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हयग्रीव माधव मंदिर: जहां चढ़ाए चाहते हैं जीवित कछुए

जनवरी के इस ठंडे मौसम में, पूरे भारत में उत्सव की हवा चल रही है। उत्तर भारत में मकर संक्रांति, दक्षिण भारत में पोंगल और असम में बिहू ने माहौल को बदला है। इस हवा के साथ बहते हुए आज मैं आपको असम ले चलता हूं, जहां मैंने सबसे अनोखे मंदिरों में से एक देखा। कछुओं का एक मंदिर, जहां भगवान को असली कछुए चढ़ाए जाते हैं।

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Patrika Desk

Jan 24, 2023

हयग्रीव माधव मंदिर: जहां चढ़ाए चाहते हैं जीवित कछुए

हयग्रीव माधव मंदिर: जहां चढ़ाए चाहते हैं जीवित कछुए

शिवा यादव
अनसुनी कहानियां चुनता
और बुनता स्टोरीटेलर

जनवरी के इस ठंडे मौसम में, पूरे भारत में उत्सव की हवा चल रही है। उत्तर भारत में मकर संक्रांति, दक्षिण भारत में पोंगल और असम में बिहू ने माहौल को बदला है। इस हवा के साथ बहते हुए आज मैं आपको असम ले चलता हूं, जहां मैंने सबसे अनोखे मंदिरों में से एक देखा। कछुओं का एक मंदिर, जहां भगवान को असली कछुए चढ़ाए जाते हैं।
असम के गुवाहाटी के निकट स्थित हाजो तीर्थस्थलों वाला एक ऐतिहासिक शहर है। यह हिंदुओं ही नहीं मुस्लिमों और बौद्धों के लिए भी महत्त्वपूर्ण स्थल है। यहां के महत्त्वपूर्ण स्थलों में से एक है बहुत पुराना हयग्रीव माधव मंदिर। इस मंदिर के तालाब को माधव पुखुरी या विष्णु पुष्कर के नाम से जाना जाता है, जो कछुओं की कई दुर्लभ प्रजातियों का घर है। दिलचस्प बात यह है कि कछुओं की इन प्रजातियों में से कुछ को विलुप्त घोषित कर दिया गया था, लेकिन वे बहुतायत में मंदिर में पाए गए।
सवाल यह है कि ये 'विलुप्त' कछुए इस मंदिर में कहां से आए? यह जानने के लिए आइए, हम हजारों साल पीछे चलते हैं। हिंदू धर्म ग्रंथों में कूर्म अवतार का उल्लेख मिलता है। भगवान विष्णु का यह अवतार एक कछुआ था, जो समुद्र मंथन के दौरान मंदराचल पर्वत को संभालने में मददगार बना। तभी से मान्यता है कि भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए उन्हें कछुआ चढ़ाना चाहिए। इसके लिए, लोग कछुओं को जंगल से पकड़ते हैं और मंदिर के तालाबों में चढ़ाते हैं। यदि कोई लड़की यौवन की दहलीज तक पहुंचती है, या कुछ पारिवारिक मुद्दे सामने आते हैं, तो भी भक्त कछुओं को पकड़ते हैं और इन मंदिरों में चढ़ाते हैं। भक्तों की श्रद्धा अपनी जगह है, लेकिन वे इस बात को नहीं समझते कि इससे प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हो रही है। यह जानकर आश्चर्य होता है कि भारत में उपलब्ध कछुओं की कुल 29 प्रजातियों में से 14 से अधिक यहां पाई जाती हैं। सिर्फ कछुआ ही नहीं, बल्कि कई पक्षी, मछली और दूसरे जानवर भी यहां के मंदिरों में चढ़ाए जाते हैं। अगली बार जब आप असम में किसी मंदिर में जाएं, तो पास के तालाब की तलाश करें और आपको ऐसी दुर्लभ प्रजातियां मिल सकती हैं।
वाइल्ड लाइफ एसोसिएशन और कई अन्य एनजीओ इन जानवरों की रक्षा करने और उन्हें वापस जंगलों में छोडऩे के लिए काम कर रहे हैं। इन प्रयासों के कारण विलुप्त ब्लैक सॉफ्टशेल कछुए को गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों में वापस डाल दिया गया है!
मुझे उम्मीद है कि हम सभी इस मुद्दे को समझेंगे और इन छोटे जीवों के संरक्षण की दिशा में काम करने के लिए भी आगे आएंगे। भगवान हयग्रीव माधव हम सभी को आशीर्वाद दें!
अगली कहानी तक... खुशियां आलवेज।