
चिन्मय मिश्र - वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी,
भारतीय संस्कृति में शिल्प परंपरा सामान्यतया दो परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विकसित हुई है। पहली समाज की आनुष्ठानिक या धार्मिक आवश्यकताएं और दूसरी है मनुष्य की व्यक्तिगत आवश्यकताएं। इसमें साधारण शिल्प भी आते हैं और विशिष्ट या कीमती शिल्प भी। इन्हें विकसित होने में सहस्त्राब्दियां लग गई हैं। शिल्प परंपरा को बेहतर ढंग से समझने के लिए हम इनके तीन वर्गीकरण कर सकते हैं।
पहला है 'लोक शिल्प', इसे सामान्यतया व्यक्तिगत उपयोग में लाया जाता है और इनका निर्माण किसी गांव/अंचल में सीमित व्यक्तियों के लिए किया जाता है, जिनके कि शिल्पकार सीधे संपर्क में रहते हैं। शुरुआती दौर में इसे महिलाओं के जरिये की जाने वाली कशीदाकारी से समझा जा सकता है, जो स्थान विशेष तक ही सीमित थी। इस वर्ग में दूसरी तरह के शिल्प 'ग्रामदेवता' के लिए मिट्टी, लकड़ी या पत्थर से तैयार किए जाते रहे हैं। यह विशिष्ट त्योहारों जैसे दिवाली, बिहू, दुर्गापूजा, गणगौर आदि के अवसर पर प्रयोग में लाए जाते हैं।
दूसरी श्रेणी में वे शिल्प आते हैं, जो किसी धार्मिक स्थल के इर्द गिर्द विकसित होते हैं। यह सामान्यतया उस विशिष्ट धार्मिक संस्थान और उससे जुड़े अनुष्ठानों के अनुरूप विकसित हुए हैं और निर्मित किए जाते हैं। एक समय वाराणसी और कांजीवरम दोनों स्थानों पर वस्त्रों की बुनाई वहां होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ति के लिए ही की जाती थी। ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ जी के सानिध्य में मंदिर की आवश्यकतानुसार बहुत से शिल्प विकसित हुए। इनमें प्रमुख हैं, कपड़े पर बनाए जाने वाले पटचित्र, लकड़ी पर पेंटिंग एवं नक्काशी से भगवान के विग्रह तैयार करना, पत्थर पर नक्काशी और कपड़े पर होने वाला एप्लिक वर्क।
शिल्प का तीसरा स्वरूप है 'व्यावसायिक शिल्प', यह विशिष्ट शिल्पकारों अथवा जाति समूहों के जरिये तैयार किए जाते हैं। इन विशिष्ट कौशल से निर्मित शिल्पों के अपने निर्माण केंद्र/ स्थान होते हैं। इन शिल्पों में आप तकनीक की महारत देख सकते हैं, जो वर्षों की कड़ी साधना से पाई जाती है। यह जटिल तकनीक है। इस श्रेणी में विशिष्ट बुनकर, छपाईगर, रंगरेज, सुनार एवं अन्य धातुओं पर कार्य करने वाले विशिष्ट शिल्पकारों को रख सकते हैं। इनके अपने पारंपरिक उपकरण और तकनीक होती हैं। इसका एक उदाहरण राजस्थान और गुजरात (कच्छ) में होने वाली अजरख वस्त्र छपाई तकनीक है। महात्मा गांधी ने भारतीय शिल्प परंपरा को समझा और ग्रामोद्योग के विकास के माध्यम से गांव, ग्रामीणों और शिल्पकारों के पुनस्र्थापना के कार्य का महत्व समझा। एक शिल्प 'चरखा' भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन गया। गौरतलब है साधारण तकनीक और स्थानीय उपलब्ध साधनों से निर्मित होने वाले शिल्पों को यदि प्रोत्साहन दिया जाए तो वे बेरोजगारी और गरीबी को कम करने में सहायक हो सकते हैं।
Published on:
08 Mar 2026 02:06 pm
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