
शरीर ही ब्रह्माण्ड : सृष्टि यज्ञ में अत्रि दर्पण है
Gulab Kothari Article शरीर ही ब्रह्माण्ड: सृष्टि की उत्पत्ति का एक ही कारण ब्रह्म की कामना है-एकोऽहं बहुस्याम्। भले ही काल्पनिक लगता हो। ब्रह्म नहीं होता और फिर भी विश्व होता तो और बात थी। किन्तु जब ब्रह्म है, जड़-चेतन के केन्द्र में प्रतिष्ठित दिखाई भी दे रहा है, तब तो स्वीकार करना ही पड़ेगा। समझ में तब आएगा, जब हम अपनी दृष्टि मानव योनि के साथ अन्य योनियों (84 लाख) पर भी ले जाएंगे। वहां भी नर-मादा हैं। मानव को भी मूल में तो नर-मादा के रूप में ही देखना पड़ेगा। हां, उसमें कुछ विशेषताएं दी हैं जो अन्य प्राणियों में नहीं हैं।
नर-मादा भाव को ही सिद्धान्त रूप में योषा-वृषा (मादा-नर) कहते हैं। जो वर्षण करता है, वह वृषा है। जो संग्रह करे, सुरक्षित रखे, जन्म दे, पोषण करे, वही मादा है। स्त्यायति गर्भो यस्यामिति अर्थात् गर्भ की स्थिति हो जिसमें, ऐसा तत्त्व योषा कहा जाता है। 'योषा वै स्त्रिय:'। यही योषा जाया भी कही जाती है। ऐतरेय ब्राह्मण में तज्जाया जाया भवति यदस्यां जायते पुन: अर्थात् जाया को जाया इसलिए कहा जाता है क्योंकि पुरुष स्वयं उसमें पुत्र रूप में जन्म ग्रहण करता है-पिता वै जायते पुत्रो। स्त्री शब्द ही संस्थ्यान धर्मा कहलाता है। जो कि हर मादा में प्रतिष्ठित रहता है। हर मादा में एक दिव्यता का भाव एवं शक्ति रहती है। इसका मुख्य कारण है इसकी सौम्यता। इस कारण इसके पास अग्नि में आहूत हो जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं होता। ऋग्वेद (5.44.15) में इसी तथ्य को बताया गया है कि-
अग्निर्जागार तमृच: कामयन्ते, अग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति।
अग्निर्जागार तमयं सोम आह, तवाहमस्मि सख्ये न्योका:।।
''अग्नि के जाग्रत होते ही सोम उसके पास पहुंचा और कहा कि मैं तुम्हारा सखा बनकर रहंूगा। प्रधान तुम ही रहोगे, मैं गौण रहूंगा।' क्योंकि सोम तो अग्नि में आहूत होकर अग्नि में ही लीन हो जाता है। शेष अग्नि बचता है। अत: अग्नि प्राण ही सृष्टि का पुरुष है। न मादा है, न ही माया। ब्रह्म अकेला भी 'बहुस्याम्Ó नहीं हो सकता। सृष्टि युगल तत्त्व से होगी। इसके लिए ब्रह्म ने स्त्री को पैदा किया- यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है। अपने विस्तार के लिए एक तत्त्व उत्पन्न किया जो सृष्टि में पहले नहीं था। उस तत्त्व में प्रजनन-पोषण की शक्ति तो दी, किन्तु बीज नहीं दिया। इसीलिए सृष्टि में वह अकेला पुरुष बनकर प्रतिष्ठित है।
माया ही सृष्टि का मूल विज्ञान रूप है। 'विविधं ज्ञानं विज्ञानम्', 'विरुद्धं ज्ञानं विज्ञानम्' तथा 'विशिष्टं ज्ञानं विज्ञानम्' इसका रूप हैं। यही वेद में विज्ञान की परिभाषा है। सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रह्म एक ही है-यह ज्ञान कहलाता है। माया विज्ञान है। नर ब्रह्म है, नारी विज्ञान है। ब्रह्म रस भाव है, माया शक्ति है, कामना है। ब्रह्म प्रकाश है, माया विमर्श है। प्रसार ब्रह्म है, संकोच माया भाव है।
मादा में पुरुष मन में आकर्षण, बीज की पोषण क्षमता, सुरक्षा, प्रसव-क्षमता जैसी बनावट होती ही है। स्थूल शरीर उपकरण है। इसका संचालन सूक्ष्म स्तर पर होता है। जीवात्मा का स्तर सूक्ष्म है। यह स्तर अक्षर सृष्टि का है। अक्षर में कारण रहता है-सृष्टि का। क्षर परिणाम है। अक्षर अधिदेव संस्था है। क्षर अधिभूत, शरीर अध्यात्म है। अक्षर एवं क्षर दोनों के हृदय में ब्रह्मा, विष्णु व इन्द्र प्राण विद्यमान हैं। सोम और अग्नि रूप पृष्ठ्य प्राण (इन्द्र के संयोग से) सृष्टि कार्य करते हैं। अक्षर संस्था का केन्द्र सूर्य लोक है। अध्यात्म में नाभि केन्द्र है। जैसे सूर्य से सटा हुआ मह:लोक है वैसे शरीर में जल केन्द्र (स्वाधिष्ठान) है। रेतस् और रज दोनों ही जल तत्त्व हैं। जल के वर्षण से ही पृथ्वी पर सृष्टि होती है। कृष्ण कहते हैं कि-
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव:।। (गीता 3.14)
अर्थात्-सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षा से होता है। वर्षा यज्ञ से होती है। यज्ञ कर्मों से निष्पन्न होता है। कर्मों को तू वेद से उत्पन्न जान और वेद को अक्षर ब्रह्म से प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्यकर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।
परमेष्ठी में भृगु-अंगिरा और अत्रि तीन प्राण हैं। भृगु सौम्य प्राण तथा अंगिरा आग्नेय प्राण हैं। अत्रि पारदर्शिता को रोकने वाला प्राण है। यही जीव के प्रतिबिम्ब के लिए आधार बनता है। जिस प्रकार समुद्रमंथन की प्रक्रिया में सारभूत चौदह रत्नों की प्राप्ति होती है उसी प्रकार सन्तान हेतु अरणिमंथन किया जाता है। इस अरणिमंथन से नर के सर्वांग शरीर के सारभूत रेतस् तत्त्व तथा मादा के सम्पूर्ण शरीर के सारभूत रज तत्त्व से क्रमश: पुंभ्रूण और स्त्रीभू्रण की प्राप्ति होती है। इसी अरणिमंथन से घर्षण होता है, जिससे योषाग्नि प्रज्वलित होती है। यहां वपन के उपरान्त अत्रिप्राण पर जीव का प्रतिबिम्ब बनता हैं।
अंगारा अंगिरा है, ज्वाला भृगु है। दोनों शेष शुक्राणुओं को जला देते हैं। अंगारा शांत हो जाने पर उष्ण स्थान अत्रि की प्रतिष्ठा बन जाता है। गर्भाधान का सामथ्र्य मादा में रजस्वला होने के पश्चात् ही आता है। अत्रिप्राण ही इसका आधार होता है। अत: रजस्वला को आत्रेयी कहा जाता है। गर्भाधान काल में सौम्या में अग्नि रूप स्त्री (योषा) के प्रकट होने पर यह अत्रि प्राण भी सक्रिय हो जाता है और संतानोत्पत्ति में सहायक बनता है।
ब्रह्माण्ड के सात लोक हैं और शरीर में भी सात लोक ही हैं- यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे। ब्रह्माण्ड में ब्रह्म और माया का तात्विक रूप है, निराकार है। स्थूल सृष्टि साकार है। संतति हेतु महद् लोक में ही वपन प्रक्रिया करनी होगी। नर-मादा सत्य अग्नि-सत्य सोम हैं, जैसे सूर्य-चन्द्रमा हैं। सत्य भाव ही सृष्टि का स्वरूप है। किन्तु सृष्टि होती है ऋताग्नि-सोम से। अत: दोनों को ऋत भाव में ही सृष्टि प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
आग्नेय नर का पुंभ्रूण ऋत सोम रूप में है। सौम्या के रज में अग्नि प्रज्वलित करनी पड़ती है। इस अग्नि का स्थान मह:लोक ही होना चाहिए। आहूत होने के लिए बीज को मातरिश्वा वायु मह: तक पहुंचाता है। चूंकि मह:लोक केन्द्रीय- चौथा लोक है, अत: पंचाग्नि में नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे गति समान रहती है। नर-मादा दोनों के शरीरों एवं धातुओं की संरचना में इन तथ्यों का पूर्ण प्रावधान होता है।
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत।। (गीता 14.3)
अर्थात्-हे अर्जुन! मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्ति स्थान है और मैं उसमें जीव रूप गर्भ का स्थापन करता हूं। उससे सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
नर-मादा का प्रथम यज्ञ शरीर संयोग से होता है। दूसरा यज्ञ रज में अरणिमंथन से अग्नि प्राणों की उत्पत्ति एवं इस अग्नि में रेतस् की आहुति है। रेतस् स्वयं बीज नहीं है। बीज का संग्राहक है। रेतस् में शुक्राणु और रज में अण्ड रहते हैं, इनका संयोग तीसरा यज्ञ है। पुंभ्रूण का स्त्री भू्रण से योग चतुर्थ यज्ञ है। चूंकि पुंभ्रूण ही बीज है अत: मह:लोक ही ब्रह्म का स्थान है। इस सम्पूर्ण प्रजनन क्रिया में- ''एकोऽहं बहुस्याम्' प्रक्रिया में मादा उपकरण रूप है। सन्तति हेतु उसके योषा (आग्नेय) भाव को तैयार किया जाता है। कृषि कर्म में बीजाहुति से पूर्व किसान खेत को जोतता है।
अर्थात् जमीन में बीज वपन हेतु क्षेत्र का कर्षण किया जाता है ताकि भूमि का मह:लोक प्राप्त हो सके। तब बीज को बोया जाता है। किसान और भूमि का संयोग प्रथम यज्ञ है। बीज का आवरण (जैसे गेहूं का चापड़) आग्नेय है और रेत सौम्य है। हल से खेत का कर्षण करके ऊपरी परत (सॉइल) हटाई जाती है। पुन: फाल से मिट्टी हटाने से यह आग्नेय हो जाती है। यही मह:लोक बीज के वपन का स्थान है। बीज का उस अग्नि में वपन करना चौथा यज्ञ है। सृष्टि में हर निर्माण कार्य इसी रूप में होता है। चाहे वह सूक्ष्म हो या स्थूल।
क्रमश:
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Published on:
29 Jul 2023 05:30 pm
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