
nuclear weapons
अमरीका, कनाडा, चीन तथा भारत के हिमालयी क्षेत्र कड़ाके की ठंड से गुजर रहे हैं। अमरीका और कनाडा का तो दो तिहाई हिस्सा बर्फ में ढंक चुका है। नियाग्रा समेत तमाम झरने, नदी और झीलें जम चुकी हैं। दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं। जनजीवन ठप है। ‘बॉम्ब’ नामक बर्फीले तूफान के कारण तापमान माइनस ५० डिग्री से भी नीचे जा चुका है।
वैज्ञानिक भी हैरान हैं कि क्या यह हिमयुग का आगाज है? मौसम और जलवायु में जिस तरह से परिवर्तन हो रहा है वह साफ दर्शा रहा है कि विकास की अंधी दौड़ ने पर्यावरण को खतरनाक स्तर तक प्रदूषित कर दिया है, मौसम चाहे कोई सा भी हो (गर्मी या सर्दी) चक्र तो बदल रहा है, उनका प्रकोप भी चरम पर है। भारत में भी दिसम्बर २०१७ जहां पिछले दस वर्षों में सबसे गर्म रहा तो जनवरी २०१८ के दस्तक देते ही कड़ाके की सर्दी का आगाज हो गया। पिछले एक सप्ताह में ही उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश ही नहीं आमतौर पर इस समय खुशनुमा रहने वाले कलकत्ता, मुंबई जैसे तटीय शहरों में भी सर्दी असहनीय हो गई है।
महानगरों और औद्योगिक शहरों में स्मॉग का प्रकोप लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। जम्मू-कश्मीर, उत्तरप्रदेश, बिहार में सुरक्षा बलों के जवानों सहित सवा सौ से ज्यादा लोग सर्दी और हिमस्खलन के शिकार हो चुके हैं। मौसम में इस बदलाव के पीछे बढ़ता औद्योगिकरण, प्रदूषण, परमाणु मिसाइलों का परीक्षण तो कारण नहीं है? अमरीका और कनाडा में आर्कटिक सागर से उठे बर्फीले तूफान ने ७० साल और पिछली गर्मियों में ब्रिटेन, न्यूजीलैण्ड और कनाडा, अमरीका में तापमान ने ऊंचाईयों का पचास साल का रिकार्ड ध्वस्त कर दिया। क्यों?
इस पर गंभीरता से चिंतन जरूरी है। हथियारों की होड़ और रासायनिक उद्योगों ने ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंचाया है। यह सब जानते हुए भी अमरीकी राष्ट्रपति ने जून २०१७ में पेरिस पर्यावरण समझौते से अपने को अलग करने की घोषणा कर दी। अमरीका-चीन-रूस में नम्बर वन बनने की होड़ को पूरा विश्व भुगत रहा है। पर्यावरण पर ध्यान नहीं दिया गया और प्रदूषण मिटाने के साथ ही परमाणु हथियारों की दौड़ पर काबू नहीं रखा गया तो वह दिन दूर नहीं जब प्रकृति ही मानवता को खत्म कर दे।
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