
मुकेश भूषण - वरिष्ठ पत्रकार,
नेपाल की राजनीति में बालेन्द्र शाह, जिन्हें लोग प्यार से 'बालेन' कहते हैं, इस समय सबसे चर्चित नाम है। 35 वर्षीय बालेन ने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में काठमांडू के मेयर पद से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और अब वहां हुए आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार के रूप में उभरे हैं। हालांकि अंतिम नतीजा आना अभी बाकी है लेकिन, मतगणना के रुझानों से पता चल रहा है कि उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की लहर चल रही है और पुरानी पार्टियों (कांग्रेस और वामदलों) का लगभग सूपड़ा साफ होने जा रहा है। भारत के विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियर बालेन्द्र शाह राजनीति में आने से पहले नेपाल के प्रसिद्ध रैपर थे। उनके गानों में अक्सर भ्रष्टाचार और खराब व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा झलकता था, जिसने उन्हें युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाया। काठमांडू का मेयर रहते उनके कामों को पसंद किया गया। पिछले दिनों 'जेन-जी क्रांति' में उपद्रवियों का समर्थन करने के बाद बालेन की लोकप्रियता आसमान छूने लगी।
यह राजनीतिक विडंबना ही है कि सत्तर के दशक में जिस तरह केपी शर्मा ओली तराई क्षेत्र झापा में स्थानीय भू-स्वामियों और पुरानी संस्थाओं के खिलाफ वामपंथी आंदोलन खड़ा कर नेपाल की राजनीति में चमके थे, आज वहीं पर उनके खिलाफ आंदोलन खड़ा कर बालेन ने उनका राजनीतिक जीवन लगभग समाप्त कर दिया। समर्थकों की नजर में 74 वर्षीय ओली कम्युनिस्ट आंदोलन के जनक हैं, जबकि विरोधी मानते हैं कि उन्होंने पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र को खत्म कर दिया एवं भ्रष्टाचार के प्रति आंखें बंद कर लीं। नेपाली कांग्रेस सहित कई अन्य देशों में भी पुराने दल ऐसे आरोपों के झंझावात झेल रहे हैं।
नेपाल की राजनीति इस समय पीढ़ीगत बदलाव के दौर में हैं। पूर्व प्रधानमंत्री ओली (सीपीएन-यूएमएन) को सीधे मुकाबले में पछाडऩे के बाद बालेन इस बदलाव के नए हीरो बन गए हैं। भ्रष्टाचार खत्म करना, सरकारी कामकाज में पारदर्शिता, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में आमूल-चूल बदलाव जैसे वादों पर नेपाली जनता ने उन्हें यह मौका दिया है। बालेन समय-समय पर ओली की तरह ही 'राष्ट्रवादी घोड़ों' की भी सवारी करते रहे हैं। एक तरह से भारत पर निर्भर होने के बावजूद वह 'नेपाल फर्स्ट' का नारा बुलंद कर पड़ोसियों से समान दूरी रखने पर जोर देते हैं। यदि बालेन प्रधानमंत्री बनते हैं तो वह भारत के साथ रिश्तों में ओली की तरह ही, या उनसे ज्यादा बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन सकते हैं। कोरोनाकाल में प्रधानमंत्री ओली के नेपाली संसद में दिए इस बयान को कोई कैसे भूल सकता है- 'भारतीय वायरस से अच्छा है चीनी वायरस'। हालांकि वामपंथी पृष्ठभूमि के कारण ओली का चीन के प्रति रुझान जगजाहिर था, लेकिन बालेन का कोई स्पष्ट रुझान न होना उन्हें आम लोगों को भ्रमित करने का कौशल प्रदान करता है। 'काम करने वालों को चुनो' का नारा लगाने वाले बालेन यदि सरकार बनाने के बाद 'डिलीवर' नहीं कर पाते हैं तो राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करने के प्रयास में भारत से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को और नुकसान पहुंचा सकते हैं। भारत के साथ संधियों की समीक्षा करने जैसे पूर्व के बयानों से नहीं लगता कि उन्हें दोनों देशों के बीच सदियों से स्थापित रोटी-बेटी के रिश्ते की कोई परवाह है। फिल्मों में सीता माता को भारतीय बताने पर भी उन्हें ऐतराज था क्योंकि जनकपुर अब नेपाल में है। बालेन ने अपने मेयर कार्यालय में 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा लगवा दिया था जिसमें वर्तमान भारत के उत्तराखंड (कुमाऊं-गढ़वाल), हिमाचल प्रदेश (शिमला), सिक्किम और दार्जिलिंग के हिस्सों को नेपाल के भाग के रूप में दिखाया गया था।
'मिलेनियल' बालेन्द्र की छवि एक 'अस्थिर और लोकलुभावन' नेता की है। उनके लिए वैचारिक प्रतिबद्धताओं का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। जब वह कहते हैं- 'नो प्लान इज द प्लान', तो यह 'जेन-जी' पीढ़ी को तो लुभाता है, लेकिन किसी राष्ट्र की स्थिरता के लिए यह एक 'डेंजरस प्लान' साबित हो सकता है। उनके राजनीतिक दर्शन में समाजवाद, साम्यवाद या पूंजीवाद जैसी पुरानी घिस चुकी अवधारणाओं के बजाय 'व्यवहारवाद' या कहें कि 'अवसरवाद' अधिक हावी है, जहां सही-गलत का पैमाना वैचारिक या नैतिक मूल्यों से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के 'लाइक्स' और 'शेयर' से तय होता है। यही कारण है कि 'रैप कल्चर' में जीते हुए भी 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का नारा बुलंद करने में कोई खोट नहीं दिखता। यह पीढ़ी एक ही समय में पूंजीवादी, साम्यवादी और आध्यात्मिक सबकुछ हो सकती है। आधुनिक लोकतंत्र पर अटूट भरोसा और पुरानी राजशाही पर 'नासमझ गर्व' दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। इसीलिए कुछ विश्लेषक बालेन को एक 'सेतु' के रूप में देखते हैं जो पुराने राजतंत्र के प्रति सहानुभूति रखते हैं लेकिन आधुनिक नेतृत्व चाहते हैं। यह एक नए तरह का विरोधाभासी मॉडल है जो नेपाली कम, अमरीकी ज्यादा है। भारत में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी में इस अवस्था का एक प्रतिबिंब देखा जा सकता है।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या नेपाल की कथित 'जेन-जी क्रांति' वास्तव में मौलिक थी या यह अमरीकी सोशल मीडिया दिग्गजों की प्रयोगशाला की उपज? क्या दुनिया के लोकतंत्रों की नब्ज प्रभावित करने वाला 'अलादीन का चिराग' (सूचना तकनीक) अमरीका की मुट्ठी में नहीं है? नेपाल का यह नया प्रयोग आने वाले समय में दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए नए सबक लिखेगा। राजनीतिक दर्शनों का झंडा उठाने वाले पुराने दलों के लिए यह किसी चेतावनी से कम नहीं है, जिन्होंने व्यवहार में अवसरवादिता को ही राजनीतिक दर्शन बना रखा है।
Published on:
08 Mar 2026 02:36 pm
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