
ऋतु सारस्वत
समाजशास्त्री और स्तंभकार
हाल ही देश की शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय खंड पीठ ने एक मामले में कहा कि किसी भी धर्म का पर्सनल लॉ बाल विवाह रोकथाम अधिनियम के आड़े नहीं आ सकता। न्यायालय ने कहा कि बाल विवाह बच्चों को आत्मनिर्णय, पसंद, स्वायत्तता, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार से वंचित करता है। शीर्ष अदालत के इस निर्णय का एक विशेष महत्त्व इस दृष्टिकोण से भी है कि इसमें बाल-वरों (लड़कों) की भी चर्चा की गई है। इसमें किंचित भी संदेह नहीं कि बाल विवाह न केवल बाल अधिकारों का हनन है अपितु बच्चों के जीवन पर घातक प्रहार भी है। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के अधिकारों को यह प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। अमूमन बाल विवाह के पीछे जिन कारणों की गिनती होती है उनमें गरीबी, अशिक्षा, परंपरागत रूढिय़ां और बच्चियों की सुरक्षा प्रमुख है।
जिन बच्चों को बाल विवाह की ओर धकेल दिया जाता है, वे जीवनपर्यंत निर्धनता और अशिक्षा के चक्र में फंसे रहने को विवश हो जाते हैं। 'बार्कले इकोनॉमिक रिव्यू' में प्रकाशित अध्ययन 'द इकोनॉमिक्स ऑफ चाइल्ड मैरिज' बताता है कि बाल विवाह के चलते शिक्षा छोडऩे की प्रवृत्ति लड़कियों के जीवन काल में बेहतर वेतन कमाने की संभावनाएं बाधित करती हैं। बाल विवाह आर्थिक संसाधन हासिल करने की उनकी क्षमता को कम करता है। इसके चलते वे अपनी हर आवश्यकता के लिए परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर हो जाती हैं। यह स्थिति न केवल उनके आत्मबल को तोड़ती है बल्कि उनके निर्णय लेने की शक्ति भी कम हो जाती है। अशिक्षित होने के कारण श्रम बाजार से लड़कियों की अनुपस्थिति निर्धनता को बनाए रखती है ।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि माता-पिता स्वयं अपने बच्चों को बाल विवाह के बंधन में बांधकर उनके जीवन में मुकिश्लें पैदा कर देते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार गर्भावस्था और प्रसव में जटिलताएं वैश्विक स्तर पर 15-19 वर्ष की लड़कियों में मृत्यु का प्रमुख कारण है। 15 वर्ष की आयु से पहले जन्म देने वाली लड़कियों में प्रसव के दौरान मौत की आशंका 20 वर्ष की लड़कियों की तुलना में पांच गुना अधिक होती है। बाल वधुएं गर्भावस्था से जुड़ी अन्य जटिलताओं के प्रति भी अधिक संवेदनशील होती हैं जिसके दीर्घकालिक परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। कम उम्र में गर्भ धारण करने से न केवल माताओं पर बल्कि नवजात शिशुओं पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। जब प्रश्न बाल विवाह का उत्पन्न होता है तो स्वत: ही मस्तिष्क में लड़कियों की छवि उभर जाती है परंतु यह दंश लड़कों के हिस्से में भी आता है और वह भी लड़कियों की भांति आयु से पूर्व परिपक्व होने की पीड़ा को झेलने के लिए विवश हो जाते हैं। 'जर्नल वल्नरेबल चिल्ड्रन एंड यूथ स्टडीज' में प्रकाशित शोध 'चाइल्ड मैरिज अमंग बॉयज- ए ग्लोबल ओवरव्यू ऑफ अवेलेबल डेटा' 82 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में घरेलू सर्वेक्षणों के आंकड़ों पर आधारित है। इसमेंं पाया गया कि 21 में से एक लड़के की शादी बचपन में ही हो जाती है।
यूनिसेफ ने 2019 में अपने एक अध्ययन में उद्घाटित किया कि दुनिया भर में लगभग 11.5 करोड़ लड़कों की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले हो गई थी। इन आंकड़ों के साथ यूनिसेफ ने यह भी चिंता जाहिर की कि ऐसे तथ्यों को निरंतर नजरअंदाज किया जाता रहा है।
यूनिसेफ की वरिष्ठ सांख्यिकी सलाहकार क्लाउडिया कैप्पा का मानना है कि 'यह अधिकारों का उल्लंघन है। इससे कम उम्र में लड़कों पर वयस्कों की जिम्मेदारी और भूमिका निभाने का बोझ पड़ता है।' निश्चित ही अपरिपक्व आयु में विवाह के अनचाहे उत्तरदायित्व से लड़के अपने संगी साथियों का साथ खो देते हैं और जीविकोपार्जन की जद्दोजहद में लगे जाते हैं। सामाजिक अलगाव तथा पारिवारिक दायित्वों का बोझ उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है। बाल विवाह एक ऐसा सामाजिक मुद्दा है जिसके लिए कानून और नीति निर्माण से कहीं अधिक सामाजिक क्रांति की आवश्यकता है।
Published on:
28 Oct 2024 09:08 pm
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