
Golden memory
हर युवा दिल की धड़कनों में एक सपना होता है-देश के लिए कुर्बान होने का, कुछ कर गुजरने का। इसी प्रकार प्रत्येक सैनिक के मन में एक तीव्र लालसा रहती है-युद्ध में भाग लेने की और विजयी होने की। सन् 1971 के भारत-पाक युद्ध ने मेरी दोनों कामनाएं पूर्ण कर दीं। तब मैं आदमपुर के वायुसेना स्टेशन पर यूनिट 101 में तैनात था। प्रथम ग्रुप का तकनीशियन था। युद्ध में मोर्चे पर रहा, बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने में भारत सफल रहा। इस युद्ध की सर्वाधिक रोमांचकारी घटना थी -तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी का जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को ढाका में प्रवेश का स्वयं आदेश देना और ऐसा हो जाना। क्या रोमांच था। आज भी तीन तमगे (मैडल्स) उस चिरजीवी युद्ध की स्मृतियों को बिखेरते रहते हैं।
तीन दिसम्बर, 1971को अचानक जन-जीवन शांत-मौन हो उठा। बार-बार बजते सायरनों की आवाज पर आंखें आकाश की ओर उठती। कौतुहल, तरह-तरह की चर्चाएं, पाकिस्तानी हमले का समाचार कौंध गया। दो ही स्क्वाड्रन थे, उस एयरबेस पर । दोनों में ही एसयू- 7 (सुखोय-7 ) रूसी लड़ाकू बमवर्षक विमान थे। उड़ान क्षेत्र मूल रूप से जंगल ही था, जहां बीच-बीच में हवाई जहाज रखे थे। युद्ध की घोषणा के साथ ही सारा क्षेत्र, आसपास का ग्रामीण क्षेत्र सब अंधकार में डूब गए थे। सबको तुरंत ड्यूटी पर जाना था।
हमले की शुरुआत पाकिस्तान ने राजस्थान और पाकिस्तान सीमा पर की थी। हमारा स्थान सीमा के करीब ही था अत: गतिविधियां भी बहुत तेज थीं। हवाईजहाज कितने प्यारे लग रहे थे-आज भी अंगुलियां थिरक जाती हैं। सारे वायुसैनिक किस प्रकार लौटने वाले पायलट का स्वागत करते थे- जैसे दूल्हा हो। उसका लौटना ही एक प्रकार का विजय उत्सव था। सारे गिले - शिकवे सिमट गए थे। जो पायलट स्वभाव के कारण कटे हुए थे, वे भी प्यारे लग रहे थे।
हवाईजहाज के लौटते ही सारे विभागों के वायुसैनिक अपने-अपने कार्यों में जुट जाते। सम्पूर्ण रूप से जांच होती, बंदूकें भरी जाती (गोलियों की लडिय़ां)-गोला-बारूद (बम) चढ़ाए जाते। तेल भी साथ-साथ भरता रहता। अंधकार में सारी गर्मजोशी और जज्बा मानो प्रकाश का कार्य कर रहा था। मेरा कार्य कॉकपिट में लगे उपकरणों (भिन्न-भिन्न प्रकार के मीटर्स, 'सूचक यंत्र' आदि) का निरीक्षण करना, ऑटो-पॉयलट जैसे यंत्रों के संकेतों का निरीक्षण आदि था। सभी त्वरित गति से चल रहे थे, मानो उड़ रहे हों। कब हवाईजहाज पुन: आक्रामक उड़ान के लिए तैयार हो जाता, पता ही नहीं चलता। हमारी कार्यशैली में भी वैसी ही कुछ आक्रामकता भरी थी। चारों ओर हवाईजहाज रोधी बंदूकों से बनी छतरियों का दृश्य भी किसी आतिशबाजी से कम नहीं था।
जहाज तैयार। खींचकर बंकर से बाहर निकाला और पायलट भीतर। क्या आत्मीयता भरी विदाई होती थी! कभी किसी संबंधी को फिर से ऐसी विदाई नहीं दी होगी। रोम-रोम पुलकित-हर एक का। सारे वायु सैनिक एक साथ विदा करते थे। साथ ही मन में प्रार्थना भी कि सुरक्षित लौटकर भी आएं। विजय का संदेश तो मानो भीतर छलक ही रहा था।
बैरक लगभग खाली थे। परिवारों में बच्चों को रोक पाना, अंधेरे में कार्य करना, हर एक बार सायरन पर बाहर खन्दकों में लेटना और लेटे-लेटे बन्दूकों के छतरीनुमा रोशन आकाश को डर और कौतुहल के मिश्रण में देखते रहना, बच्चों को चुप कराते रहना। मेरेे एक मित्र थे लक्ष्मण मूर्ति। क्रिप्टोग्राफर थे। तमिलनाडु के थे। जब भी कभी बैरक आना होता, उन्हीं के घर चला जाता था। एक अन्य मित्र भी साथ थे चन्द्रमौली। हम दोनों बारी-बारी से मूर्ति साहब के परिवार का
ध्यान रखते। श्रीमती मूर्ति और उनके बच्चे आज भी उसी आत्मीयता से मिलते हैं। कितने परिवार इस दौरान बहुत नजदीक आए-दर्द बांटने के लिए। वसुधैव कुटु्बकम् का छोटा सा अनुभव था।
बाहर से कोई सम्पर्क था नहीं। न टीवी, न ही मोबाइल। बस आकाशवाणी। हमारे यहां का नजारा युद्ध क्षेत्र जैसा नहीं था। गोलियां, टैंक, आक्रमण, बढ़त कुछ भी नहीं। एक काल्पनिक दृश्य होता था आंखों में।
कुछ लौटने वाले पायलट सुना देते थे। इस युद्ध की विशेषता थी कि यह विपरीत स्थानों और दिशाओं में लड़ा जा रहा था। पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान की सीमाओं पर। तो कभी छम्ब क्षेत्र की खबरें आतीं, तो कभी सिलहट की। पश्चिम में हम बहुत मारक स्थिति में ही रहे। लोंगेवाला युद्ध भी रोंगटे खड़े कर गया। छाछरो रेड में तो हमारे पैराट्रूपर्स लगभग 50 किलोमीटर तक भीतर घुस गए थे। लगा कि हम उनके साथ क्यों नहीं थे। इसी बीच गाजीपुर में साथ-साथ युद्ध चला। छह तारीख को जशोर जिला (बांग्लादेश) स्वतंत्र करा दिया गया। सिलहट में भी गोरखा दो किलोमीटर अन्दर पहुंच गए थे।
अगले ही दिन "अजगर अभियान" में नौसेना के बेड़े ने कराची बन्दरगाह नष्ट कर दिया। तेल भण्डारों को ध्वस्त कर दिया। एक दिन पश्चिम और एक दिन पूर्व की रणनीति कारगर सिद्ध हुई थी। हर रोज नई खुशखबरी।
पूर्व में मेघना नदी क्षेत्र पर कब्जा। पाक सेना ढाका की रक्षा के लिए ढाका की ओर भागने लगी। हमारी वायुसेना ने उनसे आगे जा कर और पीछे से थलसेना ने पाक सेना को ढाका नहीं पहुंचने दिया।
इस बीच युद्ध ने करवट भी बदली। अन्तरराष्ट्रीय शक्तियों ने घुसपैठ दिखाई। अमरीकी नौसेना का बेड़ा बंगाल की खाड़ी तक पहुंच गया। पीछे-पीछे रूस का जहाज भी आ धमका। अमरीकी जहाज को लौटना पड़ा। और, सोलह दिसम्बर को वह दिन आ पहुंचा जब जनरल अरोड़ा ढाका में प्रवेश कर गए। बांग्लादेश स्वतंत्र हो गया था। लगभग 93000 सैनिकों ने हमारी सेना के आगे समर्पण कर दिया।
क्या जश्न मना- सब उछल रहे थे। जो बिछुड़ गए उनके आगे नतमस्तक भी थे-समर्पण भाव से। पूरे युद्ध काल का अंधेरा छंट गया। एक नया सवेरा था, बांग्लादेश को मुक्त आकाश मिला। हमको भी अपने जीवन की कुछ सार्थकता का अहसास हुआ।
आज युद्ध के अथवा बांग्लादेश की स्वतंत्रता के पचास वर्ष पूरे हो चुके। इस स्वतंत्रता को पाने के लिए बांग्लादेश ने युद्ध नहीं किया। वह तो परतंत्रता को बनाए रखने के लिए लड़ा। अत: वहां कोई शहीद नहीं हुआ।
इस स्वतंत्रता का श्रेय पाकिस्तान को जाता है। जिसने भारत को छेड़ा। अकारण छेड़ा। आज तक छेड़ रहा है। भारत ने पिंजरे की खिड़की खोल दी। पंछी सदा के लिए उड़ गया। हम मसीहा बनकर रह गए। आज युद्ध और शांति के अर्थ कुछ और दिखाई पड़ रहे हैं। जीवन का स्वरूप भाईचारे में है, शांति में है। युद्ध मानवता का शत्रु है। प्रारब्ध के आगे सब गौण-मौन!
gulabkothari@epatrika.com
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