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गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से और कितनी दूर हम

शिक्षा नीति के बीते चार साल हमें आत्म-अवलोकन करने का एक अवसर देते हैं, जहां हम यह विचार करें कि वैज्ञानिक चेतना और आलोचनात्मक चिंतन के मूलगामी विचार के बरक्स हम कहीं एक ऐसी पीढ़ी का तो निर्माण नहीं कर रहे जो भ्रमित, मूक और अनुगमन करने वाली हो?

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डॉ. संजय शर्मा
प्राध्यापक, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर
इक्कीसवीं सदी की पहली शिक्षा नीति के चार साल आज २९ जुलाई को पूरे हो रहे हैं। किसी भी बहु-अपेक्षीय दस्तावेज का मूल्यांकन करने के लिए यह अवधि अनुकूल नहीं मानी जानी चाहिए किन्तु क्रियान्वयन के संदर्भ में निहितार्थ, सूत्र और मार्ग से दिशा और दशा का अनुमान अवश्य किया जा सकता है । अपने कलेवर, चिंताओं और संस्तुतियों में निस्संदेह यह शिक्षा नीति भारतीय जनमानस और संस्कृति में व्याप्त औपनिवेशिक मानसिक जड़ताओं को तोडऩे की जिजीविषा का व्यावहारिक संकल्प-पत्र है, जिसे एक प्रोजेक्ट ऑफ अंडरस्टैंडिंग के रूप में कार्यरूप दिया जाना प्रस्तावित था। बीते चार सालों में सत्ता प्रतिष्ठानों से अभिप्रेरित कई अभियानों, योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से इस शिक्षा नीति को कार्यरूप में परिणत करने की दिशा में प्रयास किए गए हैं।
यह विडम्बना ही है कि इन सभी प्रयासों में नीति की मूल मंशा को 'समझने' की बजाय उसको 'समझाने' का प्रयास ही हावी रहा है। गौरतलब है कि वैचारिक तौर पर जिस औपनिवेशिक मानसिकता के प्रतिकार में यह शिक्षा नीति खरी दिखाई पड़ती है, बिना समझे, समझाने की जल्दबाजी में, यह अपने क्रियान्वयन में उन्हीं औपनिवेशिक संरचनाओं, पद्धतियों और प्रारूपों का सहारा ले रही है। मसलन, शिक्षा नीति जिस शिक्षक को सम्पूर्ण शैक्षिक बदलाव के सक्रिय नेतृत्वकर्ता के रूप में चिह्नित करती है, उसकी क्षमता और निष्ठा पर अविश्वास करके उसे ही इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में केवल अनुसरणकर्ता बना दिया जा रहा है। शिक्षा नीति निर्माताओं ने शिक्षा को एक ऐसे लोकतांत्रिक मूल्य के तौर पर संवर्धित किया है, जो विद्यमान गैर-बराबरी और विषमताओं को न केवल दूर करे बल्कि सामाजिक भागीदारी और समावेशन के एक सशक्त औजार के रूप में कार्यशील भी हो। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मूल पाठ विद्यालयी शिक्षा को इस रूप में रेखांकित करता है कि यह विद्यार्थियों को इस तरह से पोषित करे कि वे संविधान द्वारा परिकल्पित एक समतामूलक, समावेशी और बहुलतावादी समाज के निर्माण के लिए संलग्न, उत्पादक और योगदान देने वाले नागरिक बन सकें। मुश्किल यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से संदर्भित शिक्षायी नवाचार और प्रयोग शिक्षा की इस मूल भावना से भटकते दिखाई देते हैं। उदाहरण के तौर पर, पीएमश्री विद्यालयों की बुनियाद ही विभाजनकारी, बहुपरती और पूंजीवादी निजी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने का एक संगठित सरकारी प्रयास है। 21वीं सदी में जहां शिक्षा नीति का लक्ष्य देश के सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण, मूल्य आधारित और समतामूलक शिक्षा से जोडऩा था, वहीं दूसरी ओर पीएमश्री नवाचार में देश के केवल 14,500 सरकारी विद्यालयों के 20 लाख बच्चे ही शामिल होंगे जबकि देश में लगभग 12 लाख सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों में 15 करोड़ से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया है कि बेहतर शिक्षा के लिए वार्षिक बजट में 6 प्रतिशत का आवंटन सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है, किन्तु क्रियान्वयन के स्तर पर 2024 के शिक्षा बजट को देखें तो यह 3 प्रतिशत है। ऐसे में यह सवाल उचित है कि क्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने की संवैधानिक और नीतिगत प्रतिबद्धता भारत के भावी नागरिकों के लिए दिवास्वप्न ही बनी रहेगी?
हालिया वर्षों में शिक्षा संस्थानों में मौजूद 'संरचनात्मक जड़ता, बौद्धिक पदानुक्रम एवं सीखने की संस्कृति' का अभाव और भी गहरा गया है, जिसे प्रत्यक्ष तौर पर शिक्षा संस्थानों में बढ़ती 'प्रवचन और सवाल न पूछने की संस्कृति' के रूप में समझा जा सकता है। इस संस्कृति ने ज्ञान केन्द्रों में बहसों, विमर्शों और चिंतन की ज्ञान मीमांसीय संरचनाओं एवं लोकतांत्रिक पद्धतियों को लगातार कमजोर किया है। हालत यह है कि कक्षा में क्या पढऩा और कैसे पढ़ाना है, अब यह विमर्श भी शिक्षकों और विद्यार्थियों के बजाय केन्द्रीय निकायों के मुखियाओं के द्वारा सुनिश्चित होने लगा है। निस्संदेह इस तरह का बाह्य हस्तक्षेप ज्ञान-निर्मिति की सृजनात्मक एवं स्वाभाविक प्रक्रिया को न केवल कमजोर बनाता है बल्कि शिक्षक को सीखने-सिखाने और चिंतन करने के अवसर से भी वंचित कर देता है।
महात्मा गांधी के अनुसार, शिक्षा का अभीष्ट गैर-जरूरी जानकारी इकट्ठा करना और महज कुछ विदेशी भाषा सीखना नहीं है, बल्कि व्यक्ति के जीवन और समाज को बदल सके उस चेतना का विकास करना है। शिक्षा नीति के बीते चार साल हमें आत्म-अवलोकन करने का एक अवसर देते हैं, जहां हम यह विचार करें कि वैज्ञानिक चेतना और आलोचनात्मक चिंतन के मूलगामी विचार के बरक्स हम कहीं एक ऐसी पीढ़ी का तो निर्माण नहीं कर रहे जो भ्रमित, मूक और अनुगमन करने वाली हो? जो रंग-रूप, पहनावे और बोलने में भारतीय सनातन मूल्यों का आभास तो दे किन्तु अपने चिंतन, कार्य व्यवहार और आकांक्षाओं में पूंजीवादी, हिंसक और मशीनी हो? विश्वस्तरीय गुणात्मक शैक्षिक मानकों के अभाव से जूझ रहे भारतीय अकादमिक जगत के लिए आत्म-चिंतन का यह एक सुअवसर है, ताकि सम्पूर्ण कलेवर मसलन संरचना, प्रक्रिया, विनियम, पाठ्यक्रम, अनुसंधान, संसाधन आदि को नए अर्थ-संदर्भों में पुनर्संरचित करते हुए और अधिक प्रासंगिक बनाया जा सके।