16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

शरीर ही ब्रह्माण्ड: शरीर उपकरण, प्रकृति संचालक

Gulab Kothari Article Sharir Hi Brahmand: ‘शरीर ही ब्रह्माण्ड’ शृंखला में पढ़ें पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख-शरीर उपकरण : प्रकृति संचालक

4 min read
Google source verification

Gulab Kothari Article शरीर ही ब्रह्माण्ड: प्रकृति प्रकाश-विमर्श रूप है, प्रसार-संकोच है। प्रकृति ही अद्वय को अद्वैत बनाती है और अद्वैत को द्वैत रूप में प्रकट करती है। स्वयं अंधकार रूप होती है। हर पुरुष की अपनी प्रकृति भी होती है। वही स्त्री रूप में भीतर कार्य करती है। प्रकृति के सत्व-रज-तम रूप के अनुसार ही पुरुष का वर्ण ब्रह्म-क्षत्र-विट् वीर्य रूप में कर्म करता है। प्रकृति ही पुरुष हृदय में कामना का स्वरूप तय करती है। वैसा ही स्वभाव पुरुष का दृष्टिगोचर होता है।
शरीर में न इच्छा है, न ही गति। इच्छा मन में होती है और गति प्राण में। शरीर कर्म करने का उपकरण मात्र है। पुरुष और प्रकृति ही इसमें दम्पती भाव में रहते हैं। प्रकृति भी जड़ रूप रहती है (अपरा)। पुरुष चेतनायुक्त है। उसे प्रकृति चला रही है। पुरुष के भोग्य पदार्थों को प्रकृति तय करती है। पुरुष को कर्मानुसार योनियों में भी प्रकृति ही भेजती है। अत: मनुष्य की पहली आवश्यकता है स्वयं को जानना। स्वयं का आत्मा से परिचय करना- पुरुष रूप का। तब उसे प्रकृति को समझना होगा। प्रकृति उसी की है। पुरुष की ही स्त्रैण शक्ति है।
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।। (गीता 3.27)
अर्थात्—सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित अन्त:करण वाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूं’ -- ऐसा मानता है।
सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेज्र्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति।। (गीता 3.33)
अर्थात्—सम्पूर्ण प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा?
पुरुष इसी प्रकृति के द्वारा संचालित होता है। सतोगुणी हो या तमोगुणी, वैसा ही स्वभाव, वैसा ही अन्न, मन, विचार, कर्म होगा। अन्न से ही शुक्र, अन्न से ही नया जीवात्मादि सारा कुछ इस प्रकृति के दृढ़ हाथों में रहता है। प्रकृति को नहीं बदल पाता मनुष्य। सहज नहीं हैं। अहंकृति-आकृति भी साथ बदलती है। अत: कठोर संकल्प-तप-संयम जैसी चर्या से ही मनुष्य 'निस्त्रैगुण्य भव’ तक पहुंच पाता है। इसके प्रभाव में प्रकृति भीतर बैठकर आगे की योनियों का संचालन करती जाती है।
पुरुष यदि भीतर अपनी स्त्री (स्त्रैण भाव) को समझे और उसके संचालन का अभ्यास कर ले तो क्यों नहीं वह शक्तिमान बन सकता! ऊर्जा ही पुरुष है, पदार्थ ही स्त्री है। पदार्थ और ऊर्जा मिलकर जीवन चलाते हैं। कुण्डलिनी शक्ति का नाम प्रचलित है। हम केवल चक्रों के माध्यम से इस शक्ति का संचालन करते हैं। नीचे के पांच चक्र—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत और विशुद्धि—ये पंच महाभूतों से सम्बन्ध रखते हैं। प्रत्येक चक्र अपने क्षेत्र के अवयवों की ऊर्जाओं का नियंत्रण करता है। चक्र बाहर से सूक्ष्म ऊर्जाएं ग्रहण करके अवयवों की सूक्ष्म ऊर्जा की पूर्ति करते हैं। काम आ चुकी ऊर्जा को आभामण्डल के माध्यम से बाहर फैंकते हैं।
सभी चक्र शक्ति के आधार पर कार्य करते हैं। शुरू (नीचे) के दो चक्र मूलाधार और स्वाधिष्ठान शरीर से जुड़े रहते हैं। मणिपूर, अनाहत और विशुद्धि चक्र व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति की भूमिका में रहते हैं। ऊपर के दो चक्र—आज्ञा व सहस्रार आध्यात्मिक ऊंचाई के द्वार हैं। इन्हीं चक्रों में अलग से स्त्रैणभाव में शक्ति कार्य करती है। इनकी भूमिका शरीर के विभिन्न धातुओं के संचालन, व्यवस्था आदि से जुड़ी है। इनको डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, शाकिनी और हाकिनी के नाम से जाना जाता है। इनकी स्वरूप व्याख्या भी अन्य दैवी शक्तियों की तरह की गई है। उदाहरण के लिए काकिनी लाल कमल पर बैठती है। चार हाथ—एक में अंकुश, एक में मुण्ड तथा दो में वरमुद्रा- भयहारी मुद्रा है।
स्त्री जल है—स्वाधिष्ठान है। जल से पृथ्वी बनती है। हमारा शरीर बनता है। अग्नि से जल का निर्माण होता है। अत: जल के भीतर अग्नि का निवास है। अग्नि और जल दोनों पृथ्वी के अंग हैं। पृथ्वी में पांचों तत्त्वों की उपस्थिति है। इसी प्रकार शरीर में पंच कोश हैं। केन्द्र में मनोमय कोश है जो कामना का उक्थ है। यह कामना ही सूक्ष्म रूप शक्ति बनकर जीवन की दिशा तय करती है। इसी हृदय में तीनों प्रकृतियां—महालक्ष्मी, महासरस्वती व महाकाली अपने-अपने शक्तिमान के साथ प्रतिष्ठित रहती हैं। यही मन को सृष्टि से जोड़कर मृत्युलोक में स्थापित करती है, यही मुक्ति साक्षी होकर ऊध्र्व गति की प्रेरक बनती हैं।
इससे आगे ब्रह्म का साम्राज्य है। काला घना अंधकार है। यही सोम अवस्था ब्रह्म का रात्रिकाल है। ब्रह्म प्रकाशित करता है ज्ञानरूप में, किन्तु स्वयं प्रकट नहीं होता। नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत: (गीता 7.25)। मेरे भीतर भी ब्रह्म तो है बीज रूप, किन्तु चारों ओर से आवरित है। ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए मुझे अंधकार में प्रवेश करना पड़ेगा। माया के इन आवरणों का उच्छेद करके भीतर प्रवेश करना होगा। प्रकाश तो अंधकार का पुत्र है- विवर्त है। प्रकाश में छाया भी भ्रम का एक कारण बन जाती है। अंधकार में न छाया है, न ही रूप। समान भाव में सभी प्रतिष्ठित रहते हैं। इसी तथ्य को इंगित करते हुए गीता में कृष्ण कह रहे हैं—
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।। (2.69)
अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि समान (काल) है उसमें योगी जागता है और जिस काल में सब प्राणी जागते हैं, वह योगी की रात्रि है।
हम स्त्री को व्यवहार में बहिन-माता-पत्नी स्वरूप में ही जानते हैं। उसके शक्ति रूप में कई प्रमाण एवं जीवन संचालन के स्वरूप दिखाई देते हैं। कभी लगता है कि उस पर मर्यादा के पहरे हैं, कहीं वह स्वतंत्र रूप से सृष्टि संचालन में स्वयं पूर्ण सक्षम है। एक ओर अत्याचारों की मार सहती है, दूसरी ओर पिता और पुत्र को एक साथ नियंत्रण में रखकर परिवार की दिशा तय करती है। उसका अपना एक तंत्र होता है और तांत्रिक की तरह सूक्ष्म स्तर पर और परोक्ष भाव में गृहस्थी चलाती है। अपने स्वयं के जीवन का अलग से संचालन भी कर लेती है। सम्पूर्ण सृष्टि में योषा रूप स्त्री का यही स्वरूप है। शोणिताग्नि की तरह प्रत्येक लोक में स्त्री ही पुरुष को भोगती है। दिखाई विपरीत देता है।
राम-रावण युद्ध हो अथवा महाभारत, मूल में स्त्री ही रही है। अनेक ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। श्राप भी स्त्रियों के बहुत प्रभावी होते हैं क्योंकि वे अंदर से दृढ़ संकल्पित होती हैं। चीर-हरण के समय जब द्रौपदी श्राप देने लगी, तो गांधारी ने रोका कि—'तुम कुछ भी करो, बस श्राप मत दो।‘ स्वयं भीष्म पितामह भी अम्बिका का श्राप भोग रहे थे। हर युग में ऐसे उदाहरण रहे हैं। पुरुष भी अन्दर स्त्री होता है अत: उसका श्राप कम प्रभावी होता है। वासना भी भीतर नहीं जाती। अल्प अवधि की और निरुद्देश्य (भटकावपूर्ण) होती है। स्त्री अपनी वासना को शस्त्र रूप में भी उपयोग ले लेती है। योजनाबद्ध तरीके से तृप्ति के पर्याय तलाश लेती है। आजकल जिस तरह के समाचार पढ़ते हैं उनसे लगता है कि आदमी पशुवत् आचरण करने लगा हैं। प्रत्येक स्त्री में शक्ति का जाग्रत भाव ही दुराचारों के शमन में सहायक हो सकता है।

क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com