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क्या हमने गरीबी-असमानता से निपटना छोड़ दिया

आज देश में राजनीति की जिस खास ‘संस्कृति’ पर बहस तेज है, उसकी शुरुआत बहुत पहले हो गई थी। 1967 में डीएमके के संस्थापक सीएन अन्नादुरई ने वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी चुनी जाती है तो लोगों को एक रुपए में 4.5 किलो चावल का बैग मिलेगा। उनके अभियान ने पार्टी को जीत दिलाई। विडंबना यह रही कि पार्टी वादा निभाने में नाकाम रही और नतीजा यह हुआ कि एक रुपए में एक किलो चावल देने की योजना भी समाप्त हो गई।

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जयपुर

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Patrika Desk

Sep 01, 2022

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मार्च 2021 में, तमिलनाडु के मदुरै दक्षिण विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार थुलम सरवनन ने जनता के सामने असाधारण चुनावी पेशकश की। मसलन, हर घर के लिए 1 करोड़ रुपए, घर की सफाई के लिए हर गृहिणी को एक रोबोट, नया कारोबार शुरू कर रहे युवाओं को एक करोड़ रुपए, हर घर-परिवार को कार खरीदने के लिए 20 लाख रुपए, चांद की 100 दिन की यात्रा, लोगों को सैर-सपाटे और मनोरंजन के लिए 300 फुट का कृत्रिम ग्लेशियर आदि। इन ‘मेगा’ वादों के बावजूद वह चुनाव हार गए। थुलम के वादे सत्ता में आने की होड़ में लगे प्रमुख राजनीतिक दलों के वादों से बहुत अलग नहीं कहे जा सकते। आज ऐसी चुनावी पेशकश के अलग-अलग संस्करण तेजी से चुनावी वास्तविकता के साथ जुड़ रहे हैं।
आज देश में राजनीति की जिस खास ‘संस्कृति’ पर बहस तेज है, उसकी शुरुआत बहुत पहले हो गई थी। 1967 में डीएमके के संस्थापक सीएन अन्नादुरई ने वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी चुनी जाती है तो लोगों को एक रुपए में 4.5 किलो चावल का बैग मिलेगा। उनके अभियान ने पार्टी को जीत दिलाई। विडंबना यह रही कि पार्टी वादा निभाने में नाकाम रही और नतीजा यह हुआ कि एक रुपए में एक किलो चावल देने की योजना भी समाप्त हो गई।