दुर्योधन ने ही पूछा, 'तुम्हारा क्या विचार है मित्र!Ó कर्ण वार्तालाप में सम्मिलित होने को कोई विशेष इच्छुक नहीं लगा। फिर भी बोला, 'मुझे तो यह सारा जीवन ही तंत्र-विद्या का खेल लगने लगा है। कहीं कोई किसी की दृष्टि बांध देता है और कहीं कोई किसी की दृष्टि खोल देता है। और श्रीकृष्ण जिस दक्षता से इस खेल को खेलते हैं, वह तो अद्वितीय है।Ó
'लगता है अंगराज की भी दृष्टि खुल गई है?Ó दु:शासन ने कहा, 'कृष्ण को श्रीकृष्ण कह रहे हैं। किसी खेल की भी चर्चा है। यह कैसा खेल है भाई?Ó 'क्या कहूं।Ó कर्ण अब भी अन्यमनस्क था, 'कुछ कह नहीं सकता। अब तो यह सोचने लगा हूं कि दृष्टि खुलना कहते किसको हैं।Ó 'इसे तो व्यास या शुकदेव के पास भेज दो।Ó शकुनि बोला, 'आज इसमें कोई आश्रमवासिनी आत्मा समा गई है।Ó
कुछ क्षणों तक दुर्योधन उसे तीक्ष्ण दृष्टि से देखता रहा और फिर बोला 'नहीं! हस्तिनापुर की सबसे सुंदर मधुबाला को कहो, कर्ण को आज छककर गंधार की सर्वश्रेष्ठ माधवी पिलाए। इसकी आंखें तभी खुलेंगी। मुझे लगता है कि आजकल इसका अपनी रानियों से कुछ अधिक ही झगड़ा हो रहा है।Ó
'मुझे तो लगता है कि आजकल मेरा अपने-आपसे ही झगड़ा चल रहा है।Ó कर्ण उठकर खड़ा हो गया, 'अभी चलता हूं मन शांत होगा तो आ जाऊंगा।Ó 'अरे तुम तो रुष्ट ही हो गए।Ó दुर्योधन ने उसका हाथ पकड़ लिया, 'बैठो। तुमने शायद नहीं सुना। मुझे पितामह ने क्या कहा है। इस बार तो उन्होंने मेरी भी दृष्टि पूर्णत: खोल दी है। उन्होंने बताया कि उनका सारा जीवन केवल दो लक्ष्यों से प्रेरित रहा है।
एक तो कुरुकुल का उच्छेद न हो और दूसरे, उसके यश का निरंतर विस्तार होता रहे। वे चाहते हैं कि मैं भी इन दो लक्ष्यों को सिद्ध करने में उनका साथ दूं। वे यह मानते हैं कि हस्तिनापुर के राजा पांडु थे, धृतराष्ट्र नहीं। इसलिए पांडु के पुत्र ही अपने पिता की संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। इसलिए मुझे कलह नहीं करनी चाहिए और चुपचाप आधा राज्य पांडवों को दे देना चाहिए।Ó 'तो इसमें नई बात क्या है। वे तो सदा ही तुम्हारी आंखें खोलने का प्रयत्न करते रहे हैं। अब तुम ही न खोलो तो वे क्या कर सकते हैं।Ó शकुनि बोला।
'नया यह है कि उन्होंने मुझे सारा राज्य पांडवों को देने को नहीं कहा।Ó दुर्योधन हंसा, 'यदि राज्य पांडु का था और अब उसके उत्तराधिकारी पांडव ही हैं तो फिर ये लोग सारा राज्य युधिष्ठिर को दिए जाने की बात क्यों नहीं कहते? वृद्ध भीष्म की बात सुनकर महाराज ने भी मुझसे कहा कि ज्येष्ठ पुत्र यदि अहंकारी हो तो उसे राज्य की प्राप्ति नहीं होती।
उन्होंने मुझे बताया कि देवापि और बाह्लीक दोनों ही शांतनु से बड़े थे, किंतु अनेक कारणों से राज्य उनको न मिलकर शांतनु को मिला। उसी प्रकार पिताजी भी अंगहीन थे इसलिए राज्य उनको नहीं दिया गया, उनसे छोटे पांडु को दिया गया। अत: अब पांडु के पश्चात् राज्य के उत्तराधिकारी उसके पुत्र हैं।
पिताजी तो राज्य के अधिकारी थे ही नहीं तो फिर उनका पुत्र होकर मैं स्वयं को राज्य का उत्तराधिकारी कैसे समझता हूं। जो राजा का पुत्र नहीं है, वह उसके राज्य का अधिकारी कैसे हो सकता है। अत: मैं पराए धन का अपहरण करना चाहता हंू। युधिष्ठिर राजा का बेटा है, इसलिए न्यायत: प्राप्त हुए राज्य पर उसी का अधिकार है।
अत: मैं सारा नहीं तो आधा राज्य पांडवों को दे दूं। अन्यथा मैं अपने साथ-साथ अपने छोटे भाइयों की मृत्यु का कारण बनूंगा।...Ó
सब ने चौंक कर दुर्योधन की ओर देखा: उसके पिता और राजा ने उसे स्पष्ट शब्दों में आदेश दे दिया था, तो फिर वह क्या करेगा?
'क्या हो गया है महाराज को?Ó शकुनि जैसे अपने आप से पूछ रहा था।
'कुछ नहीं!Ó दुर्योधन बोला, 'डर गए हैं। पांडवों की शक्ति के वर्णन से डर गए हैं। कृष्ण के जादू-टोने से डर गए हैं। सारा जीवन, उन्होंने विलास का सेवन किया है। राजसिंहासन पर बैठे हैं और आदेश दिए हैं। न युद्ध किया है, न रक्त बहाया है। भोग किया है किंतु कभी उसका मूल्य नहीं चुकाया है उन्होंने। इसलिए अब भयभीत हैं।
उन्हें लगता है कि उनके सारे पुत्र मारे जाएंगे और यह राज्य भी उनसे छिन जाएगा। कौन जाने उनके अंतिम दिन कारागार में कटें, उग्रसेन के समान। यदि युद्ध न हो तो कम से कम वे राजसिंहासन पर तो बैठे रहेंगे... यदि मन में इतना ही सत्य और धर्म होता और वे सच्चे मन से मान रहे होते कि राज्य पांडु का है तो क्यों अब तक बैठे हुए थे उस सिंहासन पर?
क्यों पांडवों को वन भेज रखा था। बैठा देते उन्हें सिंहासन पर और स्वयं उनके स्थान पर वन चले जाते। अपना सारा जीवन तो सिंहासन पर बैठ कर व्यतीत किया, अब मेरी बारी आई है तो उन्हें स्मरण हो आया है कि राज्य पांडु का था।Ó
शकुनि को लगा कि दुर्योधन सर्वथा सत्य कह रहा है। नहीं तो गांधारी वह सब कहती दुर्योधन से। शकुनि ने स्वयं उसे कहते सुना था कि वस्तुत: हस्तिनापुर का राज्य पांडु का ही था और उसी के पुत्र उसके उत्तराधिकारी हो सकते थे। उसने तो यहां तक कह दिया था कि पूर्वजों के जीवित रहते और किसी का राज्य पर अधिकार ही कैसे हो सकता है।
भीष्म के जीवित होते हुए, सिंहासन पर धृतराष्ट्र का ही कोई अधिकार नहीं है तो भीष्म, धृतराष्ट्र, विदुर और युधिष्ठिर के जीवित रहते हुए, दुर्योधन कैसे हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर बैठने की कल्पना कर सकता है।...
हां! गांधारी भी डर गई थी।... शकुनि सोच रहा था... अपनी मृत्यु से नहीं। अपने पुत्रों की मृत्यु से। पुत्र-मोह में भी कितनी शक्ति है। शकुनि ने तो अपना सारा जीवन हस्तिनापुर में व्यतीत कर दिया था कि किसी प्रकार कुरुवंश समूल नष्ट हो और वह अपना प्रतिशोध ले सके।...
और उसकी बहन आज उसी कुरुवंश को जीवित रखने के लिए हस्तिनापुर का सिंहासन भी छोड़ना चाहती है। पुत्रों से बहुत मोह हो गया है उसको। कुरुवंश को अपना वंश मानने लगी हैं। भूल गई गांधारों के अपमान को।... 'तो दुर्योधन! अब करना क्या है?Ó शकुनि ने पूछा।
क्रमश: - नरेन्द्र कोहली