
sharir hi brahmand
जीवन स्वयं में मायाजाल है। हम बुद्धिमान लोग स्वयं को माया से भी होशियार मानकर जीने का यत्न करते रहते हैं। शास्त्र कहते हैं कि स्वयं को जान पाना लगभग असंभव है। अर्थात् सभी कर्म छोड़कर स्वयं को जानने निकलोगे, तब भी जान जाओगे, निश्चित नहीं है। ऐसा क्या रहस्य है मेरे बारे में जो मैं ही नहीं जान सकता। प्रश्न तो साधारण है, उत्तर असाधारण है। क्योंकि मैं वह नहीं हूं जो स्वयं को मानता/मानती हूं। न ही मेरे मन में प्रश्न उठते हैं कि मैं कौन हूं- क्यों और कहां से आया हूं।
मेरे जीवन के दो भाग हैं। एक दृश्य भाग शरीर है और दूसरा अदृश्य भाग आत्मा है। शरीर वाहन है, आत्मा चालक है, प्रारब्ध ईंधन है। जीवनयात्रा मार्ग है-मेरा, अर्थात् ब्रह्म का। मैं इस शरीर का उपयोग कर अगले शरीर में प्रवेश कर जाता हूं।
चलिए, उसी आम की गुठली को पुन: उदाहरण बनाते हैं। पेड़ बनने के लिए उसने अपने अस्तित्व का मोह छोड़ा। जमीन में गड़कर मृत्यु का वरण कर लिया। आत्मा (रस) और बल (माया) के विभूति संसर्ग में अमृत भाग शेष रहता है। बल भाग की मृत्यु हो जाती है। गुठली का शरीर भाग मर जाता है, प्राण पृथ्वी (माता) के माध्यम से नया शरीर धारण कर लेते हैं।
अंकुर फूटते ही गुठली का शरीर अर्थहीन हो गया। पेड़ बढ़ता रहा। नित नई टहनियां-पत्ते-मंजरी। और एक दिन देखा तो आम भी झूम रहा था। तब प्रश्न स्वाभाविक है कि जब गुठली मर गई तो इस पेड़ को बड़ा कौन कर रहा है। आम कैसे और कहां से आया? आम भी वैसा ही है जैसी गुठली थी। यही माया संसार है। धरती में प्रवेश कर गुठली ने अपना वाहन (शरीर) छोड़ा था। उसका आत्मा नए शरीर को धारण करके आगे बढ़ गया।
गुठली का शरीर भले ही समाप्त हो गया लेकिन उसके प्राण ही पेड़ के जीवन का आधार बने रहते हैं। मानव शरीर में भी कार्य तो माता-पिता के प्राण ही करते हैं। जैसे पिता के प्राण माता के शरीर में प्रवेश करके मेरे रूप में नया शरीर धारण कर चुके। कहावत है कि पिता ही पुत्र बनता है- पिता वै जायते पुत्रो। हां, वे स्वयं ५० वर्षों तक की आयुपर्यन्त निर्माण करते रहते हैं। गुठली केवल एक ही पेड़ लगा सकती है।
पिता में भी अपने पिता के 'बीज' का अंश ही आता है। इसी में ब्रह्म का निवास रहता है और पिता, प्रपिता आदि सात पीढिय़ों के अंश भी रहते हैं। पिता का वर्ण भी रहता है। माता के शरीर में बीज के अंश नहीं होते- पृथ्वी होती है। माता की भूमिका मूल में शरीर तक सीमित रहती है वहीं पिता, शरीर तथा आत्मा से भी जुड़ा है। माता गर्भकाल में शिशु का हर धरातल पर पोषण कर सकती है। कुछ भी बना सकती है। मां के पकाए घड़े को कोई बदल नहीं सकता। यह अलग बात है कि मां ने निर्माण कार्य बन्द ही कर दिया।
प्राणों को देवता कहते हैं। ये सूक्ष्म, अदृश्य तथा गतिमान होते हैं। शरीर का निर्माण शरीर से तथा पोषण भी शरीर से। इसीलिए हम मातृदेवो भव, पितृदेवो भव कहते हैं। माता और पिता की भूमिका में अन्तर है। ये प्राण सूक्ष्म शरीर रूप होते हैं। इसके केन्द्र में कारण शरीर प्रारब्ध और संचित कर्म का मानचित्र समेटे रहता है। यह कारण-सूक्ष्म शरीर रूप आत्मा ही तय करता है कि कौन-सी देह में जाना है और क्या उद्देश्य लेकर।
बीज भी एक रहस्यपूर्ण शब्द है। योनि कोई हो, बीज 'मैं' ही हूं। कीट-कृमि-पशु-देव-गंधर्व-मानव आप किसी भी योनि की बात करें। शरीर ८४ लाख तरह के और बीज वही-ब्रह्म। सम्पूर्ण सृष्टि का एक ही पिता और सृष्टि के रूप अनन्त। बीज धारण करने का स्थान भी एक- मह:लोक। बीजीपुरुष अव्यय पुरुष- कृष्ण है। कृष्ण कह रहे हैं-
''सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता।।'' गीता 14.4
सृष्टि के दो स्तर हैं-अमृत और मृत्यु। सूर्य (हृदय) के आगे अमृत लोक तथा सूर्य केन्द्र से नीचे मृत्यु लोक। अव्यय पुरुष अमृत सृष्टि का आलम्बन है। इसमें सम्मिलित अक्षर तथा क्षर पुरुष की कलाएं भी अमृत रूप हैं। मृत्यु लोक में अव्यय पुरुष तो वही होता है, किन्तु अक्षर और क्षर पुरुष की मत्र्य कलाएं भूत सृष्टि का, देह का निर्माण करते हैं। इसका अर्थ यह है कि देह में स्थूल शरीर का निर्माण अलग होता है और आत्मा का प्रवेश द्वार अलग होता है। स्थूल शरीर में पुरुष रेत (सोम) की आहुति स्त्री रज (अग्नि) में होती है। रेत जल रूप है। इसमें पृथ्वी तक के आठ स्तर बनते हैं, जिनका आरंभ मातरिश्वा वायु द्वारा बुद्बुद् रूप होता है। शरीर पिण्ड ही पृथ्वी रूप में तैयार होता है। यह निर्जीव सृष्टि है। इसमें जीवात्मा आकर निवास करता है, तब शरीर में हलचल शुरू होती है।
जीवात्मा चूंकि ब्रह्म का अंश है, अत: ब्रह्म के नियमों का ही पालन करता है। ब्रह्माण्ड में सात लोक तथा पृथ्वी के भीतर भी सात भुवन हैं। इनकी चौदह भुवन संज्ञा है। हमारे शरीर में भी सात चक्र तथा बाहर आभा मण्डल के सात धरातल हैं। 'यथाण्डे तथा ब्रह्माण्डे' के रूप में कृष्ण कहते हैं-
''मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।'' गीता 14.3
महद् ब्रह्म मेरी योनि है जहां मैं बीज का वपन करता हूं। सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति यहां से होती है।
यह सृष्टि भूत सृष्टि नहीं, अमृत सृष्टि है, चेतनायुक्त ईश्वर अंश की सृष्टि है। भौतिक शरीरों का चिन्तन यहां नहीं है। यहां जो कुछ स्रष्ट (उत्पन्न) होगा, वह अव्यय पुरुष (ब्रह्म) का ही अंशावतार होगा। यह भी सिद्धान्त है कि ब्रह्म कर्ता नहीं होता। इसको तो किसी भी लोक के भौतिक शरीर से जुड़ जाना है। कारण शरीर में संचित प्रारब्ध के अनुरूप शरीर का उपयोग करना है और अन्त में लौट जाना है। अपने एक अंश से सृष्टि को बढ़ाना है, शेष लौटकर लीन हो जाना है।
यह इस बात का प्रमाण भी है कि जीव का शरीर के साथ शाश्वत सम्बन्ध नहीं है। आत्मा शरीर के महद् लोक में प्रवेश करता है। यह सातों लोकों का केन्द्र रूप चौथा लोक है। यही अमृत-मत्र्य सृष्टियों का संगम स्थल भी है। ब्रह्म भी जब सृष्टि करता है, तब परात्पर-स्वयंभू-परमेष्ठी लोक के बाद महद् लोक से ही यात्रा शुरू करता है। एक शरीर से नए शरीर में जाने का द्वार भी महद् लोक ही है।
स्थूल देह प्रथम लोक है। स्त्री-पुरुष ही सोम-अग्नि पिण्ड होते हैं। द्वितीय स्तर पर पुन: स्वरूप बदल जाता है। पुरुष रेत सोम हो जाता है, स्त्री शुक्र (शोणित) अग्नि रूप धारण कर लेता है। सोम अग्नि में आहूत होता है। सोम रेत चूंकि अव्यय रेत है (बीज), अत: स्थूल द्रव्य रूप रेतस् में शुक्राणु रूप रहता है। मूल में पुरुष द्रव्य शुक्राणुओं का ही संरक्षक बनता है। शुक्राणु का देह अग्नि रूप है, इसका रेतस् भी सोम रूप ही है। इसको 'पुंभ्रूण' के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार स्त्री-भ्रूण को भी समझना चाहिए। यह महद् रूप चतुर्थ संस्था ही अव्यय ईश्वर की योनि बनती है। दोनों ही निराकार-प्राणरूप पदार्थ हैं। अत: यत् और जू (यजु:*) हैं। जू आग्नेय योनि है, यत् गतिमान आत्मा (पुरुष) है। इसी कारण सृष्टि भी पुरुष प्रधान ही है। इस संसर्ग से अमृत आत्मा का निर्माण होता है। यह आत्मा समय के साथ स्थूल पिण्ड से जुड़ता है। पिण्ड चेतन हो जाता है। इसमें लगभग तीन माह का काल व्यतीत हो जाता है। स्थूल शरीर में सारी अभिव्यक्तियां कारण शरीर से ही आती हैं।
* यजु: - यह शब्द यत् और जू से बना है। यत् का अर्थ है-गति। जू का अर्थ आकाश यानी स्थिति है।
क्रमश:
gulab.kothari@epatrika.com
Published on:
11 Dec 2021 09:20 am
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