
Nelson Mandela
नटवर सिंह
कूटनीतिज्ञ
'मैंने अपनी जिंदगी अफ्रीकी जनता के संघर्षों को समर्पित कर दी। मैं श्वेत और अश्वेत दोनों के वर्चस्व के खिलाफ लड़ा हूं। मेरा सपना ऐसे लोकतांत्रिक व मुक्त समाज का है जहां सभी सामंजस्य और समान अवसरों के साथ जीवनयापन कर सकें। इसी आदर्श के लिए मैं जीना चाहता हूं और इसे हासिल करना चाहता हूं। अगर जरूरत पड़ी तो इस आदर्श के लिए मैं अपनी जान देने को भी तैयार हूं।' -नेल्सन मंडेला ने जून 1964 में आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने से पहले अदालत में जो बयान दिया था, यह उसका आखिरी अंश है।
रॉबेन द्वीप की जेल में बंद अपनी कोठरी से नेल्सन मंडेला ने अपनी पारिवारिक मित्र फातिमा मीर को 1 मार्च 1971 को एक पत्र भेजा था जिसमें उन्होंने लिखा, 'मैं अपने संकल्प पर दृढ़ हूं- किसी भी परिस्थिति में मैं किसी के लिए भी कोई अशोभनीय बात नहीं कहूंगा।' वे आजीवन इस संकल्प पर बने रहे।
रिहाई के कुछ हफ्ते बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने विदेश मंत्रालय के एक अतिरिक्त सचिव को सरकार का बधाई संदेश लेकर मंडेला से मिलने वहां भेजा। मुझे यह बात नागवार गुजरी। मैंने राजीव गांधी से कहा कि इस महान शख्सियत से मिलने के लिए वे कांग्रेस पार्टी की ओर से एक टीम को वहां भेजें जो उनकी और कांग्रेस पार्टी की शुभकामनाएं उन तक संप्रेषित कर सके। इस टीम में नरसिंह राव, मुझे और आनंद शर्मा को चुना गया और हमें मंडेला से मिलने के लिए तंजानिया के दार-एस-सलाम भेजा गया।
हमें पता चला था कि वे उस वक्त राष्ट्रपति जूलियस नेरेरे के साथ ठहरे हुए हैं। हमें तंजानिया के नेता ने बताया कि मंडेला परिवार एक गांव में ठहरा है जो दार-एस-सलाम के पश्चिम में एक घंटे की दूरी पर है। हम उस शाम कार से उधर निकल लिए। रात हमने फूस की छत वाले एक गोल घर में बिताई। ऐसे गोल घर मैंने सैकड़ों की संख्या में जाम्बिया में देखे थे जब मैं सत्तर के दशक के अंत में वहां उच्चायुक्त था।
आम तौर पर भावविहीन रहने वाले पीवी नरसिंहराव भी अपने उत्साह को छुपा नहीं पाए थे। मंडेला का घर गांव के एक अलग-थलग कोने में था। वह एक छोटा सा घर था जिसमें लकड़ी की बाड़ लगी थी। हमारे आने की खबर उन्हें पहले से थी क्योंकि राष्ट्रपति नेरेरे ने उन्हें इत्तिला भेज दी थी। मंडेला के घर पर श्रीमती मंडेला ने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। एकाध मिनट बाद मंडेला आए। उन्होंने अभिवादन कर गांधीजी व नेहरू के बारे में कुछ शब्द कहे। वे बहुत कम बोलते थे। व्यक्तित्व में एक कुदरती आभा झलकती थी।
नामीबिया उसी वक्त दक्षिण अफ्रीका से आजाद हुआ था। वहां राष्ट्रपति पद के लिए नामित सैम नुजामा ने राजीव गांधी को अपनी आजादी के जश्न में 21 मार्च 1990 को शामिल होने के लिए न्योता भेजा था। नामीबिया की राजधानी विंडहोक के आयोजन का आकर्षण थे नेल्सन मंडेला। उनके साथ राजीव गांधी और मेरी मुलाकात 2 मार्च 1990 को हुई जो करीब एक घंटे चली।
राजीव गांधी ने मंडेला से दक्षिण अफ्रीका के घटनाक्रम पर उनका आकलन जानना चाहा। वे बोले, यहां सबसे गंभीर चुनौती रंगभेद को खत्म करने की और देश को 'एक व्यक्ति, एक वोट' के सिद्धांत पर होने वाले चुनावों के लिए तैयार करने की है। दूसरी समस्या जमीन की है। दक्षिण अफ्रीका में मु_ी भर श्वेत लोगों के पास तीन-चौथाई जमीन है। वे इतनी आसानी से ये जमीनें नहीं देने वाले।
राजीव ने उनसे तात्कालिक योजनाओं के बारे में पूछा। मंडेला को 1964 के बाद के अफ्रीका बारे में अभी बहुत कुछ जानना-समझना बाकी था। इस बारे में डी क्लार्क से उनका संवाद होता था। अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस बंटी हुई थी। धीरे-धीरे होने वाले सामाजिक बदलावों को लेकर पीढिय़ों की सोच के बीच फर्क और विरोध था।
मंडेला रिहा होने के चार साल बाद दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बने। उन्होंने 10 मई 1994 को दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। अपने स्वागत भाषण का अंत उन्होंने उत्साह भरे स्वर में ऐसे किया- 'आखिरकार हमने राजनीतिक मुक्ति हासिल कर ली- हम संकल्प लेते हैं कि अपनी जनता को हम गरीबी, वंचना, पीड़ा, लैंगिक व अन्य भेदभावों के लगातार जारी बंधनों से मुक्त करवाएंगे। अब दोबारा ऐसा कभी भी नहीं होगा कि यह खूबसूरत धरती एक के दूसरे के द्वारा शोषण की गवाह बने। इस भव्यतम मानवीय उपलब्धि का सूरज कभी नहीं अस्त होगा।
मंडेला राष्ट्रपति रहते हुए 1995 में भारत आए। उनके करीबी मित्र आर्कबिशप ट्रेवर हडलस्टोन को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के हाथों इंदिरा गांधी मेमोरियल अवॉर्ड दिया जाना था। मेमोरियल ट्रस्ट के उपाध्यक्ष के नाते राष्ट्रपति मंडेला के साथ मंच पर बैठने का मुझे मौका मिला। मंच पर तत्कालीन उपराष्ट्रपति केआर नारायणन, पीएम नरसिंहाराव और सोनिया गांधी भी थीं।
मैंने राष्ट्रपति मंडेला को थोड़ी सहजता के साथ एक परची बढ़ाई जिस पर लिखा था, 'प्रेसिडेंट मंडेला सर, क्या आप अब भी सुबह तीन बजे सोकर उठ जाते हैं? उन्होंने परची पर जवाब दिया- करीब साढ़े चार बजे, मंडेला 24.1.95'। वह परची मेरी आलमारी में आज भी महफूज है।
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