
जवाबदेही से बच नहीं सकते सरकारी अधिकारी और कर्मचारी
जवाबदेही से बच नहीं सकते सरकारी अधिकारी और कर्मचारी
विजय गर्ग
आर्थिक विशेषज्ञ, भारतीय एवं विदेशी कर प्रणाली के जानकार
स्वतंत्रता के बाद सत्ता की बागडोर भले ही जनता के हाथ में आ गई हो, लेकिन ब्यूरोक्रेसी यानी नौकरशाही में कोई खास बदलाव नहीं हुआ। हर पांच साल में सरकार तो बदलती है, लेकिन ब्यूरोक्रेसी वैसे ही चलती है। आज देश जनता के टैक्स के पैसों से चल रहा है, लेकिन जनता को वह लाभ नहीं मिल रहा, जिसकी वह हकदार है। सरकारी कार्यालय में यदि एक पेन भी खरीदा जाता है तो वह जनता के पैसे से ही खरीदा जाता है। टैक्स के पैसों को सही ढंग से खर्च करने की जिम्मेदारी सरकारी अफसरों की होती है, पर अफसरों की कोई जवाबदेही तय नहीं हो रही है। टैक्सपेयर के पैसों का सदुपयोग सरकारी अफसर ईमानदारी से करें, इसका कोई ठोस तंत्र नजर नहीं आता है।
वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट की बात करें तो सरकार को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से 27.2 लाख करोड़ रुपए की प्राप्ति हुई। यह कोई छोटी रकम नहीं है। यह बात सही है कि सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, सोशल वेलफेयर, हेल्थ, एजुकेशन, डिफेंस, रेलवे आदि पर काफी खर्च करती है। फिर भी करदाता के पैसों का सदुपयोग हो, इसकी जिम्मेदारी सुनिश्चित नहीं की जाती। इसकी बड़ी वजह अकर्मण्य ब्यूरोक्रेसी को भी माना जा सकता है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने इंडियन रेवेन्यू सर्विस (आइआरएस) के 27 सीनियर अधिकारियों को जबरन सेवानिवृत्ति दे दी। डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) ने सभी मंत्रालयों को लिखा है कि नाकारा और भ्रष्ट अफसरों की सूची तैयार की जाए, ताकि उन पर कार्रवाई की जा सके। वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि जुलाई 2014 से दिसंबर 2020 के बीच गुुप-ए के 171 और गु्रप-बी के 169 अफसरों को सेवा से बाहर करने का फैसला किया गया। इन्हें भ्रष्टाचार, अनियमितता या अक्षमता के चलते जबरन रिटायर किया गया। इनमें आइएएस और आइपीएस भी शामिल थे। यदि अधिकारी लापरवाह हंै और जनता को उसके कार्यों से कोई फायदा नहीं हो रहा तो यह निर्णय ठीक है। सरकार फंडामेंटल रूल 56 (जे) के जरिए अफसरों को सेवा से हटा सकती है। ऐसे कदमों की सराहना की जानी चाहिए। हालांकि ऐसे मामले ऊंट के मुंह में जीरा वाली कहावत जैसे ही नजर आते हैं।
जनता के टैक्स का पैसा शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। यदि आज हम सरकारी प्राथमिक स्कूलों को देखें तो वे बेहद जर्जर हालत में नजर आते हैं। एक-एक, दो-दो कमरों में पांच-पांच कक्षाएं चलती हैं। बहुत से स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होते। इसके लिए निश्चित रूप से अफसर ही जिम्मेदार हैं। उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। आखिर शिक्षा का बजट क्यों बेहतर तरीके से खर्च नहीं हो पा रहा है? स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी जनता की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। कोरोना महामारी के दौरान हमने देखा कि स्वास्थ्य का ढांचा कितना कमजोर है। अस्पतालों की बदहाली सामने आई। पर्याप्त वेंटिलेटर तक नहीं थे। सरकार के सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के अलावा जिला अस्पतालों की हालत भी खराब ही नजर आती हैं। क्या जनता अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं की हकदार नहीं है? यहां भी अफसरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। मानसून के बाद अब हम देखते हैं कि देशभर में सड़कें टूट जाती हैं, सड़कों पर बड़े-बड़े गड्ढे हो जाते हैं। बारिश के सीजन में कोई भी इन गड्ढों की सुध लेने वाला नहीं होता है। स्वतंत्रता के 76 साल बाद भी हम ऐसी सड़कें नहीं बना पाए हैं, जो बारिश में न टूटें। हर साल करोड़ों-अरबों रुपए केवल सड़कों की मरम्मत में खर्च हो जाते हंै। क्या टैक्स के पैसे को ऐसे ही पानी में बहते रहने देना चाहिए? आजकल कई राज्य सरकारें 100-200 यूनिट बिजली मुफ्त कर रही हैं, लेकिन 24 घंटे बिजली मिले, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए। आखिर टैक्स के पैसे से ही सरकार बिजली का उत्पादन करती है। पिछले कुछ वर्षों में सरकारी कार्यालयों में कई कार्य ऑनलाइन होने लगे हैं, फिर भी आम आदमी को अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए सरकारी अफसरों की परिक्रमा लगानी पड़ती है। भारत दुनियाभर में सॉफ्टवेयर बेचता है। क्या हम ऐसे सॉफ्टवेयर अपनी जनता के लिए नहीं बना सकते, जिनसे मोबाइल या कंप्यूटर से अधिकांश काम हो जाएं। इससे न केवल पारदर्शिता रहेगी, बल्कि धन और समय की बचत भी होगी। साथ ही, सरकार को प्रत्येक स्तर पर उन अफसरों की जवाबदेही भी तय करनी चाहिए, जो जनता की गाढ़ी कमाई को खर्च करते हैं। यदि लापरवाही मिलती है तो तत्काल अधिकारी को न केवल सेवा से बाहर करना चाहिए, बल्कि दंड देकर ऐसे उदाहरण भी पेश करने चाहिए, जिससे भविष्य में दूसरे अधिकारी ऐसा कृत्य ना कर सकें। जो कर्मचारी अपना कार्य ठीक ढंग से नहीं करे, उसके खिलाफ कार्रवाई का कारगर तंत्र होना चाहिए।
सरकारी कर्मचारियों एवं अधिकारियों की जिम्मेदारी निश्चित होनी चाहिए। देश की जनता को यह महसूस होना चाहिए कि अगर कोई अधिकारी या कर्मचारी टैक्स के पैसों का सदुपयोग नहीं करेगा या लापरवाही से खर्च करेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। इसका असर यह होगा कि देश की जनता ईमानदारी से कर अदा करेगी। आखिर हम सबकी जिम्मेदारी है कि भारत को विकसित देश बनाएं और जनता से मिले टैक्स के एक-एक पैसे का सदुपयोग हो।
Published on:
13 Sept 2023 09:32 pm
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