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उद्यमिता अभियान से खत्म होगा नौकरी का संकट

हम टाटा समूह, रिलायंस या इन्फोसिस जैसी बड़ी कंपनियों पर मंत्रमुग्ध हैं जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं। आंत्रप्रनरशिप के मामले में, हम यूनिकॉर्न कंपनियों का जश्न तो मनाते हैं पर उन छोटे व्यवसायों का नहीं, जिनकी रोजगार देने में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

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रवि वेंकटेशन
ग्लोबल अलायंस फॉर मास आंत्रप्रनरशिप (जीएएमई) के संस्थापक

राजनीतिक विश्लेषक कुछ समय तक हाल ही हुए लोकसभा चुनावों के संदेशों के विश्लेषण में व्यस्त रहेंगे लेकिन यह पहले से ही स्पष्ट है कि आर्थिक संकट और नौकरियों की कमी महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं। ऐसी कई चीजें हैं, जिनसे कहीं ज्यादा जरूरी भारत की युवा आबादी के लिए नौकरियां हैं। भारत में नौकरियों का संकट कम से कम पिछले पंद्रह वर्षों से बढ़ रहा है। यह एक ऐसी प्रचंड समस्या है जो सभी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगठनों के आंकड़ों में दिखाई पड़ती है। इनमें श्रम बल में भागीदारी दर का कम होना (कुल 49त्न) अहम आंकड़ा है। अच्छी नौकरियों की कमी विशेषकर युवाओं (80 प्रतिशत बेरोजगारों की उम्र 30 साल से कम है), महिलाओं और स्नातकों पर गहरा असर डालती है। हममें से अधिकतर लोगों के लिए अच्छी शिक्षा, गरीबी से निकलकर मध्यम या संपन्न वर्ग में जाने का पासपोर्ट समझी जाती है पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, कॉलेज से डिग्री लिए एक युवा के बेरोजगार होने की संभावना एक अनपढ़ समकक्ष की तुलना में नौ गुना अधिक है। यह डिग्रियों की गुणवत्ता के साथ निम्न स्तर के कार्यों की उपलब्धता, दोनों को दर्शाता है।
हाल ही में जो बदलाव आया है वह यह कि बेरोजगारी की समस्या अब निम्न-मध्यम वर्ग की ही नहीं है। इस वर्ष ही, आइआइटी ग्रेजुएट्स में से 35त्न और आइआइएम ग्रेजुएट्स में से लगभग 20त्न नौकरियों की तलाश में हैं। यह समस्या अब संभ्रांत लोगों को भी प्रभावित कर रही है और अच्छी बात यह है कि इसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संयोगवश अब यह एक वैश्विक मुद्दा है जो यूएस कंप्यूटर साइंस और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल ग्रेजुएट्स को भी प्रभावित कर रहा है। अच्छी नौकरियों की समस्या से जुड़ा एक कारक है हमारी आर्थिक सोच का अब भी बहुत संभ्रांतवादी होना। समृद्ध भारत के निर्माण में जुटी हमारी मीडिया, हमारे नीति-नियंता समग्र कल्याण के अन्य संकेतकों की परवाह किए बिना ही जीडीपी को अमरीका और चीन के बराबर करने के प्रति आसक्त हैं।
हम टाटा समूह, रिलायंस या इन्फोसिस जैसी बड़ी कंपनियों पर मंत्रमुग्ध हैं जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं। आंत्रप्रनरशिप के मामले में, हम यूनिकॉर्न कंपनियों का जश्न तो मनाते हैं पर उन छोटे व्यवसायों का नहीं, जिनकी रोजगार देने में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है। विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए हम आइफोन असेम्बलिंग या सेमीकंडक्टर पैकेजिंग के वास्ते 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेन्टिव' पर विचार करते हैं बजाय श्रम आधारित कंपनियों की तलाश के जो कपड़े, खिलौने, जूते या सभी प्रकार के घरेलू उत्पाद व हार्डवेयर बनाती हैं।
अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित एडमंड फेल्प्स, जिन्होंने इंग्लैंड, इसके बाद अमरीका और आगे चलकर चीन में आर्थिक उत्थान के बिंदुओं की खोजबीन की थी, ने अपनी पुस्तक 'मास फ्लरिशिंग: हाउ ग्रासरूट्स इनोवेशन क्रिएटेड जॉब्स, चैलेंज एंड चेंज' में लिखा है कि इन देशों में समृद्धि को 'खुशहाली-कामयाबी' की व्यापक भावना से परिभाषित किया गया जिसमें सार्थक कार्य (उपलब्धि और समग्र कल्याण की भावना), आत्म-अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत विकास शामिल था। इस समृद्धि का स्रोत सामाजिक मूल्यों में बदलाव था जिसने जमीनी स्तर पर व्यापक नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा दिया। इसमें कुछ ख्यात लोगों का ही नहीं, नए विचारों और व्यवसायों का योगदान भी था। इस तरह की उद्यमशीलता से आर्थिक और व्यक्तिगत समृद्धि का दौर शुरू हुआ जिसे वह 'सामूहिक उत्कर्ष' (मास फ्लरिशिंग) कहते हैं।
शतरंज से जीवन में सीखने वाले सबक: भारत में आज 73 ग्रैंडमास्टर हैं जबकि 2007 में ये 20 ही थे। सात खिलाड़ी दुनिया के शीर्ष 100 में शामिल हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे खेल प्रभावशाली तरीके से अधिक समावेशी हुए हैं जिस कारण बड़े पैमाने पर प्रतिभाओं को सामने आने का मौका मिला है। शतरंज को तमिलनाडु और गुजरात के स्कूली पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। शतरंज में हमारी सफलता सामूहिक उद्यमिता का परिणाम है। भारत समृद्ध बने, अपनी क्षमता तक पहुंचे, इसके लिए कुछ बड़ी कंपनियां और कुछ हजार तकनीकी स्टार्टअप पर्याप्त नहीं हो सकते। जरूरत है उन लाखों युवाओं के लिए जमीनी स्तर पर अभियान चलाने की जो अच्छी नौकरियों के बजाय अपना व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, विकासोन्मुख हैं। उद्यमिता के लिए तंत्र: उद्यमिता को न केवल सभी पाठ्यक्रमों का अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए, बल्कि स्कूल-कॉलेज, आइटीआइ और जिलों में हजारों उद्यम क्लब, इनक्यूबेटर और एक्सेलरेटर की भी जरूरत है। शार्क टैंक (व्यावसायिक चुनौतियों को हल करने में मदद के लिए डिजाइन की गई) जैसी प्रतियोगिताएं युवा उद्यमियों को प्रेरित करने में अत्यधिक प्रभावी हो सकती हैं। भारत की नवाचार संबंधी और आर्थिक क्षमताओं को एक छोटा-सा अभिजात्य वर्ग सामने नहीं ला सकता है। कल्पना करें एक ऐसे भविष्य की, जहां हर छोटा कस्बा और शहर बेंगलूरु जैसा लगे जो नवाचारों, अवसरों से भरपूर हो और युवाओं की उद्यमशीलता की भावना से जीवंत हो।