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आखिर हम बॉलीवुड का बहिष्कार कैसे कर सकते हैं

समय के साथ नेपोटिज्म की चर्चा तो कमजोर पड़ गई, लेकिन बायकॉट बॉलीवुड का हैशटैग अब भी सुर्खियों में है। 2022 की बात करें, तो इस वर्ष अधिकांश हिंदी फिल्में रिलीज के पहले ही बायकॉट बॉलीवुड के साथ ट्रेंड करती रहीं, 'सम्राट पृथ्वीराज ' ,'रक्षाबंधन ' से लेकर 'लालसिंह चड्ढा ' और 'लाइगर ' तक।

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Patrika Desk

Sep 04, 2022

आखिर हम बॉलीवुड का बहिष्कार कैसे कर सकते हैं

आखिर हम बॉलीवुड का बहिष्कार कैसे कर सकते हैं

विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक

बॉलीवुड बायकॉट यानी बहिष्कार की शुरुआत 2020 में 'सड़क २ ' के ट्रेलर के डिस्लाइक से मानी जा सकती है। आंकड़ों के अनुसार 1980 की सुपरहिट फिल्म के सीक्वल के रूप में बनी महेश भट्ट की इस फिल्म के ट्रेलर को 8 दिन में एक करोड़ से अधिक डिस्लाइक मिले थे। जाहिर है रिलीज होने के बाद फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हुई। ओटीटी पर भी दर्शकों ने इस फिल्म से परहेज किया। बॉलीवुड बायकॉट की इस शुरुआत की वजह उस समय सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमयी मौत और उसके बहाने बॉलीवुड में नेपोटिज्म के प्रति आम लोगों की नाराजगी थी। करण जौहर और शाहरुख खान जैसे लोगों ने नेपोटिज्म के पक्ष में मुखर होकर आमजन के विरोध को और भी भड़काने का काम किया। इसकी भेंट धर्मा प्रोडक्शन की होने के कारण 'गुंजन सक्सेना-द करगिल गर्लÓ जैसी फिल्म भी चढ़ गई। इसी धर्मा प्रोडक्शन के बैनर से 2021 में जब 'शेरशाह ' आती है, तो बगैर किसी सितारे के भी दर्शक उसका स्वागत करते हैं। इसके बायकॉट की चर्चा 'शेरशाह ' के जयगान में डूब जाती है। वास्तव में 'बायकॉट बॉलीवुड ' का विश्लेषण उस समय भी मुश्किल था और आज भी है।
समय के साथ नेपोटिज्म की चर्चा तो कमजोर पड़ गई, लेकिन बायकॉट बॉलीवुड का हैशटैग अब भी सुर्खियों में है। 2022 की बात करें, तो इस वर्ष अधिकांश हिंदी फिल्में रिलीज के पहले ही बायकॉट बॉलीवुड के साथ ट्रेंड करती रहीं, 'सम्राट पृथ्वीराज ' ,'रक्षाबंधन ' से लेकर 'लालसिंह चड्ढा ' और 'लाइगर ' तक। सवाल है क्या सिनेमा जैसे माध्यम में बायकॉट काम करता है। फिर 'शेरशाह ' की सफलता क्या कहती है? कंगना राणावत की 'धाकड़ ' बगैर किसी बायकॉट के तीसरे दिन सिनेमाघरों से उतर गई। दक्षिण से आई 'आर आर आर ' और 'के जी एफ ' को जहां हिंदी दर्शकों ने गले लगाया, प्रभाष की 'राधेश्याम ' जैसी बड़े बजट की फिल्म बगैर किसी बायकॉट के फ्लॉप हो गई। इसका यह मतलब नहीं कि बायकॉट की मुहिम काम नहीं करती। बॉलीवुड फिल्में हाल के वर्षों में स्टार के कंधों के सहारे इनीशियल,यानी वीकेंड कलेक्शन पर आश्रित हो गई थीं। बायकॉट की मुहिम ने इस धारणा को तोडऩे में मदद की। यदि कंटेंट 'भूलभुलैया 2 ' और 'गंगूबाई ' जैसा होगा तो दर्शक उसे खारिज नहीं करते, लेकिन 'रक्षाबंधनÓ के नाम पर आप बहनों और रिश्तों का मजाक उड़ा रहे हो, तो फिल्म को कोई अक्षय कुमार भी नहीं बचा सकता। सीधी सी बात कि बायकॉट की मुहिम के कारण सितारों को जमीन पर उतरना पड़ा, जो निश्चित रूप से बॉलीवुड के भविष्य के लिए बेहतर माना जा सकता है।
वास्तव में 'बायकॉट बॉलीवुड ' शब्द ही अपने आपमें भ्रामक है। हम जब 'कश्मीर फाइल्स ' और 'ताना जी ' के साथ खड़े होते हैं, तो बॉलीवुड के बायकॉट की बात ही बेमानी हो जाती है। बॉलीवुड का मतलब अक्षय कुमार, आमिर खान भर नहीं हैं। दादा साहब फाल्के, विजय भट्ट, सोहराब मोदी, विमल राय, गुरुदत्त, देवानंद, राजकपूर की विरासत इसी बॉलीवुड के साथ जुड़ी है। बॉलीवुड का मतलब सिर्फ 'गैंग आफ वासेपुर ' ही नहीं, 'सती अनसुईया ' और 'हिन्दुस्तान की कसम ' भी है, अनुराग कश्यप ही नहीं, ओम राउत भी है। व्यक्ति बॉलीवुड का पर्याय नहीं हो सकता, हम व्यक्ति के विरोध-बायकॉट के लिए स्वतंत्र हैं। बॉलीवुड तो हमारा भी है, हमारी पहचान है बॉलीवुड। हम इसका बायकॉट कैसे कर सकते हैं?