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कैदियों की रिहाई और राज्यपाल

ध्यान दें कि सीआरपीसी के तहत राज्य सरकार को सजा कम करने के सीमित अधिकार दिए गए हैं, जबकि संविधान में राज्यपाल को अनुच्छेद 161 में प्राप्त क्षमादान की शक्तियां असीमित हैं।

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Sunil Sharma

Sep 14, 2018

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- केपी सिंह, लेखक और अधिकारी

तमिलनाडु मंत्रिमंडल ने राज्यपाल से सिफारिश की है कि वे संविधान के अनुच्छेद 161 के अंतर्गत उन्हें प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने का आदेश जारी करें। संविधान के अनुच्छेद 161 में राज्यपाल को अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी कैदी को क्षमादान दे सकते हैं अथवा उसकी सजा को कम कर सकते हैं।

याद करें कि सुप्रीम कोर्ट ने राजीव गांधी के हत्यारों की मृत्युदंड की सजा इस आधार पर पहले ही उम्रकैद में परिवर्तित कर दी थी कि मृत्युदंड की सजा को क्रियान्वित करने में हुई देरी से उनके जीने के अधिकार की अवहेलना हुई है। तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने परिवर्तित उम्रकैद की सजा को व्यतीत हुआ मानकर दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 432/433 के प्रावधानों के अनुसार हत्यारों को रिहा करने का आदेश जारी कर दिया। धारा 435 के अनुपालन में वह आदेश केंद्र सरकार की सहमति के लिए भेज दिया। इस प्रकार के आदेश पर उन मामलों में केंद्र सरकार की सहमति जरूरी होती है, जिनका अनुसंधान केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआइ) ने किया हो।

केंद्र सरकार ने तमिलनाडु सरकार के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और उस पर स्थगन आदेश ले लिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को आगे परीक्षण के लिए पांच जजों की संविधान पीठ को दिया। संविधान पीठ ने निर्णय किया कि ऐसे मामलों में केंद्र सरकार की ‘सहमति’ से अभिप्राय है ‘अनुमति’। संविधान पीठ की व्यवस्था के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के आदेश को न्यायसंगत न मानते हुए एक सप्ताह पहले केंद्र सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था। इस प्रकार राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई रुक गई थी। परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में यह भी कहा था कि उनके उस आदेश से राज्यपाल को अनुच्छेद 161 में दिए गए अधिकारों पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। अब महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या राज्यपाल मंत्रिमंडल की सिफारिश मानने को बाध्य हैं, अथवा नहीं?

इस प्रश्न का उत्तर खुद सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने यूएन राव बनाम इंदिरा गांधी मामले में तथा एक अन्य संविधान पीठ ने माड़ुराम बनाम भारत सरकार मामले में दे दिया था। दोनों संविधान पीठों ने व्यवस्था दी कि राष्ट्रपति और राज्यपाल क्षमादान से जुड़े मामले स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि मंत्रिमंडल की सिफारिश के आधार पर ही निपटा सकते हैं। इन व्यवस्थाओं के अनुसार राज्यपाल तमिलनाडु मंत्रिमंडल की सिफारिश मानने के लिए बाध्य हैं। परंतु अनुच्छेद 163(1) के अनुसार राज्यपाल अपनी कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिमंडल की सिफारिश के आधार पर करेंगे।

इसी अनुच्छेद में आगे कहा गया है कि अपने विवेकाधीन मामलों में राज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह के बिना भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। विवेकाधीन मामलों में राज्यपाल मंत्रिमंडल की सिफारिश मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। अनुच्छेद 163(2) में स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल स्वयं यह निर्धारित करने में सक्षम हैं कि कौन-सा विषय उनका विवेकाधीन मामला है और कौन-सा नहीं। यदि राज्यपाल कोई मामला अपना विवेकाधीन मामला मान लेते हैं तो अनुच्छेद 163(2) के तहत इस पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है।

यहां उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 163(2) में दिया गया विशेषाधिकार राज्यपाल को ही उपलब्ध है, राष्ट्रपति को नहीं। राष्ट्रपति का विवेक सदैव केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह का मोहताज है। अर्थात राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सिफारिश के अनुसार ही अपनी कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग करेंगे।

राज्यपाल को दिए गए इस विशेषाधिकार के पीछे बहुत बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक समझ-बूझ है। राज्यपाल प्रदेश की सरकार में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि की भूमिका निभाते हैं। यदि लगे कि राज्य सरकार कोई ऐसा निर्णय लेती है जो राष्ट्रीय हित में नहीं, तो राज्यपाल, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के नाते, राज्य सरकार के उन फैसलों पर असहमति की मुहर लगाकर उन्हें निरस्त कर सकते हैं। इसीलिए सरकार के प्रमुख के रूप में राज्यपाल को राष्ट्रपति से अधिक शक्तियां दी गई हैं। राष्ट्रपति को ऐसी शक्तियां नहीं दी गई हैं, तो इसलिए कि वे एक तानाशाह की भूमिका में न जा सकें।

इस संबंध में दो अन्य पहलू भी देखे जाने चाहिए। प्रशासनिक मर्यादा का तकाजा है कि जो निर्णय आपको प्रत्यक्ष रूप से लेने से रोका गया है, वह आप परोक्ष रूप से भी न लें। जब राज्य सरकार को राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने से रोका जा चुका है, तो वही रिहाई राज्यपाल के माध्यम से करवाने की अवधारणा कैसे उचित ठहराई जा सकती है? ध्यान दें कि सीआरपीसी के तहत राज्य सरकार को सजा कम करने के सीमित अधिकार दिए गए हैं, जबकि राज्यपाल को अनुच्छेद 161 में प्राप्त क्षमादान की शक्तियां असीमित हैं। संविधान निर्माताओं की यह मंशा तो कतई न रही होगी कि राज्य सरकार को राज्यपाल के माध्यम से असीमित शक्तियां परोक्ष रूप से सौंप दी जाएं? अगर ऐसा होता तो ये असीमित शक्तियां राज्य सरकार को संविधान में प्रत्यक्ष रूप से भी दी जा सकती थीं।

जो हो, यह देखना रोचक होगा कि तमिलनाडु के राज्यपाल इस मामले में संविधान के प्रावधानों को कैसे देखते हैं, उसकी क्या व्याख्या करते हैं।