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Travelogue: जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान की पहली यात्रा और पहला पड़ाव

कुमाऊं डायरी - पार्ट 1 जब जिम कॉर्बेट ने आखिरी बार आदमखोर बाघ को मारा तो बंदूक अलग रख कर सिर्फ वन्यजीवों के रखरखाव की ओर कदम मोड़ लिए थे। उनके कामों का असर पहाड़ी लोगों के मन में इतना गहरा है कि कुछ समय पहले उद्यान का नाम बदलने की कोशिश उन्होंने नाकाम कर दी।

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Patrika Desk

Jun 20, 2023

Jim Corbett National Park

अंग्रेजों के समय की बनी ढिकाला फॉरेस्ट लॉज, जिसके खंभे ध्यान आकर्षित करते हैं। दाएं चित्र में जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान का ढिकाला जोन और नदी के पास रहने वाली टिटहरी (इनसेट में)।

तृप्ति पांडेय
पर्यटन व संस्कृति विशेषज्ञ
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मैंने तय कर रखा है कि साल में एक यात्रा भारत में, उसके बाद चाहे देश में चाहे विदेश में। कई दिन से जिम कॉर्बेट और कैंची धाम दोनों जगह एक साथ जाने के बारे में सोच रही थी। यह कम हैरानी की बात नहीं कि मेरा जैसा यायावरी मन मुझे अब तक कुमाऊं जैसे ख़ूबसूरत इलाके तक नहीं ले गया था। झालाना की तेंदुए की सफारी में एक बार मुझे लखनऊ के एक वन्यजीव प्रेमी ने बताया था कि मैं जब भी जिम कॉर्बेट जाऊं, ढिकाला की फॉरेस्ट लॉज में ठहरूं और चिडिय़ा देखने के लिए सताल जाऊं। उस समय मैंने जिम कॉर्बेट की सफारी के लिए नेट पर ढूंढा तो यह अच्छा लगा कि राजस्थान की सफारी के लिए अपना नाम दर्ज करने की तुलना में यह बहुत आसान था। आप जिम कॉर्बेट सफारी की बुकिंग की सरकारी साइट को ढूंढेंगे तो आप वहीं पहुंचेंगे। राजस्थान की सफारी का टिकट खरीदने का रास्ता एक भूलभुलैया है जो आपको भटकने पर ट्रैवल एजेंट के पास ले जाता है!

मई महीने में मैंने सोचा कि अब कुमाऊं हो ही आऊं जिसकी कुमाऊं रेजीमेंट का नाम मन में सबसे पहले आता है और जिसके बारे में प्रसिद्ध लेखिका शिवानी के उपन्यासों और कहानियों में पढ़ा था। यही नहीं बचपन में जिस पहाड़ी गाने पर डांस किया था वो मुझे अब भी याद है जो बाद में पता पड़ा कि कुमाऊं रेजीमेंट के मार्च-पास्ट की धुन है, ‘बेड़ू पाको बारो मासा।’ आप जब किसी जगह की यात्रा करते हैं, उसके बारे में पढ़ते हैं तो ऐसी ही जानकारी मिलती है। जब जाना तय किया तब सबसे पहले सफारी की बुकिंग के लिए कोशिश की, पर कुछ भी नहीं मिल रहा था। ढिकाला की फॉरेस्ट लॉज में ठहरने पर ही वहां के लिए जिप्सी मिलती है वरना कैंटर का टिकट लेना था। मैंने नेट पर वहां के फॉरेस्ट अधिकारियों को कई फोन किए क्योंकि कुछ कमरे ऑफलाइन रहते हैं। खैर, बतौर पर्यटन लेखिका मेरी पूरे भुगतान के साथ कमरा पाने की वह कोशिश जायज थी और आखिरकार मुझे एक कमरा दो दिन के लिए मिला। जिन्होंने मेरी मदद की, मैं उनका धन्यवाद करूंगी क्योंकि उन पर बड़े-बड़े लोगों का दबाव रहता है। फॉरेस्ट लॉज में फॉरेस्ट के बीच ठहरने का अनुभव मैं कभी नहीं भुला पाऊंगी। कई बातें काबिलेतारीफ लगीं। सबसे पहले वह बोरी का थैला जिसके लिए आपको ७० रुपए देने ही होते हैं जिसमें आपको अपने ठहरने के दौरान अपना कचरा इक_ा करना होता है। मैंने लौटते समय सबसे पहले वह बैग साथ लिया। दूसरा फॉरेस्ट की ठहरने और खाने की सीधी सादी और साफ व्यवस्था। ओल्ड फॉरेस्ट लॉज अंग्रेजों के समय की बनी है। कहना ही होगा कि अंग्रेज वन्यजीव शिकारी ही नहीं, वन्यजीव प्रेमी भी थे। सन् 1935 में ही राम गंगा के इस इलाके को वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए सुरक्षित कर दिया गया था और नाम दिया गया तब के गवर्नर के नाम पर - हेली नेशनल पार्क। उसको बनवाने में जिम कॉर्बेट की बड़ी भूमिका रही थी। वही जिम कॉर्बेट जिन्होंने आदमखोर बाघ-तेंदुओं के हमलों से वहां के लोगों को बचाया। उनकी किताब ‘मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं’ 1920 से 1930 तक की रोमांचक कहानियां सुनाती है। इस किताब के बंगाली संस्करण का आवरण सत्यजीत रे ने डिजाइन किया था। तभी याद आई उस हॉलीवुड फिल्म की जिसका एक अभिनेता था मैसूर का महावत साबू दस्तगीर।
जब जिम कॉर्बेट ने आखिरी बार आदमखोर बाघ को मारा तो बंदूक अलग रख कर सिर्फ वन्यजीवों के रखरखाव की ओर कदम मोड़ लिए थे। उनके कामों का असर पहाड़ी लोगों के मन में इतना गहरा है कि कुछ समय पहले उद्यान का नाम बदलने की कोशिश उन्होंने नाकाम कर दी। यह बात सही भी है कि जिसने जो अच्छा किया हो, चाहे देशी हो या विदेशी, उसे सम्मान देना ही चाहिए। मैं ओल्ड फॉरेस्ट लॉज के गलियारे में घुसते यह सब सोच ही रही थी कि हमारी पहली सफारी का बुलावा आ गया।