
पश्चिम एशिया में अमरीका-इजरायल और ईरान के बीच पिछले एक सप्ताह से जारी संघर्ष अब ऐसे मोड़ पर है, जहां दोनों पक्षों को लौटने का रास्ता नहीं सूझ रहा है। यह युद्ध केवल तीन देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने लगभग 15 राष्ट्रों को प्रत्यक्ष रूप से अपनी चपेट में ले लिया है। सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि जब पूरी दुनिया को एक सुर में शांति की अपील करनी चाहिए थी, तब वैश्विक मंच पर सन्नाटा पसरा हुआ है। युद्ध को समाप्त करने के लिए किसी बड़े कूटनीतिक प्रयास का अभाव इस आशंका को बल दे रहा है कि यह संघर्ष अभी और लंबा खिंचेगा, जिससे अन्य देशों के भी इसमें घसीटे जाने का खतरा बढ़ गया है। अमरीका और इजरायल की रणनीति ईरान में 'सत्ता परिवर्तन' पर टिकी है, लेकिन इतिहास गवाह है कि हवाई बमबारी से कभी किसी राष्ट्र का सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ। इराक, लीबिया और अफगानिस्तान के उदाहरण बताते हैं कि विदेशी हस्तक्षेप लोकतंत्र लाने के बजाय 'उग्र राष्ट्रवाद' को जन्म देता है। ईरान की जनता भले ही अपने शासकों से मतभेद रखती हो, लेकिन बाहरी हमले की स्थिति में वे मतभेदों को भुलाकर विदेशी दुश्मन के खिलाफ एकजुट हो सकते हैं। यही कारण है कि खामेनेई शासन के धुर विरोधी भी फिलहाल शांत हैं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के वर्तमान परिदृश्य में 'दोहरे मापदंड' साफ नजर आ रहे हैं। स्पेन को छोड़कर अधिकांश यूरोपीय देश अमरीका-इजरायल के खेमे में खड़े दिखते हैं, लेकिन शांति की दिशा में कदम बढ़ाने को कोई तैयार नहीं है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर रखने वाला रूस मध्यस्थता की पेशकश तो कर रहा है, लेकिन यूक्रेन के साथ स्वयं युद्धरत होने के कारण उसकी साख पर सवालिया निशान हैं। दूसरी ओर, चीन की चुप्पी रणनीतिक है, क्योंकि उसकी महत्त्वाकांक्षी नजरें ताइवान पर टिकी हैं। ऐसे में दुनिया की निगाहें भारत और ब्राजील जैसे देशों पर हैं, जिनके संबंध ईरान और अमरीका-इजरायल, दोनों से संतुलित हैं। हालांकि, भारत भी तब तक हस्तक्षेप के लिए आगे नहीं बढऩा चाहेगा जब तक परिणाम की कोई ठोस उम्मीद न दिखाई दे।
इस युद्ध का लंबा खिंचना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी 'ब्लैक होल' से कम नहीं होगा। दुनिया का लगभग बीस फीसदी तेल और गैस हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जहां जहाजों की आवाजाही पहले ही ठहर चुकी है। कतर जैसे बड़े एलएनजी उत्पादक की यह चेतावनी डराने वाली है कि यदि संघर्ष नहीं थमा, तो दो सप्ताह के भीतर खाड़ी देशों का ऊर्जा निर्यात ठप हो सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो वैश्विक जीडीपी गिर जाएगी। भारत के लिए भी यह स्थिति घातक होगी, जहां एलएनजी की आपूर्ति में 40 प्रतिशत की कटौती उर्वरक, बिजली और सीएनजी वितरण को ठप कर सकती है। समय रहते यदि युद्ध रोकने की सार्थक पहल नहीं की, तो इसकी आंच से कोई भी सुरक्षित नहीं रह पाएगा।
Published on:
08 Mar 2026 01:51 pm
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