
प्रतीकात्मक चित्र
गिरीश्वर मिश्र
(पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)
भारतीय मन प्रकृति के साथ निकट का रिश्ता जोड़ कर जीना चाहता है। सृष्टि के अवयव के रूप में मनुष्य, पशु-पक्षी और वनस्पति जगत सबके बीच एक तरह की संगति की लय होती है और सारे तकनीकी हस्तक्षेपों के बावजूद आज भी फागुन आते न आते दुर्निवार ढंग से प्रकृति का मधुर राग वायु-मंडल और आसपास की दुनिया में दिखने लगता है। वसंत की घोषणा सुनाई पडऩे लगती है कि लो मैं आ गया हूं।
कालिदास की मानें तो वसंत में सब कुछ प्रिय हो जाता है द्ग सर्वं प्रिये चारुतरं वसन्ते! सचमुच वसंत की दस्तक होने के साथ ही नैसर्गिक उल्लास की व्यंजना कई-कई रूपों में प्रकट होने लगती है। जिस उद्यान में सुबह की सैर को जाता हूं, वहां कोयल की कूक सुनाई पडऩे लगी है, आम में बौर (आम्र-मंजरी) भी आते दिख रहे हैं, और किस्म-किस्म के रंग-बिरंगे फूल भी खिल उठे हैं। उद्यान में फूल पौधों के पास से गुजरते हुए महमहाती सुगंध से सुरभित हवा प्रीतिकर होने लगी है। लगता है मानो सभी फूल-पौधे मिल कर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं या कहें फागुन का महीना प्रकृति-पर्व मनाता है। सच तो यही है कि वसंत के मौसम में खिलंदड़ी प्रकृति खिलखिलाती हुई चपलता के साथ मुग्ध मन से रस, रंग और गंध का दिव्य उत्सव मनाती है। सारे तरु-पादप और लता-गुल्म अपने स्वभाव के अनुसार अंगड़ाई लेने लगते हैं। प्रकृति की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन्हें पूरी स्वतंत्रता मिली हुई है और सारी विविधता को स्वीकार करते हुए अपनी-अपनी गति से सभी वनस्पतियां आगे-पीछे अपने खास क्रम में फूल, फल और पत्तों आदि के साथ सज्जित हो कर सुशोभित होने लगते हैं। पुराना टूट कर झड़ जाता है और उसकी जगह नया आगे आता है। नए-पुराने का यह क्रम अनिवार्य और अटूट है। पुराने का यह दायित्व बनता है कि वह नए को तैयार करे और आगे आने का अवसर दे। यदि पुराना ही दुराग्रह के साथ रुका रहे तो ठहरा जल गन्दला हो कर विषैला हो जाता है। यह बात मानव समाज पर भी लागू होती है और उसकी विचार-सरणि पर भी। समाज में भी परिवर्तन स्वास्थ्यकर होता है और नए को प्रतिबंधित करना रुग्ण मानसिकता को ही बताता है। तब समाज या समुदाय की भी प्रगति ठहर जाती है। निराला जी के शब्दों में 'नव नभ के नव विहग वृन्द को नव पर नव स्वर' मिलना ही चाहिए।
भारतीय मानस में होली, फागुन और उमंग पर्यायवाची हो चुके हैं। वसंत नए के स्वागत के लिए उत्कंठा का परिचायक है और होली का उत्सव इसका साक्षात मूर्तिमान आकार है। यह पर्व रंग के बहाने उल्लसित मन को विश्रांति देता है। धुलण्डी की पिछली रात को 'सम्मत' जलाते हैं। पौराणिक कथानक में होलिका-दहन आततायी हिरण्यकश्यप के अहंकार के दहन और भक्त प्रह्लाद की उन्नति की गाथा से जुड़ा है। प्रतीक रूप में यह अतीत से मुक्ति और नए के आवाहन को भी द्योतित करता है। पूर्णिमा की रात को होलिका-दहन होता है जो विकारों को भस्म करने के लिए है। रसिया, फाग और बिहूगान गाए जाते हैं। सुबह होली मनाई जाती है और रंगों से भीगते-भिगाते हैं। रंग शुभ है और जीवन का द्योतक है, इस समझ के साथ होली के आयोजनों में करुणा, उत्साह और आनंद के भावों पर जोर रहता है।
होली के हास-परिहास भरे परिवेश में आपसी भेद मिटते हैं और लोग अपने खोल से बाहर निकल एक-दूसरे के करीब आते हैं। दूसरों के लिए खिलना, खुलना और थिरकना ताजगी देने वाला होता है। मन की ओवरहॉलिंग-सी होती है और लोग फिर ऊर्जा के साथ रिश्तों-नातों को जीने के लिए तैयार हो जाते हैं। होली के बहाने मतवाला वसंत रंग भरने, हंसने-हंसाने, चिढऩे-चिढ़ाने की हद में राम, शिव, और कृष्ण को भी सहजता से शामिल कर लेता है। यद्यपि अवध, काशी और वृंदावन में होली की अपनी खास विशेषताएं हैं। ढोल-मजीरे के साथ 'शिवशंकर खेलें फाग गौरा संग लिए', 'सदा आनंद रहै एहि द्वारे मोहन खेलें फाग', और 'होली खेलें अवध में रघुबीरा' की टेक हर जगह सुनाई पड़ती है। आनंद-वृत्ति की अभिव्यक्ति उन्मुक्त होने में ही होती है। तब लोक और लोकोत्तर सबके बीच की दीवारें टूटती हैं। व्यष्टि चित्त, समष्टि चित्त के साथ जुडऩे को तत्पर होता है और हम फिर नए हो जाते हैं।
Published on:
17 Mar 2022 02:37 pm
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