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ड्रोन अब रणनीतिक शक्ति संतुलन की कुंजी

विनय कौड़ा

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जयपुर

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Neeru Yadav

May 21, 2025

दक्षिण एशिया के नाजुक सामरिक धरातल पर भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया संघर्ष ने एक नया अध्याय रच दिया है। पहली बार इस संघर्ष में ड्रोन के इस्तेमाल से यह संकेत मिलता है कि युद्ध की प्रकृति बदल रही है। अब रणस्थल जमीन नहीं, आकाश होगा। जहां सैनिकों के साथ-साथ सेंसर और सिग्नल भी निर्णायक होंगे। अब ड्रोन केवल निगरानी के उपकरण नहीं रहे। वे रणनीति के नवोन्मेषी औजार हैं। वे हमला करते हैं, जासूसी करते हैं, प्रतिरोध को तोड़ते हैं और मनोबल को भेदते हैं।
भारत-पाक संघर्ष की खास बात यह रही कि ड्रोन पहली बार महत्त्वपूर्ण सैन्य हथियार के रूप में सामने आए। भारत ने न केवल पाकिस्तान के ड्रोन हमलों को विफल किया, बल्कि जवाबी कार्रवाई में अत्यंत लक्षित और संतुलित ड्रोन हमले किए। भारत की प्रतिक्रिया में उसकी इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, आकाशतीर प्रणाली और सतह से हवा में मार करने वाली प्रणालियों जैसे एस-400 ट्रायम्फ, बराक 8, आकाश, पेचोरा, तथा ड्यूल बैरल गन ने एकीकृत रूप से अपनी क्षमता सिद्ध की। इस बहुआयामी रक्षा कवच ने भारत की सैन्य और असैन्य संरचनाओं को सुरक्षित रखते हुए दुश्मन की आक्रामकता को विफल कर दिया। पाकिस्तान के एक रणनीतिक विश्लेषक कमर चीमा ने भी कहा है कि भारतीय ड्रोन के पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश से वहां अफरातफरी मच गई जिसने पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व को भ्रमित कर दिया। भारतीय वायुसेना की श्रेष्ठता का उल्लेख करते हुए चीमा ने पाकिस्तानी सेना को एस-400 जैसी शक्तिशाली प्रणाली की जरूरत पर जोर दिया है। इस क्षेत्रीय संघर्ष का महत्त्व केवल भारत-पाक के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। यूक्रेन-रूस युद्ध ने इस नवाचार की पटकथा लिखी है। एक ऐसा युद्ध जिसने ड्रोन को सिर्फ सैन्य परिदृश्य का भागीदार नहीं, बल्कि उसकी धुरी बना दिया। ईरानी शाहेद ड्रोन की लंबी उड़ानें, रूसी लैंसेट की घातक सटीकता और यूक्रेनी बायराक्तर टीबी2 की आक्रामक उपस्थिति से साफ है कि युद्ध अब केवल तोपों और टैंकों का खेल नहीं रहा, बल्कि आकाश में घूमते, डेटा-संचालित स्वायत्त यंत्रों की शतरंज बन चुका है।
इसी क्रम में हमास और इजरायल के बीच चल रहे सशस्त्र संघर्ष को देखना भी समीचीन होगा। वहां हमास के आत्मघाती ड्रोन हमलों और इजरायल की अत्याधुनिक आयरन डोम प्रणाली के बीच की संघर्ष गाथा यह बताती है कि ड्रोन अब केवल खतरे की चेतावनी नहीं, बल्कि स्वयं खतरा बन चुके हैं। इस तकनीकी क्रांति की गूंज दक्षिण एशिया में भी सुनाई दी है। भारत के पास विविध और अत्याधुनिक ड्रोन संरचना है। इसमें स्वदेशी के साथ-साथ अमरीका और इजरायल से प्राप्त तकनीक भी शामिल है। स्वदेशी में विकसित नागास्त्र जैसे लॉइटरिंग म्युनिशन और डीआरडीओ द्वारा निर्मित रुस्तम, निशांत और लक्ष्य-1 जैसे निगरानी ड्रोन पहले से ही ऑपरेशनल हैं। इस संघर्ष में भारत ने ड्रोन का उपयोग कर पाकिस्तान के तीन प्रमुख सैन्य ठिकानों को निष्क्रिय किया। इसके अतिरिक्त, खास प्रकार के ड्रोन को आतंकी ठिकानों के सफाए के लिए तैनात किया गया। दूसरी ओर, पाकिस्तान का ड्रोन कार्यक्रम मुख्यत: चीन और तुर्की पर आधारित है। उसके पास भी कुछ स्वदेशी प्रणालियां हैं, जैसे बुर्राक और शहपर। बुर्राक चीन की सहायता से विकसित किया गया, वह निगरानी के साथ-साथ हमले करने में भी सक्षम है। शहपर एक मध्यम ऊंचाई और दीर्घकालिक उड़ान क्षमता वाला ड्रोन है।
इस संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया पारंपरिक फाइटर जेट्स की तुलना में ड्रोन सस्ते, त्वरित रूप से तैनात किए जाने योग्य और बहुउद्देश्यीय हैं। इनकी मदद से गहराई तक हमले संभव हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक नई चुनौती प्रस्तुत करता है। इस बात को गंभीरता से समझना होगा कि जिस प्रकार हमास ने ड्रोन के जरिए इजरायल पर चौंकाने वाले हमले किए, वैसे ही पाकिस्तान भी भविष्य में उन्नत ड्रोन के साथ युद्ध में वापसी कर सकता है। दक्षिण एशिया में ड्रोन अब सिर्फ निगरानी उपकरण नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति संतुलन की कुंजी बन चुके हैं। भारत-पाकिस्तान के इस ताजा संघर्ष ने यह रेखांकित कर दिया है कि आने वाले वर्षों में युद्ध या संघर्ष के दौरान ड्रोन किसी भी देश की ताकत का संकेत साबित होंगे। भारत को इस नवयुगीन युद्ध प्रणाली में न केवल अग्रणी बने रहना होगा, बल्कि अपनी स्वदेशी रक्षा क्षमता को भी निरंतर सशक्त करना होगा।
सैन्य विशेषज्ञों से लेकर रक्षा उद्योग तक, सभी की निगाहें अब आधुनिक ड्रोन मॉडल्स, उनकी मारक क्षमता, व्यापार, और आयात-निर्यात पर केंद्रित हैं। लेकिन इस तकनीकी बहस के बीच एक गंभीर पहलू लगातार उपेक्षित हो रहा है - युद्ध का नैतिक पक्ष। तकनीक की दौड़ में नैतिकता कहीं पीछे न छूट जाए, इसका ध्यान रखना आज की जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का पालन, आम नागरिकों की सुरक्षा और युद्ध की अमानवीयता को कम करने के प्रयास अनिवार्य हैं। वरना ड्रोन, अत्याचार का आधुनिक औजार बनकर रह जाएंगे। इससे भी ज्यादा अहम यह है कि युद्ध के मूल कारणों की पड़ताल हो। क्योंकि तकनीक समाधान नहीं, साधन मात्र है। हथियारों की प्रतिस्पर्धा शांति की गारंटी नहीं दे सकती।