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ग्रीन हाइड्रोजन से मिलेगी अर्थतंत्र को जरूरी रफ्तार

नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी के बाद अब इकोसिस्टम तैयार करने पर देना होगा ध्यान

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जयपुर

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Patrika Desk

Jan 16, 2023

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दीपक यादव, प्रोग्राम लीड, काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू)
हेमंत मल्या, फेलो, काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू)
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नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (एनजीएचएम), भारत सरकार की एक महत्त्वाकांक्षी योजना है। बीते हफ्ते केंद्रीय केबिनेट ने 19,744 करोड़ रुपए के प्रारंभिक बजट के साथ इस मिशन को मंजूरी दी है। 2021 में प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से इसकी शुरुआत करने की घोषणा की थी। फरवरी 2022 में ऊर्जा मंत्रालय ने ग्रीन हाइड्रोजन/अमोनिया नीति जारी की थी, जिसके तहत 2030 तक 5 मिलियन टन प्रतिवर्ष (एमटीपीए) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था। काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के अध्ययन के अनुसार, दुनिया के 38 देश और यूरोपीय संघ पहले ही ग्रीन हाइड्रोजन पर राष्ट्रीय नीति बनाने की घोषणा कर चुके हैं। हालांकि, भारत का मिशन दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा मिशन है, इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए ग्रीन हाइड्रोजन कितनी जरूरी है?

ग्रीन हाइड्रोजन है क्या: हाइड्रोजन न केवल ब्रह्मांड का सबसे हल्का, बल्कि सबसे ज्यादा मात्रा में मिलने वाला तत्व है। इसका इस्तेमाल रिफाइनरियों में पेट्रोल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों से सल्फर हटाने और उर्वरक व मेथानॉल उत्पादन में होता है। बीते साल भारत ने इन उपयोगों में 5.6 एमटीपीए हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा, हाइड्रोजन को वाहन ईंधन या फिर अमोनिया व विमानन ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अभी प्राकृतिक गैस और नैफ्था जैसे जीवाश्म ईंधनों का उपयोग करके हाइड्रोजन का उत्पादन किया जाता है, पर ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य सौर व पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके इलेक्ट्रोलाइजर्स की मदद से हाइड्रोजन उत्पादित करना है। चूंकि, सौर व पवन ऊर्जा से हाइड्रोजन के उत्पादन में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं होता है, इसलिए इसे ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है। अगर हाइड्रोजन उत्पादन प्रक्रिया में ऊर्जा खपत की बात करें तो सामान्य तौर पर इलेक्ट्रोलाइजर से प्रति किलोग्राम हाइड्रोजन का उत्पादन करने में 50-55 किलोवाट-घंटे (या यूनिट) बिजली खर्च होती है, जो दो लीटर पेट्रोल के बराबर पड़ती है।
ग्रीन हाइड्रोजन ने भारत को एक अवसर दिया है, जिससे आयातित जीवाश्म ईंधन की खपत को कम किया जा सकता है। वित्त वर्ष 2021-22 में भारत ने कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों के आयात पर 14 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे। ऐसे में, 2030 तक 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन पर भारत अपने प्राकृतिक गैस आयात में 69,000 करोड़ रुपए की कमी ला सकता है। इससे आयात पर निर्भरता करीब 5त्न तक घट सकती है, रोजगार के अवसर पैदा हो सकते है और भू-राजनीतिक हलचल से अर्थव्यवस्था सुरक्षित हो सकती है।
भारत को आत्मनिर्भर बनाएगी ग्रीन हाइड्रोजन: ग्रीन हाइड्रोजन से भारत को ‘पंचामृत’ प्रतिबद्धताएं साकार करने में मदद मिलेगी, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने कॉप26 (ग्लासगो) के दौरान की थी। यहीं पर प्रधानमंत्री ने भारत का 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य भी घोषित किया था। इसके लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार जीवाश्म ईंधन की खपत को घटाना होगा। इसकी भरपाई ग्रीन हाइड्रोजन से की जा सकती है। क्योंकि ग्रीन हाइड्रोजन अक्षय ऊर्जा से बनती है, इसलिए 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन होने पर भारत के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 1.6 प्रतिशत (या 50 मिलियन टन) की कमी आ सकती है।
निर्यात के भी अवसर खुलेंगे: आने वाले समय में भारत के लिए यूरोप और पूर्वी एशिया के बाजारों में ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया जैसे उत्पादों के निर्यात के भी अवसर खुलेंगे। यूरोपीय संघ ने 2030 तक 10 एमटीपीए ग्रीन हाइड्रोजन आयात का लक्ष्य रखा है। ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया के अलावा भारत इलेक्ट्रोलाइजर्स का निर्माण और निर्यात भी कर सकता है। 2050 के वैश्विक नेट-जीरो लक्ष्य की स्थिति में, इलेक्ट्रोलाइजर्स की वैश्विक मांग 2030 तक 850 गीगावॉट पहुंचने का अनुमान है। इससे 425 अरब अमरीकी डॉलर (इलेक्ट्रोलाइजर की कीमत 500 अमरीकी डॉलर प्रति किलोवाट के आधार पर) का निर्यात बाजार पैदा होगा।
भारत को तत्काल क्या करना चाहिए: मिशन को केबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद अब सरकार को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए इकोसिस्टम तैयार करने और उसे कुशल बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। राज्य सरकारों को भी ग्रीन हाइड्रोजन नीतियां बनानी चाहिए। देश में ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाओं के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम बनाया जाए। इससे ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में व्यापार सरलता को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन उत्पादन व उपभोग के लिए हाइड्रोजन हब और वैली बनाई जाएं। इससे आपूर्ति पक्ष मजबूत होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को ग्रीन हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए एक नियम-आधारित ढांचा बनाने का नेतृत्व करना चाहिए। द्विपक्षीय/बहुपक्षीय समझौतों के लिए भी भारत को कदम उठाने चाहिए।
ग्रीन हाइड्रोजन, भारत के लिए नए दौर का एक सामरिक महत्त्व वाला ईंधन है। ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को केबिनेट की मंजूरी ने इसके उत्पादन के लिए आवश्यक इकोसिस्टम बनाने की शुरुआत करने के लिए जरूरी शक्ति प्रदान की है। भारत में ग्रीन हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़े, इसके लिए अब अगले चरण के उपायों पर ध्यान देना बहुत महत्त्वपूर्ण है।