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होम्योपैथी को जनसुलभ बनाने के लिए करने होंगे प्रयास

— डॉ. ए.के. अरुण (होम्योपैथी विशेषज्ञ एवं जनस्वास्थ्य कार्यकर्ता)

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

Apr 10, 2025

यों तो प्रत्येक दिन खास होता है लेकिन होम्योपैथी के लिए दस अप्रेल का दिन बेहद खास है और इस वर्ष तो होम्योपैथी के आविष्कारक डॉ.सैमुएल हैनिमैन की 270वीं जयंती भी है। वैश्विक स्वास्थ्य की चुनौतियों के मद्देनजर होम्योपैथी में उपचार का दायरा अब उन रोगों तक पहुंच चुका है जिन्हें दुनिया में आज भी लाइलाज बताया जा रहा है। ऑटोइम्यून डिसऑर्डर, जीवनशैली के लाइलाज कहे जाने वाले रोग, मानसिक बीमारियां, चर्मरोग, जोड़ों के रोग, पेट संबंधी बीमारियों आदि में होम्योपैथी ने भरोसेमंद इलाज के कई नए आयाम जोड़ दिए हैं।

इन दिनों हम वैश्विक महामारियों और लाइलाज बीमारियों के दौर में जी रहे हैं। लगभग हर उम्र और वर्ग में जटिल बीमारियों का लाइलाज होना जहां चिंता की बात है वहीं होम्योपैथिक उपचार ने न केवल इसे सहज बनाया है बल्कि बेहद कम खर्च में इलाज को आम लोगों के लिए सुलभ कर दिया है। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही दुनियाभर में फैले कोरोना वायरस संक्रमण के दौर को याद कीजिए। उपचार के नाम पर पूरी दुनिया में अफरा तफरी थी। लोग परेशान थे और मर रहे थे। ऐसे में होम्योपैथी की रोगनिरोधी दवाओं ने बहुत काम किया। भारत में सरकारी और निजी तौर पर बड़ी तादाद में होम्योपैथी की रोग प्रतिरोधी दवा बांटी गई और उसका असर भी हुआ कि कोरोना संक्रमण काफी हद तक कम हो गया और लोग दहशत से बाहर आ गए थे।

गंभीर बीमारियों और महामारियों में होम्योपैथी की भूमिका को समझने के लिए जर्नल ऑफ हिस्ट्री ऑफ मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज की 1997 के अंक में दर्ज वर्ष 1832 एवं 1854 में यूरोप में फैले एशियाटिक कॉलेरा महामारी की स्थिति का अध्ययन करना चाहिए। उस समय के जाने-माने जनस्वास्थ्य वैज्ञानिक ने ब्रिटेन के किंग जॉर्ज (छठे) की मदद से रॉयल लंदन होम्योपैथी अस्पताल के चिकित्सकों की सेवाएं ली और लाखों लोगों को असमय मरने से बचा लिया था। इन दिनों वैश्विक स्तर पर होम्योपैथी खूब चर्चा में है।

विभिन्न लोगों एवं समूहों में आलोचनाओं के बाद भी होम्योपैथी की स्वीकार्यता बढ़ी ही है। वर्ष 2005 में लांसेट जर्नल ने अपने एक लेख में होम्योपैथी की वैज्ञानिकता और प्रभाविता पर सवाल उठाए थे। इसे प्लेसिबो से ज्यादा कुछ भी नहीं बताया था। लेकिन बाद में इस लेख पर अमरीका में होम्योपैथी सोसायटी ने विरोध जताया। डब्ल्यूएचओ ने भी 'ट्रेडिशनल मेडिसिन इन एशिया' नाम से एक मोनोग्राफ प्रकाशित कर होम्योपैथी एवं अन्य आयुष पद्धतियों की प्रासंगिकता को स्वीकार किया है। होम्योपैथी की स्वीकार्यता अब 140 देशों में है। आज आवश्यकता इस बात की है कि होम्योपैथी के लाभकारी गुणों को वैज्ञानिकता की कसौटी पर परख कर उसे जनसुलभ बनाया जाए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस के संदेश के रूप में 'स्वस्थ शुरुआत-आशापूर्ण भविष्य' की बात की है। संगठन भी मान रहा है कि सभी तार्किक एवं वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियों का समन्वय करके ही दुनिया को रोगमुक्त करने की दिशा में सोचा जा सकता है। हम होम्योपैथी की प्रासंगिकता और वैज्ञानिकता को लेकर नियमित चर्चा करें, इसकी कमियों को दूर करने का प्रयास करें साथ ही इसे जनसुलभ बनने के लिए भी पहल करें।