
विश्व में भारतीय कलाकृतियों के प्रति बढ़ती दिलचस्पी
विश्व में भारतीय कलाकृतियों के प्रति बढ़ती दिलचस्पी
डॉ. राजेश कुमार व्यास
संस्कृतिकर्मी, कवि और कला समीक्षक
विश्व बाजार में अमृता शेरगिल की कलाकृति 'द स्टोरी टेलर' कुछ समय पहले 61.8 करोड़ रुपए में बिकी है। इसके साथ ही दुनिया भर में नीलामी में बिकने वाली किसी भारतीय कलाकार की यह सबसे महंगी पेंटिंग बन गई है। इससे पहले रजा की एक कलाकृति भी 51.75 करोड़ रुपए में बिकी थी। भारतीय कलाकृतियों के प्रति बाजार का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। इसका बड़ा कारण है, उनमें निहित सौंदर्य की बढ़ती विश्व-समझ। पहले भारतीय कलाकृतियों में निहित विषयों की ठीक से व्याख्या नहीं हो पाई। कला-बाजार में कलाकृतियां का बाजार उनकी विशिष्ट परख से सिरजे मूल्य-बोध से बनता है। कभी अवनीन्द्रनाथ टैगोर की कलाकृति 'तिष्यरक्षिता' में निहित विषय-संवेदना ब्रिटेन की विक्टोरिया को इतना भाया थी कि उन्होंने इस कलाकृति को ब्रिटेन मंगवा लिया था।
भारतीय कलाकृतियों की बड़ी विशेषता है, उनमें निहित अंतर का आलोक। दृश्य में भी बहुत सारा जो अदृश्य चित्रकार अनायास उकेरता है, वही उसका मूल सौंदर्य होता है। हेब्बार के रेखांकन को ही लें। उन्होंने नृत्यांगना का चित्र यदि उकेरा है तो नर्तकी का पूरा-चित्र नहीं है। थिरकते पैर, घुंघरू और भंगिमाओं में ही उन्होंने नृत्य की सर्वांग अनुभूति करा दी है। ऐसे ही गायतोण्डे ने रंगों की विरल-छटा में ही कैनवस के मौन को खंड-खंड में अखंड रूप लिए मुखर किया है। भारतीय लघु चित्र शैलियों को ही लें। कृष्ण वहां उकेरे गए हैं, तो वे सीधे-सपाट नहीं हैं, बांकपन में हंै। त्रिभंगी मुद्रा में बांसुरी बजाते वे लुभाते हैं। नटराज की मूर्ति है तो उसमें निहित लय-ताल और गति का छंद देखने वालों को सुहाता है। माने कलाएं दिख रहे दृश्य ही नहीं, उससे जुड़े बहुत से और संदर्भों की रमणीयता की वजह से आकृष्ट करती हंै। एक पर्युत्सुक भाव वहां सदा बना रहता है। रजा के चित्रों को ही लें। वृत्त, वर्ग और त्रिकोण में उन्होंने भारतीय संस्कृति की सुगंध को जैसे रंग-रेखाओं में रूपांतरित कर दिया है। बिन्दु की उनकी चित्र शृंखला ध्यान से जुड़ी हमारी परम्परा को देखते हुए हर बार पुनर्नवा करती है। यही भारतीय कलाओं की बड़ी विशेषता है कि वहां पर जितना दृश्य होता है, उतना ही वह रम्य अव्यक्त भी समाया होता है, जिसमें कलाकृति अपने सर्वांग सौंदर्य में हमारे मन को मोहित करती है।
अभी कुछ दिन पहले ही इस समय की महती कलाकार निर्मला सिंह के चित्रों की एक प्रदर्शनी क्यूरेट की थी। उनके चित्र एक नजर में रंगो की छटा-भर लगते हैं पर गौर करेंगे तो पाएंगे वहां एक रंग दूसरे में घुलकर कलाओं के अंतर्संबंधों का जैसे संवाहक बना है। घर, आंगन और मन में उठते भावों को उन्होंने रंगमय कैनवस में जैसे रूपांतरित किया है। धुंधलके से उठते उजास का उनका राग-बोध रंगों की रम्यता में ही कथा का पूरा एक संसार सिरजता है। शुक्रनीति में कलाओं के ध्यान से जुड़े विज्ञान पर महती विमर्श है। भारतीय कलाएं कथा-रूपों में, साहित्य की संवेदनाओं में ही निरंतर बढ़त करती रही हैं। इसलिए कोई यदि यह कहता है कि साहित्य से जुड़ी समझ कलाओं के लिए घातक है तो इससे बड़ी कोई बौद्धिक दरिद्रता नहीं हो सकती है। अतीत से लेकर वर्तमान तक की कला यात्रा को सहेजेंगे तो पाएंगे वहां सौंदर्य भाव-रूप में है। विद्यानिवास मिश्र ने कभी कहा भी था कि हमारे यहां साहित्य कलाओं में सम्मिलित नहीं है, बल्कि कलाओं की संयोजिका है। चित्र की कोई भाषा नहीं होती, परन्तु उनमें निहित आशय में जाएंगे तो कथाओं के अनगिनत गवाक्ष खुलते नजर आएंगे। इस दृष्टि से हमारी पारम्परिक और आधुनिक कलाकृतियां ध्यान के ज्ञान में अब भी सूक्ष्म परख की मांग लिए है।
Published on:
22 Oct 2023 09:37 pm
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