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किताबों, यूनिफॉर्म और फीस के बोझ तले दबी शिक्षा

बात किताबों और यूनिफॉर्म की ही नहीं है, फीस के मामले में भी मनमानी का दौर जारी है। सुप्रीम कोर्ट तक इस मनमानी को लेकर कई बार तल्ख टिप्पणियां कर चुका है। स्कूल शिक्षा से शुरू होती यह मनमानी उच्च शिक्षा के स्तर तक बढ़ती ही जा रही है।

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Patrika Desk

Apr 26, 2023

किताबों, यूनिफॉर्म और फीस के बोझ तले दबी शिक्षा

किताबों, यूनिफॉर्म और फीस के बोझ तले दबी शिक्षा

प्रेमपाल शर्मा
शिक्षाविद और पूर्व संयुक्त सचिव, भारत सरकार

हरियाणा के सोनीपत के स्कूल की खबर आपकी नजरों से गुजरी होगी, जिसमें पहली कक्षा के बच्चे को लगभग 6000 रुपए में 45 किताबें दी गईं। अच्छी बात यह रही कि अभिभावकों ने शिक्षा अधिकारी से मिलकर विरोध जताया। लेकिन, क्या यह अकेली घटना है और क्या यह पहली बार हो रहा है? शिक्षा में यह रोग चार दशक पहले दिल्ली जैसे महानगर और दूसरे शहरों में तब शुरू हुआ था, जब सरकारी स्कूलों को गरियाते हुए निजी स्कूल मैदान में आए। अब तो यह कारोबार इतना बड़ा आकार ले चुका है कि कल्पना ही नहीं की जा सकती। न जाने कितने निजी स्कूल एक ब्रांड के रूप में काम करते हैं जहां उनकी अपनी किताबें भी छपती हैं, ड्रेस भी बनती है। पर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा।
बात किताबों और यूनिफॉर्म की ही नहीं है, फीस के मामले में भी मनमानी का दौर जारी है। सुप्रीम कोर्ट तक इस मनमानी को लेकर कई बार तल्ख टिप्पणियां कर चुका है। स्कूल शिक्षा से शुरू होती यह मनमानी उच्च शिक्षा के स्तर तक बढ़ती ही जा रही है। इसकी बड़ी वजह यही है कि सरकारें निजी शिक्षण संस्थाओं की मनमानी पर अंकुश लगाने के वादे तो खूब करती हैं, लेकिन जो कानून-कायदे बनते हैं उनकी पालना तक नहीं होती। चिंता इस बात की भी है कि वे निजी शिक्षण संस्थाएं भी मनमानी के इस दौर में आरोपों के घेरे में आ जाती हैं, जो अभिभावकों को महंगी शिक्षा के बोझ से मुक्ति दिलाने का काम कर रही हैं।
दिल्ली के एक और निजी स्कूल की किताबें देखने का मौका मिला। हिंदी की किताब का नाम हिंदी पाठमाला है। चौथी क्लास की इस किताब की कीमत 410 है और पूरे बस्ते का बोझ 5000 रुपए से ज्यादा। आठवीं की हिंदी व्याकरण की किताब की कीमत 575 है और पाठ्यक्रम की किताब 490 जबकि एनसीईआरटी की किताबें प्रत्येक सिर्फ 50 रुपए की है। इसी स्कूल में आठवीं के बच्चे को जर्मन और इंग्लिश की पांच किताबें दी गई हैं। क्या सरकार को इन निजी स्कूलों की हरकतों का पता नहीं है? क्या दिल्ली में बैठे अभिभावकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों ने इसके खिलाफ कभी आवाज उठाई? जब एनसीईआरटी की हिंदी की किताब समेत समाज विज्ञान, गणित सभी की कीमत 50 रुपए से ज्यादा नहीं है, तो ये निजी स्कूल 10 गुना कीमत पर किताबें क्यों दे रहे हैं।
लगभग 10 वर्ष पहले केंद्र सरकार ने आदेश निकाला था कि निजी स्कूल जो भी किताबें देंगे, वे सब उनकी वेबसाइट पर होनी चाहिए और यदि उनमें संविधान के मूल्यों के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री पाई गई तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बीच में केंद्रीय स्तर पर पाठ्यपुस्तक बोर्ड बनाने की भी बात की गई थी। बातें तो और भी होती रही हैं। वर्ष 1992 में प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में बनी समिति ने बस्ते के बोझ को कम करने के लिए भी एक विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, लेकिन हुआ कुछ नहीं। दिल्ली सरकार का ही उदाहरण लें तो स्पष्ट आदेश है कि बच्चों को कोई सामग्री स्कूल नहीं देंगे और अपनी वेबसाइट पर स्कूल के नजदीक के किताब व यूनिफॉर्म विक्रेता आदि के टेलीफोन नंबर भी प्रदर्शित करेंगे। स्कूल यूनिफॉर्म भी 3 वर्ष से पहले नहीं बदली जाएगी, लेकिन यूनिफॉर्म, किताब आदि में हर साल कोई न कोई परिवर्तन करके बच्चों से वसूली की जाती है। सबसे बड़ा अनर्थ यह हुआ है कि निजी स्कूलों का यह व्यापार अब देश के गांव-गांव में भी पहुंच रहा है। निकटवर्ती सरकारी स्कूल ठीकठाक होते हुए भी ग्रामीण अपना पेट काटकर बच्चों को वाहनों में दूर-दराज के इन निजी स्कूलों में पढऩे के लिए भेज रहे हैं। असल में निजी स्कूलों की मार्केटिंग बहुत लुभावनी है। अफसोस की बात यह है कि अभिभावकों की आंखें तब खुलती हैं, जब पांच-दस वर्ष के बाद भी बच्चों को न हिन्दी आती है, न अंग्रेजी। यहां तक कि उनके बस्ते में अंग्रेजी की जो किताबें भरी होती हैं, उन्हें भी समझ न पाने के कारण वे किताबों से सदा के लिए दूर हो जाते हैं। समझ आएं भी तो कैसे क्योंकि उन्हें पढ़ाने वालों को ही अंग्रेजी नहीं आती। खरी बात यह है कि यदि उन शिक्षकों को अंग्रेजी आ गई होती तो वे कहीं बेहतर नौकरी पा गए होते।
यह बात सही है कि इस हालत के लिए सरकार और स्कूल दोषी हैं, लेकिन मां-बाप का भी दोष कम नहीं है। गांव के गरीब किसानों-ग्रामीणों को तो माफी दी जा सकती है, लेकिन उन सक्षम और समृद्ध शहरी लोगों का क्या जो हर पल संविधान में बराबरी और न्याय की दुहाई देते हैं पर ऐसे किसी अन्याय के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाते? समस्याएं किस समाज में नहीं होतीं, लेकिन जब समाज ऐसी कायरता में जीने लगता है तो उसी का लाभ उठाकर ऐसे कारोबार फलते-फूलते हैं। शिक्षा समवर्ती सूची में है और इस अधिकार के नाते केंद्र सरकार इस प्रवृत्ति पर रोक लगा सकती है। सरकार को दृढ़ता से इस समस्या का समाधान करना चाहिए।