
14 सितंबरः हिंदी दिवस पर विशेष
विजयदत्त श्रीधर
संस्थापक-संयोजक, सप्रे संग्रहालय, भोपाल
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हिंदी को राष्ट्रभाषा की लोकमान्यता स्वतंत्रता संग्राम में मिली। इस मान्यता की आधार भूमिका मुख्यत: हिंदीतर भाषा-भाषी महानायकों ने निभाई। इनमें समाज सुधारक और शिक्षाविद प्रमुख थे। आर्य समाज जैसी युगांतरकारी संस्था ने हिंदी के प्रसार के लिए असाधारण कार्य किया। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती स्वयं गुजराती भाषी थे और आरंभ में संस्कृत में प्रवचन किया करते थे। कोलकाता प्रवास में उन्हें ब्रह्म समाज के अग्रणी नेता और ‘सुलभ समाचार‘ के विद्वान संपादक बांग्ला भाषी केशवचंद्र सेन ने हिंदी भाषा में प्रवचन का परामर्श दिया। गुजराती भाषी महात्मा गांधी, बांग्ला भाषी रवीन्द्रनाथ टैगोर, तमिल भाषी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, मराठी भाषी लोकमान्य तिलक, मराठी विद्वान पं. केशव बामन पेठे, प्रभृति भारतीय मनीषियों ने हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार्य बनाने के लिए अपनी विद्वत्ता और तर्कसंगतता के साथ जो विचार देश के सामने रखे, यह उन्हीं का सुफल है कि हिंदी ‘भारत-भारती’ के रूप में मान्य हुई। यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि हिंदी साहित्य और पत्रकारिता को पंडित माधवराव सप्रे, बाबूराव विष्णु पराडकर, लक्ष्मणनारायण गर्दे, अमृतलाल चक्रवर्ती, प्रभृति अनेक विद्वानों ने समृद्ध किया।
भाषा का सवाल कितना महत्त्वपूर्ण है, इसे हम ‘प्रताप’ के मूर्धन्य संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी की इस टिप्पणी से समझ सकते हैं- ‘मुझे देश की आजादी और भाषा की आजादी में से किसी एक को चुनना पड़े तो मैं निस्संकोच भाषा की आजादी चुनूंगा। देश की आजादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह सकती है, लेकिन अगर भाषा आजाद हुई तो देश गुलाम नहीं रह सकता। गांधी ने 1917 में गुजरात शिक्षा सम्मेलन के अध्यक्षीय आसन से कहा था- ‘किसी देश की राष्ट्रभाषा वही भाषा हो सकती है, जो वहां की अधिकांश जनता बोलती हो। वह सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो। वह सरकारी कर्मचारियों एवं सरकारी कामकाज के लिए सुगम तथा सरल हो। जिसे सुगमता और सहजता से सीखा जा सकता हो। जिसे चुनते समय क्षणिक, अस्थायी और तात्कालिक हितों की उपेक्षा की जाए और जो संपूर्ण राष्ट्र की वाणी बनने की क्षमता रखती हो। बहुभाषी भारत में केवल हिंदी ही एक भाषा है, जिसमें ये सभी गुण पाए जाते हैं।’
टैगोर का मत कितना सारगर्भित है- ‘आधुनिक भारत की संस्कृति एक विकसित शतदल के समान है जिसका एक-एक दल, एक-एक प्रांतीय भाषा और उसकी साहित्य संस्कृति है। किसी एक के मिटा देने से उस कमल की शोभा नष्ट हो जाएगी। हम चाहते हैं कि भारत की सब प्रांतीय बोलियां जिनमें सुन्दर साहित्य की सृष्टि हुई है, अपने-अपने घर में रानी बनकर रहें और आधुनिक भाषाओं के हार के मध्य-मणि हिंदी भारत-भारती होकर विराजती रहे।’ बहुभाषी विद्वान संत विनोबा भावे भाषायी राजनीति के झगड़ों को समझते थे। उनकी टिप्पणी में इस बिन्दु की तार्किक व्याख्या हुई है- ‘हिंदी राष्ट्रभाषा के तौर पर स्वीकार की गई है, यह कोई जबरदस्ती नहीं है, बल्कि सारे देश ने इसे प्रेम से स्वीकार किया है। दक्षिण वालों के लिए इसमें डरने का कोई कारण नहीं है। इसमें उन्हें बहुत लाभ होने वाला है। अगर वे हिंदी सीखेंगे तो अपने विचारों का प्रचार सारे भारत में कर सकेंगे। उनके साहित्य में बहुत अच्छे-अच्छे विचार और कल्पनाएं हैं, वे सारे भारत में फैलनी चाहिए...।’
सत्तर के दशक में सामने आया त्रिभाषा सूत्र देश में इस तरह लागू किया जा सकता है- (1) प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम केवल मातृभाषा में हो। (2) हिंदी का पठन-पाठन पूरे देश में माध्यमिक विद्यालयों से विश्वविद्यालयों तक हो। (3) हिंदी भाषी राज्यों में स्नातक स्तर पर कोई एक अन्य भारतीय भाषा अनिवार्यत: पढ़ाई जाए। इसके लिए हर विश्वविद्यालय किसी एक भारतीय भाषा का चयन कर सकता है। (4) भारतीय भाषाओं वाले राज्यों में पहले स्थान पर उनकी अपनी भाषा हो और दूसरी भाषा के रूप में हिंदी का पठन-पाठन हो। (5) तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी, फ्रेंच, मेंडारिन (चीनी), जापानी, जर्मन, रूसी आदि भाषाओं को रखा जाए। इनमें से कोई एक भाषा थोपने का प्रावधान न हो। ज्ञान प्रवाह के लिए अकेले अंग्रेजी ही क्यों, सभी खिडक़ी-दरवाजे खुले रखे जाएं।
भारत में अंग्रेजी को अपनी भाषा मानने वाले एक प्रतिशत भी नहीं हैं। शासन-प्रशासन और आर्थिक सत्ता चलाने वाले तबके में ही अंग्रेजी का प्रभुत्व है। सत्ता का यह दुर्गुण होता है कि वह जन समाज के पास जाते हुए असहज रहती है। उसे शासक और शासित के बीच बड़ी खाई चाहिए। अंग्रेजी उसे सुरक्षा के टापू का आभास देती है। भारत में सारे भाषायी दुश्चक्र इसी वजह से रचे जाते हैं। इन दुश्चक्रों से निबटने के लिए विश्वसनीय और कारगर पहल का उत्तरदायित्व हिंदी भाषियों का है।
हमारी राय है कि किसी भी राज्य को केन्द्र सरकार से भेजे जाने वाले पत्रक मूलत: हिंदी में भेजे जाएं और उनका उस राज्य की भाषा में अनुवाद संलग्न किया जाए। जन साधारण की जानकारी के लिए जो सूचनाएं-नीतियां-कार्यक्रम-योजनाएं-नियम-कानून हैं, उनका प्रेषण-संप्रेषण अंग्रेजी में होने से जनता को क्या लाभ होगा, यह कभी किसी ने नहीं सोचा। 99 प्रतिशत भारतीयों के लिए सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रचलन बेमानी है, निरर्थक है। पर हिंदी और भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय-सामंजस्य का न होना अंग्रेजी परस्तों के लिए अभयारण्य बनाता है। इसी से अंग्रेजी की गुलामी का पट्टा अनंत हुआ जाता है। जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले हिंदी राज्य अन्य भारतीय भाषाओं वाले राज्यों के साथ भाषायी कार्य-व्यवहार शुरू करें। तब हिंदी को थोपने जैसे आक्षेप और आरोप स्वत: अनर्गल सिद्ध हो जाएंगे।
Published on:
14 Sept 2022 09:12 pm
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