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हिमाचल प्रदेश में दस दिन बाद विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है। चुनाव प्रचार चरम पर है। नेताओं की रैलियां भी हो रही हैं और विरोधी दलों पर आरोप-प्रत्यारोपों की बौछार भी हो रही है। ठीक वैसे ही जैसे देश में चुनाव लड़े जाते हैं। दूसरा राज्य है गुजरात, जहां चालीस दिन बाद विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है। महीने भर से गुजरात की राजनीति ने देश को गरमा रखा है। विकास के पागल होने से शुरू हुआ चुनाव प्रचार पाटीदार, अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित जातियों से होते हुए अब आतंकवाद के मुद्दे पर केंद्रित होता दिख रहा है। आने वाले दिनों में ये प्रचार अभियान और आक्रामक होगा इसके आसार नजर आने लगे हैं। कारण किसी से छिपा हुआ भी नहीं है। गुजरात की सत्ता पर भाजपा पिछले बाईस सालों से काबिज है। भाजपा येन-केन-प्रकारेण सत्ता को बचाए रखना चाहती है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस हर हाल में गुजरात का चुनाव जीतना चाहती है। उसे लगता है कि प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष के गृह राज्य गुजरात को जीतने से अगले लोकसभा चुनाव के लिए उसकी राह आसान हो जाएगी। यही कारण है कि दोनों प्रमुख दल चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने से पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन सवाल ये कि क्या ऐसा करना जरूरी है? भले ही चुनाव विकास के मुद्दे पर ही क्यों ना लड़ा जाए? भाजपा ने अगर वहां विकास किया है तो उसे दूसरे मुद्दों की तरफ जाने की जरूरत ही क्यों पड़े? और अगर भाजपा ने गुजरात में विकास नहीं किया तो कांग्रेस को उसे इसी मुद्दे पर घेरना चाहिए। भला कांग्रेस को पाटीदार, ओबीसी और दलित नेताओं की शरण में जाने की जरूरत ही क्यों पड़े?
गुजरात विधानसभा के पिछले तीन चुनावों का इतिहास सबके सामने है? क्या-क्या हथकंडे नहीं अपनाए गए? भडक़ाऊ भाषणों से लेकर चरित्र हनन तक के तमाम प्रयास दोनों तरफ से हुए। आज गुजरात फिर उसी राह पर चलता नजर आ रहा है। अफसोस की बात तो ये कि इसे रोकने वाला कोई नहीं दिख रहा। बेशक ऐसे हथकंडों से चुनाव तो जीता जा सकता है लेकिन समाज के बीच पहले से बनी खाई और चौड़ी होती है। ऐसा होना न तो लोकतंत्र के लिए शुभ है और न ही देश के लिए।
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