
फिरदौस जाकिर मिंडा - विधि विशेषज्ञ, राजस्थान हाईकोर्ट.
भारत-अमरीका व्यापार समझौते पर बहस संकीर्ण रूप से शुल्क और रियायतों पर केंद्रित रही है, जिससे व्यापक परिप्रेक्ष्य की अनदेखी हुई है। यह कोई सामान्य वाणिज्यिक समझौता नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ते संरक्षणवाद और महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित एक रणनीतिक हस्तक्षेप है। आज व्यापार राज्य-प्रबंधन का एक साधन है। इस समझौते का सार्थक मूल्यांकन करने के लिए इसे लाभ-हानि के हिसाब-किताब के रूप में नहीं, बल्कि भारत की भू-राजनीतिक स्थिति और दीर्घकालिक रणनीति के घटक के रूप में देखा जाना चाहिए।
भारत-अमरीका व्यापार समझौते को एक लेन-देन संबंधी समझौते के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिबंधों के तहत संबंधों के पुनव्र्यवस्थापन के रूप में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। शुल्क वृद्धि, कानूनी विवादों और रणनीतिक विचलन से भरे एक वर्ष के बाद, दोनों पक्ष एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गए, जहां निष्क्रियता की लागत समझौते की लागत से अधिक होने लगी थी। यह समझौता सभी मतभेदों को हल करने का दावा नहीं करता है, बल्कि, यह अविश्वास के संरचनात्मक मतभेद में तब्दील होने से पहले संबंधों को स्थिर करता है। भारत-अमरीका संबंधों में आई नरमी ने अन्य वैश्विक शक्तियों के लिए अवसर सृजित किए। इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह समझौता एक बड़ी सफलता से ज्यादा एक दिशा-सुधार है- अनिश्चितता के दौर में खोए हुए रणनीतिक समय को पुन: प्राप्त करने का प्रयास। भारत की बदलती ऊर्जा नीति को वैचारिक पुनर्गठन के बजाय व्यापक आर्थिक समायोजन के रूप में देखा जा रहा है।
रूसी तेल आयात कई वर्षों के निचले स्तर पर आ गया है, लेकिन पूर्ण रूप से बंद करना विवेकपूर्ण होने के बजाय अस्थिरता पैदा करने वाला होगा। यह समझौता इस वास्तविकता को ध्यान में रखता है। अचानक संबंध तोडऩे के बजाय धीरे-धीरे विविधीकरण को नीति की विश्वसनीयता और स्थायित्व का संकेत माना जाता है। भारत ने वार्ता को जिस तरह से संभाला, वह परिणाम जितना ही महत्वपूर्ण है। टकराव के बजाय निरंतर बातचीत के माध्यम से मतभेदों को सुलझाकर, भारत ने गंभीर और विश्वसनीय भागीदार के रूप में अपनी छवि को मजबूत किया है। यह पूर्ण मुक्त व्यापार समझौता नहीं हो सकता है। यह सीमित और लचीला समझौता है, जिसे वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाया गया है। अमरीका दीर्घकालिक निश्चितता प्रदान नहीं कर सकता क्योंकि उसकी नीतियां अक्सर बदलती रहती हैं, जबकि भारत अपने विकल्पों की रक्षा के लिए लचीलेपन को प्राथमिकता देता है।
Published on:
08 Mar 2026 02:49 pm
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