
कई बार जो दिखाई देता है वह सच नहीं होता।
ऋतु सारस्वत
समाजशास्त्री और स्तम्भकार
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बीते दिनों ‘धनंजय मोहन जोम्बदे बनाम प्राची धनंजय जोम्बदे’ मामले में मुंबई उच्च न्यायालय ने घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति पर अपनी चिंता व्यक्त की, वहीं देश की शीर्ष अदालत ने भी धारा 498-ए के तहत गिरफ्तारी से पूर्व गाइडलाइन की पालना पर सख्ती दिखाई है। उल्लेखनीय है कि दोनों ही कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं पर बीते दशकों में इन कानूनों के दुरुपयोग ने कानूनी संस्थाओं को चिंता में डाल दिया है। अब प्रश्न उठता है कि कानून का दुरुपयोग करने वाली महिलाओं के भीतर यह दुस्साहस कैसे उत्पन्न होता है? दरअसल हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था ऐसी है जहां परंपरागत रूप से यह विश्वास किया जाता रहा है कि महिलाएं स्वभाव से कोमल, सहनशील और त्यागमयी होती हैं और हर विपरीत परिस्थिति में भी परिवार को जोडक़र रखना चाहती हैं इसलिए अगर वे अपने पति या ससुराल वालों के विरुद्ध आरोप लगाती हैं तो वे निराधार नहीं हो सकते।
विद्रूपता यह है कि एक ओर स्त्री को दैवीय गुणों की प्रतिमूर्ति माना गया है वहीं पुरुष को संवेदनहीन और निरंकुश मानने की सोच उन्हें खलनायक मानने या सिद्ध करने में क्षणिक भी देरी नहीं करती। क्या वाकई ‘देह’ का अंतर भावनाओं में भी अंतर उत्पन्न करता है? 2021 में वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित शोध इस तथ्य को नकारता है। मिशिगन तथा पड्र्यू विश्वविद्यालय का यह संयुक्त अध्ययन बताता है कि दोनों विपरीत लिंगों के मध्य भावनात्मक रूप से समानता होती है।
इस संदर्भ में ‘जनरल ऑफ सोशल एंड पर्सनल रिलेशनशिप’ के अक्टूबर 2021 अंक में प्रकाशित शोध बताता है कि रिश्तों की समस्याओं का सामना करने पर पुरुषों को महिलाओं की तुलना में और भी अधिक भावनात्मक दर्द का अनुभव होता है। अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या यह न्यायोचित है कि वैवाहिक विवादों और विद्वेषों के चलते झूठे आरोपों के धरातल पर खड़े होकर अपने अधिकारों की पैरवी की जाए और बेगुनाहों को कारावास तक पहुंचाया जाए? ध्यातव्य रहे कि ‘अनिल कुमार तालान बनाम राज्य सरकार दिल्ली’ के मामले में जुलाई 2022 में न्यायमूर्ति अनूप कुमार मेंदीरत्ता ने कहा था, ‘मेरा मानना है कि ऐसी घटनाओं पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस तरह के मनगढ़ंत तथ्यों से सामाजिक ताना-बाना बर्बाद न हो, यदि वैवाहिक विवादों और मतभेदों के दौरान पूरे परिवार के खिलाफ मनगढ़ंत आरोप द्वारा झूठे निहितार्थ की अनुमति दी जाती है तो कानून की प्रक्रिया का और भी अधिक दुरुपयोग हो सकता है और गंभीर परिणाम हो सकते हैं।’
यह निश्चित है कि झूठे आरोप लगाकर पुरुषों के विरुद्ध अगर इसी तरह मामले दर्ज होते रहे तो भविष्य में समाज छिन्न-भिन्न हो जाएगा और पुरुष विवाह जैसी संस्था से दूर भागने लगेंगे। विवाह की सफलता दो लोगों के आपसी सामंजस्य पर निर्भर करती है पर यह जरूरी नहीं कि हर विवाह सफल हो। विवाह की सफलता को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोडक़र देखना और उसको असफल होता देख जीवनसाथी पर अनर्गल आरोप लगा उसकी छवि को धूमिल व स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने का षड्यंत्र मानवीयता के विरुद्ध है। वैगंड का अध्ययन ‘रिबिल्डिंग ए लाइफ द रॉन्गफुली कनविक्टेड एंड एक्सोनरेटेड’ बताता है कि गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने पर कारावास की सजा मानसिक स्वास्थ्य को ठीक वैसी ही क्षति पहुंचाती है जैसे कि युद्ध की विभीषिका से बचे हुए यातना पाए लोगों को पहुंचती है। अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए किसी को उसके जीवन के अधिकारों से वंचित कर देना निर्ममता है। क्या यह जरूरी नहीं हो जाता कि लिंग-भेद के आधार पर बरसों पूर्व बने वैधानिक प्रावधानों में परिवर्तन हो और अगर ऐसा नहीं होगा तो पुरुषों को खलनायक मानने वाली सोच उनके लिए यों ही अपमान, पीड़ा और हताशा के मार्ग खोलती रहेगी तथा संवेदनशील वर्ग किंकर्त्तव्यविमूढ़ यह सब होता देखता रहेगा।
Published on:
10 Aug 2023 10:01 pm
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