
कवि कन्हैयालाल सेठिया
धरती धोरां री.........धरती धोरां री
आतो सुरगां नै सरमावै,
ईं पर देव रमण नै आवै,
ईं रो जस नर नारी गावै,
धरती धोरां री..........
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अरे घास री रोटी ही,
जद बन बिलावडो ले भाग्यो
नान्हो सो अमरियो चीख पड्यो,
राणा रो सोयो दुख जाग्यो
ये वे दो मशहूर राजस्थानी रचनाएं हैं जो राजस्थान की माटी और उसके गौरव का दुनिया के सामने बखूबी बखान करती हैं। इन दोनों रचनाओं ने कवि कन्हैयालाल सेठिया को न केवल प्रसिद्धि दी बल्कि उन्हें आम आदमी का कवि बना दिया। मायड़ भाषा राजस्थानी के लिए ताउम्र संघर्ष करने वाले कवि कन्हैयालाल सेठिया की यादें आज भी राजस्थानी माटी में रची बसी हैं। कवि, स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवक के रूप में अपनी पहचान रखने वाले कन्हैयालाल सेठिया का योगदान न भुलाने जैसा है। अपने जीवन काल में उन्होंने 42 पुस्तकें लिखीं। इनमें हिंदी, राजस्थानी और उर्दू की पुस्तकें शामिल हैं।
कन्हैयालाल सेठिया का जन्म 11 सितंबर 1919 को राजस्थान के चूरू जिले के सुजानगढ़ कस्बे में हुआ था। व्यापारिक घराने में जन्म लेने के बावजूद इनका मन अपने परिवार के व्यापार में कम और लेखन में अधिक रमता था। उसी दौरान अपने पिता से अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कह दिया था कि वे साहित्य सृजन और समाजसेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करना चाहते हैं। उन्होंने बारह वर्ष की उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने छंदबद्ध गीत,अतुकांत रचनाएं,दोहे, सोरठे, उर्दू में गजल आदि विधाओं में लिखा। प्रसिद्ध कवि डॉ हरिवंश राय बच्चन के साथ उनकी अच्छी मित्रता थी और वे कन्हैयालााल सेठिया को 'महाकवि' कह कर संबोधित करते थे।
वर्ष 1934 में उन्होंने महात्मा गांधी से भेंट की। सेठिया ने 1942 मे दलितों,हरिजनों और पिछड़ों बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल की स्थापना की थी। उन्होंने जमींदारी प्रथा के उन्मूलन और किसानों पर जमींदारों-जागीरदारों की ओर से किए जाने वाले शोषण का विरोध किया। जागीरदारों के खिलाफ उन्होंने 'कुण जमीन रो धणी' जैसी कविता लिखी जो आमलोगों के बीच लोकप्रिय हुई।
सेठिया ने कविताओं के माध्यम से अनेक सामाजिक कुरीतियों सती प्रथा,छुआछूत, दहेज, राजाशाही एवं सामंतवाद के खिलाफ साधारण लोगों को जागरूक किया। 1942 में उनकी पुस्तक 'अग्निवीणा' जो अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में थी, उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला।
कन्हैयालाल सेठिया 11 नवमबर 2008 को दुनियां से अलविदा कर गए । राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किया। वे इसके लिए जीवनभर संघर्षरत करते रहे। उन्होंने राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की। सेठिया चाहते थे कि उनके जीवनकाल में ही राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाए। लेकिन उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। कन्हैयालाल सेठिया जिस सम्मान के हकदार हैं, सरकारी स्तर पर उसमें कमी रही है। जरूरत इस बात की है कि उनके शुरु किए कार्यों को और आगे बढ़ाया जाए।सेठिया को पद्मश्री समेत समेत अनेक सम्मान और अलंकरण मिले थे। उन्हे कई अकादमी अवार्ड मिले ।जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में कन्हैयालाल सेठिया अवार्ड-जेएलएफ फॉर पोएट्री दिया जाता है।
Updated on:
11 Sep 2021, 3:50 PM IST
Published on:
11 Sep 2021, 3:02 PM IST
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