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काम ही पापों का प्रायोजक

Gulab Kothari Article Sharir Hi Brahmand: 'शरीर ही ब्रह्माण्ड' शृंखला में पढ़ें पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख-काम ही पापों का प्रायोजक

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शरीर ही ब्रह्माण्ड - काम ही पापों का प्रायोजक


Gulab Kothari Article शरीर ही ब्रह्माण्ड:
जीवन में यथार्थ धर्म का निश्चय करना कठिन है। जीव के अभ्युदय, क्लेश निवारण और परित्राण के लिए धर्म की सृष्टि हुई है। बाह्य धर्म-अनुष्ठान से बाह्य अभ्युदय प्राप्त होता है जो प्राणी को सन्तुष्ट नहीं कर सकता। अत: यह व्यक्ति का स्वधर्म नहीं हो सकता। मन में पापकर्म करने की इच्छा न होते हुए भी किसी भीतर के उकसावे से पापकर्म कर देता है। इसी का उत्तर काम है-कामना, भावना, वासना, इच्छा पर्याय हैं। कामना कभी पूर्ण नहीं होती, बल्कि उपभोग से बढ़ती है। उग्र होती जाती है। साम-दाम-दण्ड से शान्त नहीं हो सकती।

जीवन का आधार कामना ही है। कामना पूर्ति की रुकावट ही क्रोध की जननी है। कामना मन का बीज है, यही कर्म की प्रेरणा है। प्रवृत्त भी कामना करती है और निवृत्त भी कामना करती है। मार्ग की दिशा मन तय करता है। शास्त्र कहते हैं कि-''काम-निग्रह ही धर्म और मोक्ष का बीज है। निर्ममता और योगाभ्यास के बिना काम-विजय संभव नहीं है।' अज्ञान ही काम-संकल्प का मूल है। काम-संकल्प के बढऩे के साथ आत्म-दृष्टि घटती जाती है। उतना ही मन पर आवरण बढ़ता जाता है। मानव प्राण की उपासना द्वारा जब ब्रह्म की उपासना-अर्चना करता है तो भगवान की माया शक्ति संकुचित होती है। तब ब्रह्माण्ड में व्यापक शुद्ध भागवती शक्ति का विकास होता है। तत्त्व ज्ञान प्राप्त होता है।

कृष्ण कह रहे हैं कि-
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।। (3.38)

जिस प्रकार अग्नि धुएं से ढका होता है, जैसे दर्पण मैल के द्वारा ढक जाता है, झिल्ली द्वारा गर्भ ढका होता है, उसी प्रकार काम के द्वारा यह ज्ञान-आवृत्त रहता है। अर्थात् तीनों प्रकार से विवेक आवरित रहता है। योगीराज श्यामचरण लाहिड़ी इस श्लोक की व्याख्या में लिखते हैं कि ज्ञान रूप आत्मा को काम तीन प्रकार से आवृत्त करता है। यहां उसके तीनों उदाहरण दिए हैं। काम के साथ ज्ञान भी नष्ट हो जाता है।

देह में आत्मा की जो अवस्था होती है उसमें पहले वह धूमावृत अग्नि के समान होता है। यहां अग्नि भी है, धुंआ भी रहता है। किन्तु अग्नि का प्रकाश स्पष्ट रहता है। यहां अग्नि आत्मा रूप कारण शरीर जैसा है। आगे सूक्ष्म शरीर है। उसके भीतर आत्मा को नाना प्रकार की वासनाएं आवृत्त रखती हैं। आत्मा दर्पण (मलिन) की तरह ढका रहता है। आत्मा का प्रतिबिम्ब धुंधला दिखाई पड़ता है। थोड़़े से परिश्रम से दर्पण साफ हो जाता है। विचार और साधना की सहायता से वासना का वेग घटता है, आत्मज्ञान स्पष्ट होता जाता है। अन्त में स्थूलतम पिण्ड में काम की भोग-चेष्टा पूर्णता को प्राप्त होती है। यहां आत्मा पूर्णत: खोया जान पड़ता है। इसका उदाहरण गर्भ में जरायु (झिल्ली) में लिपटा शरीर है। इसमें भू्रण जैसे अज्ञान अवस्था में रहता है, वहां ज्ञानशक्ति के विकास का अनुभव संभव नहीं है। इसी प्रकार भौतिक पदार्थों की और कामनाओं की लिप्तता में आत्मा बाहर ही बाहर व्यस्त हो जाता है। भीतर सब अंधेरे में रहता है।


इन तीनों प्रकार के आवरणों को हटाने के साधन भी तीन प्रकार के हैं। मार्ग का आरंभ साधना ही है। कामासक्त व्यक्ति के मन में साधना करने की इच्छा भी नहीं होती। इस स्थिति से बाहर निकलकर जीव जब प्राकृत साधक हो जाता है, तब ज्ञान-ज्योति से अन्तराकाश भर जाता है। प्राण की साधना से भिन्न-भिन्न ग्रन्थियां खुलने लग जाती हैं। भीतर का प्रकाश मन में आनन्द पैदा करने लगता है। प्रकाश भू्रण तक मानो पहुंचने लगता है।


दर्पण को भी घिस-घिसकर जैसे साफ किया जाता है, वैसे ही साधना के अभ्यास से मन जड़भाव से हटकर सूक्ष्म स्तर की ओर आगे बढऩे लगता है। शरीर के कर्म-काम की ओर मन नहीं जाता। मन का मैल दूर हो जाता है। भीतर के जगत में लीन होने लगता है। मन का आतंक मिट जाता है।


इस स्तर तक भी अज्ञान-पाश बना रहता है। अन्तिम आवरण है कारण शरीर। अज्ञान का बीज यहीं प्रतिष्ठित है। इसे दूर करने में प्राणी या जीव को कई जन्म भी लग सकते हैं। आत्मज्ञान और आत्म-प्रकाश मिलता रहता है। बुद्धि अन्तर्मुखी होकर अनन्त आत्म-ज्योति में लीन हो जाती है। अन्तिम आवरण (कारण शरीर) भी आत्म-सत्ता में लीन हो जाता है। तब अज्ञान या आवरण कुछ नहीं रहता। यही महामहेश्वर भाव है।


ज्ञान, काम में परिणाम की चिन्ता करता है, दु:ख का कारण मानता है। अत: काम को शत्रु मानता है। पहली बात तो यह है कि काम पूरा होने पर भी पूरा नहीं होता, हो भी गया तो शोक पैदा करता है, आग्नेय है। भीतर वासना रूपी अग्नि रहता है, विषय-संयोग रूपी वायु के मिलते ही धूं-धूं कर जल उठता है। इसमें यदि अहंकार का योग हो जाए तो कहना ही क्या- रावण हो जाए। इस अग्नि में विषय भोग का जितनी हवि डालें, उतनी ही ज्वाला उठती जाए-


न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवत्र्मेव भूय एवाभिवद्र्धत।। (मनु स्मृति 2.94)


योगारूढ़ ज्ञानी को काम नहीं रहता, किन्तु जो यात्री उस पथ पर चल रहे हैं, उनको काम के कारण बाधाओं का सामना करना पड़ता है। काम अच्छा भी नहीं लगता, किन्तु संस्कारवश छूटता भी नहीं है। तब अपनी आत्म-स्मृति को जागरूक रखना ही साधना का लक्ष्य रहता है। चूंकि काम-भोग की इच्छा नहीं रहती, अत: साधक विजयी रहता है। ईश प्राप्ति उसकी वासनाओं में भी रहती है।


योगीराज लाहिड़ी लिखते हैं-''जीव स्थूल शरीर धारण करने से पहले, पूर्व कर्मों के अनुसार, अपने सूक्ष्म शरीर की रचना कर लेता है। वही अपने अदृष्ट के वश होकर माता-पिता के सहयोग से स्थूल पिण्ड-शरीर की रचना कर लेता है। जीव का कारण शरीर पहले से ही रहता है। जब तक मूल अविद्या नष्ट नहीं होती, तब तक वह नष्ट नहीं होता। प्रत्येक जन्म में सूक्ष्म शरीर की सृष्टि के साथ काम भी सूक्ष्म रूप में सूक्ष्म शरीर में रहता है। स्थूल शरीर की पुष्टि के साथ सूक्ष्म शरीर भी पुष्ट होता जाता है। उसमें स्थित वासना बीज भी विकसित होता जाता है। इसी यात्रा क्रम में तीनों आवरण आत्मा को आच्छादित करते हैं।'


इन्द्रियां जड़ हैं, मन का वाहन बनकर उसको विषय भोग करवाती हैं। अभ्यास से मन स्थिर होता है। तब उसको मन नहीं कहते, एकाग्रता प्राप्त करके बुद्धि कहलाता है। बुद्धि मन के समान चंचल नहीं होती। साधना के द्वारा इसको आत्मोन्मुखी कर सकते हैं। इन्द्रिय-संयम स्वत: सिद्ध हो जाता है। मन वासना शून्य हो जाता है। कामाग्नि तेलहीन दीपशिखा के समान नष्ट हो जाती है।


मन को समाहित किए बिना विवेकबुद्धि जाग्रत नहीं होती। संकल्पशून्य मन ही असीम ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है। तब सब आत्म-स्वरूप हो जाता है। यही स्थिति भगवत् चरण स्पर्श कही जाती है। यह केवल ज्ञान मात्र ही नहीं, प्रेम की भी पराकाष्ठा है। अपने लिए प्रत्येक व्यक्ति श्रेय चाहता है, धर्म ही इसको पाने का उपाय है, तब व्यक्ति अधर्म में क्यों प्रवृत्त होता है? कोई शक्ति मानो ऐसी है जो बलपूर्वक खींचकर हमें पापकर्म में लगा देती है। यह शक्ति काम है। यही क्रोध बन जाती है-''कामात् क्रोधोऽभिजायते।' यह भी सच है कि प्रवृति की शक्ति परमात्मा से बड़ी नहीं है, किन्तु भीतर परमात्मा के प्रकाश को ढक लेती है। अन्त:करण का आवरण हो जाने से ज्ञान की वृत्ति भी आवृत्त रूप में ही पैदा होगी। वहां ज्ञान का अंश ढका रहता है, काम प्रबल रहता है। वही पाप कराता है। काम जब ज्ञान को ढक लेता है, तब वही मोह कहलाता है। काम की पूर्ति होना ही मद पैदा करता है। बिना काम के कोई क्रिया नहीं होती। अत: काम ही पाप का प्रायोजक है। कर्मयोग में कामनापूर्वक किए जाने वाले वैदिक कर्म भी कर्मयोग विरोधी होने से पाप रूप ही होंगे। कर्मयोगी को कामों का त्याग करना चाहिए।


क्रमश: