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जीएसटी का जंजाल!

सरकार और प्रशासनिक अमले के बीच दोहरे दावे असमंजस पैदा करते हैं जो कि ना तो देश की आर्थिक स्थिति और ना ही सरकार के हित में हैं।
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Sunil Sharma

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Updated: 23 Oct 2017, 12:30 PM IST

GST

GST bill

केन्द्र की भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार अपने ही फैसलों में उलझी हुई है। नोटबंदी के एक साल बाद भी उसके नफे-नुकसान को लेकर बहस चल रही है तो, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को पूरे देश में लागू हुए चार माह होने को हैं। लेकिन हालात यह है कि ना तो व्यापारी, ना ही सरकार और जनता इसको लेकर एक राय हो पाई है।

इतना ही नहीं इन दोनों मसलों को लेकर सरकार के भीतर ही अन्तर्विरोध चल रहा है। जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने गुजरात दौरे के दौरान रैलियों में नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के फैसलों को सरकार की सफल और देश को विकास पथ पर तेजी से दौड़ाने वाली योजना बता रहे हैं। वहीं केन्द्र में राजस्व सचिव हसमुंख अढिया ने कहा है कि छोटे और मझौले व्यापारियों पर भार कम करने के लिए जीएसटी दरों में आमूलचूल परिवर्तन करने की सख्त जरूरत है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि उत्पाद, सेवा कर और वैट जैसे करीब एक दर्जन केन्द्रीय और राज्यों के करों को हटाकर लाए गए जीएसटी के परिणाम आने में अभी करीब एक साल का समय और लग सकता है।

यह तो तब है जब, जीएसटी कौंसिल की कई दौर की बैठकों और मूल प्रस्ताव में अनेक परिवर्तनों के बाद जीएसटी को लागू किया गया था। लेकिन इसके लागू होने के साथ ही व्यापारियों ने इससे उपजी समस्याओं की शिकायत करना शुरु कर दिया था। हाल ही दीपावली से पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने इसमें कुछ और राहतें कारोबारियों व जनता को दीपावली के तोहफे के रूप में घोषित की थी। इसके बावजूद ये रियायतें भी बाजार में सुधार नहीं ला सकीं।

इस बार दीपावली पर व्यापार १५ से ४० फीसदी तक कम रहा। अब राजस्व सचिव के बयान ने सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को देश के सामने इसको लेकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। चुनाव के माहौल में योजनाओं की सफलताएं कब तक गिनाई जाएंगी। जनता और व्यापार जगत सही स्थिति जानना चाहता है। सरकार और प्रशासनिक अमले के बीच योजनाओं को लेकर दोहरे दावे असमंजस पैदा करते हैं जो कि ना तो देश की आर्थिक स्थिति और ना ही सरकार के हित में हैं।