
शरीर ही ब्रह्माण्ड : शुक्र है विश्व का आरम्भक
Gulab Kothari Article शरीर ही ब्रह्माण्ड: यह समस्त दृश्यमान जगत ही ब्रह्म है। इसके आठ अवयव हैं-अव्यय-अक्षर-आत्मक्षर, विकारक्षर, विश्वसृट, पंचीकृत पंचजन, पुरंजन और पुर। अष्टाक्षर छन्द को गायत्री कहते हैं। इसलिए आठ अवयव वाला ब्रह्म भी गायत्रब्रह्म कहलाता है। प्रत्येक अवयव की पांच कलाएं हैं। अव्यय की कलाएं आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण-वाक् हैं। अक्षर की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम हैं। सूर्य का ऊपरी अद्र्ध अक्षर अमृत लोक एवं नीचे का अद्र्ध भाग मत्र्य लोक से सम्बद्ध क्षर भाग है। अत: इस अक्षर का एक भाग आत्मक्षर एवं दूसरा विकार क्षर कहलाता है। आत्मक्षर की कलाएं अक्षर की कलाओं के समान ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-अग्नि-सोम हैं। विकार क्षर की कलाएं प्राण-आप-वाक्-अन्नाद-अन्न हैं। ये पांच विकार ही विश्वस्रष्टा बनने के कारण विश्वसृट् कहलाते हैं।
विश्वसृट् की पांचों कला प्राण-आप: वाक्-अन्नाद-अन्न का पंचीकरण होने से पांच पंचजन उत्पन्न हुए। पंचजन की भी प्राण आप:-वाक्-अन्नाद व अन्न कलाएं हैं। पुन: इन पांचों पंचजनों के पंचीकरण से उत्पन्न कलाओं का सांकेतिक नाम पुरंजन रखा गया। प्राण से वेद पुरंजन, आप: से लोक पुरंजन, वाक् पंचजन से देव पुरंजन, अन्नाद पंचजन से भूत पुरंजन और अन्न पंचजन से पशु पुरंजन का विकास हुआ। पांचों पुरंजन से पांच पुरभाव उत्पन्न हुए।
वेद पुरंजन से स्वयंभू पुर का, लोक से परमेष्ठी, देव से सूर्य, भूत पुरंजन से पृथ्वी और पशु पुरंजन से चन्द्र का व्यक्ति भाव हुआ। ये पुर सूर्य-चन्द्र-पृथ्वी रूप पिण्डों से भिन्न हैं। पुर की कलाएं स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी है। अत: ब्रह्म चालीस कलाओं का बन जाता है। यही परमा विराट् कहलाता है-सहस्त्रा वै परमा विराट् (तां.ब्रा. 25-9-41) यही प्रजापति है। यह आत्मा-प्राण-पशु की समष्टि है। अव्यय-अक्षर-आत्मक्षर आत्मा है। विकार, विश्वसृट्, पंचजन, पुरंजन प्राण हैं। पुर ही पशु हैं। विराट् का जन्मदाता तत्त्व शुक्र है। शुक्र ब्रह्म के लिए श्रुति कहती है-
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधात् शाश्वतीभ्य: समाभ्य:॥ ईशोपनिषद् 8॥
अर्थात्- यह शुक्र अकाय यानी ऋतभाव में हैं, दोषरहित अव्रण है, स्नायु रहित-अस्नाविर, धर्म अधर्म पाप्मा से अविद्ध, अविद्या से रहित शुद्ध है। इसे मातरिश्वा वायु ने चारों ओर घेर लिया। मातरिश्वा से घिरे शुक्र को कवि, मनीषी, परिभू, स्वयंभू आदि कहते हैं। मातरिश्वा से वेष्टित शुक्र से विश्व का निर्माण हुआ है। सृष्टि प्रवाह में वह सदा एक-सा रहा है। ''अनेजेदकम्' मन्त्र में श्रुति ने द्विब्रह्म (यत् एवं जू), षड् ब्रह्म (अग्नि-यम-आदित्य एवं आप वायु सोम) का निरूपण करते हुए मातरिश्वा वायु द्वारा द्विब्रह्म में षड्ब्रह्म (आप) का आधान बताया। मातरिश्वा ने आप की उस अनेजदेकत् तत्त्व में आहुति दी। इससे शुक्र का स्वरूप बना।
शुक्र शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है किन्तु एक ही अर्थ ऐसा है जो सभी शुक्र -शब्दों में समान रूप से व्याप्त हो सकता है। ये सब शब्द एक ही अर्थ द्विब्रह्मगर्भित (यजुराग्नि गर्भित) षड्ब्रह्म (आप) में अन्तर्निहित हैं। द्विब्रह्म ब्रह्म और षड्ब्रह्म कर्म रूप है। इसका अर्थ यह भी है कि किसी भी रचना में सूक्ष्म भीतर होगा तथा स्थूल बाहर होगा। शुक्र का द्रव भाग षड्ब्रह्म है, द्विब्रह्म शुक्र के भीतर है। सोम के भीतर अग्नि है। हम उस अग्नि को शुक्राणु कह रहे हैं। अपतत्त्व की अवस्था विशेष ही सोम है। सोम ही चन्द्रमा-औषधि-रेत बनता है।
महत्तत् सोमो महिषश्चकार (ऋक् सं. 9/97/41) के अनुसार सोम की आहुति से ही सूर्य में ज्योति का उदय होता है। यह सोममय ज्योति ही हिरण्य है। पंच महाभूतों का आरम्भक आप् ही है। यही भूतों का रस है। यही गो पशु में प्रविष्ट होकर पय (दुग्ध) बनता है। स्वयं तो ऋत है किन्तु इसके गर्भ में सत्य यजुराग्नि (द्विब्रह्म) प्रतिष्ठित है।
शुक्र ही विश्व का उपादान कारण है। विराट् के आठ अवयवों में सातवां पुरंजन है। इसकी पांच कलाएं हैं-वेद, लोक, प्रजा, वीर्य और पशु। वेद सृष्टि का आधार है। बिना वेद के सृष्टि नहीं होती। ईश्वर संस्था में पहले पुरुष है। पुरुष से विश्व का मूल वेद तत्त्व प्रादुर्भूत होता है। सचेतनों की सृष्टि में पहले वेद उत्पन्न होता है। वेद द्वारा योगमाया का प्रादुर्भाव होता है। तब जीवाव्यय का विकास होता है।
बिना वेद के प्रजापति का स्वरूप निष्पन्न नहीं हो सकता। वेद ही प्रजा की उत्पत्ति का कारण (प्रजापति) है। जब तक प्रजा नहीं, तब तक प्रजापति नहीं। जब तक लोक नहीं, प्रजा नहीं। जब तक सुवेद (आप:) नहीं, तब तक लोक नहीं। जब तक यजुर्वेद नहीं, तब तक सुवेद नहीं।
पहले परमेष्ठी का उदय होता है, तब प्राणमय स्वयंभू का उदय होता है। मायी स्वयंभू पृथक् तत्त्व है। जहां 'एकोऽहम् बहुस्यामÓ कामना हुई वह पहला स्वयंभू है। इसी को ब्रह्म कह रहे हैं। वहां से जब नीचे आ रहे हैं तो उसने सबसे पहले पानी को आप: बनाया, आप: में स्वयं प्रविष्ट हुआ। उससे जो निर्माण हुआ उससे पहले ब्रह्मा निकले। ब्रह्मा और परमेष्ठी के आप: ने मिलकर सूर्य को उत्पन्न किया। यह ब्रह्मा ही मृत्यु लोक का स्रष्टा है। मायी महेश्वर अलग है, उसका स्वयंभू भिन्न है।
पानी में क्षार जब जुड़ेगा तब वह आप: कहलाता है। पानी सोम है, क्षार अग्नि है। तब वहां भृगु अंगिरा दोनों साथ आगे बढ़ेंगे। तब महलोक बनता है। भृगु-अंगिरा-अत्रि तीनों महलोक में होते हैं।
परमेष्ठी सर्वप्रथम स्वयंभू प्रजापति की परिक्रमा लगाता है। यह परिक्रमा लगाना कामप्रयज्ञ है। इससे प्रजापति की नवीन प्राण संस्था का उदय होता है। यह प्राणमय स्वयंभू योगमाया से घिरा है। पहले आपोमय स्वयंभू अथवा मायी स्वयंभू पृथक् तत्त्व है जो प्रथमज है और इसी से अनन्त ब्रह्माण्डों का उदय होता है। प्राणमय स्वयंभू से हमारे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है। यह बल्शेश्वर पुण्डीर कहलाता है।
पांच क्षरों की समष्टि से ही यज्ञ-''पांक्तो वै यज्ञ:' कहलाता है। प्रत्येक पदार्थ में पिण्ड और हृदय दो विभाग होते हैं। पिण्ड में अग्नि-सोमात्मक यज्ञ की प्रधानता रहती है। हृदय में ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र प्रतिष्ठित रहते हैं। पांचों क्षरों के रहने के बाद भी वस्तु एक ही कहलाती है। इसका कारण कूटस्थ अक्षर है। क्षर यज्ञ अक्षर के आधार पर ही प्रतिष्ठित है।
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अनेजदेकत् = कम्पनरहित किन्तु मन की गति से भी अधिक वेगवान; यही अव्यय है। ऐजत् गति तत्त्व है, अनेजत् स्थिति है।
क्रमश:
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Published on:
05 Aug 2023 03:16 pm
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