। भीष्म पांडवों का पक्ष लेते तो जो युद्ध आज हो रहा है, वह वर्षों पहले ही हो चुका होता। इस युद्ध को टालने के लिए ही तो भीष्म चुपचाप बैठे रहे।
उन्होंने सोच लिया कि यदि पांडवों के कुछ कष्ट सह लेने से गृहकलह नहीं होती, कुरुवंश का नाश नहीं होता तो पांडवों को कष्ट सह लेने दो। वंश की रक्षा और सुख-शांति के लिए किसी को तो मूल्य चुकाना ही है। विधाता ने पांडवों को उस स्थिति में डाल दिया है तो पांडवों को सह लेने दो।
जब पांडवों को उनका पैतृक राज्य न देकर धृतराष्ट्र ने उन्हें खांडव वन और खांडवप्रस्थ के खंडहर तथा प्रजा के रूप में बर्बर क्रूर हिंस्र जातियां, इस अपेक्षा से सौंप दी थीं कि पांडव उनसे लड़ते-भिड़ते ही समाप्त हो जाएंगे तो भी भीष्म ने सोचा था कि यह क्रूर धृतराष्ट्र इन अबोध लड़कों को हिंस्र पशुओं के सम्मुख डाले दे रहा है।
किंतु पांडवों ने कितनी शांति से उसी भूखंड को चुपचाप स्वीकार कर लिया था। और गृह-युद्ध फिर से टल गया था, कुरुवंश विनाश से बच गया था।