कसम पैसे की। यह पैसा भी क्या जानदार चीज है। जिसके पास होता है वह भी ससुरा परेशान रहता है और जिसके पास नहीं होता वह भी दुखी रहता है। पैसे की महिमा आज से नहीं तब से गायी जा रही है जब प्यह इस दुनिया में था ही नहीं। तब लोग बेचैन रहते थे तो किसी शातिर ने पैसे का आविष्कार कर दिया। पैसे और दारू को हम दुनिया के सबसे बड़े आविष्कारों में मानते हैं। हालांकि कुछ नासमझ लोग यह भी कहते हैं कि आग और पहिया सबसे बड़े आविष्कार हैं। लेकिन हम उनसे कभी भी सहमत नहीं हो सकते।
क्योंकि अगर पैसा न होता तो आप न आग यानी गैस का सिलेन्डर और न ही पहिया यानी मोटरकार खरीद सकते हैं। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि पैसा सर चढ़कर बोलता है। सही बात है जिस आदमी के पास पैसा आ जाता है उसके एक नहीं सत्तर मुंह हो जाते हैं। जिस आदमी को चटनी चाटने तक का शऊर नहीं होता, वह सुबह-सुबह मुर्गे की और शामढलने के बाद बकरे की टांग चिंचोड़ने लगता है।
जिसने कभी जलजीरा नहीं पिया होता वह दिन में बीयर और रात को महंगी इंगलिश व्हिस्की के पैग चढ़ाने लगता है। इसी को कहते हैं कि पैसा बोलता है। हमारे नाना के दोस्त शायर जनाब नजीर नाना ने पैसे को लेकर कमाल की नज्म कही है। नजीर साहब कहते हैं- पैसा ही रंग रूप है, पैसा ही माल है, पैसा न हो तो आदमी चरखे की माल है। एक बार रास्ते में हमें अकस्मात पैसा मिल गया। हमने चापलूसी करते हुए उससे पूछा- पैसा जी! आप किसके हैं? पैसे ने निहायत हेकड़ी से जवाब दिया- अरे गधे! मैं अगर तुम्हारे पास हूं तो तुम्हारा हूं।
अगर तुम्हारे पास नहीं हूं तो तुम्हारा नहीं हूं। मैं तुम्हारे पास हूं तो सब तुम्हारे हैं। पैसे के इस पहेलीनुमा जवाब को समझने के लिए हमें दो मिनट तो लगे पर पैसे का सत्य समझते ही हमारे मुंह से निकला- वाह पैसे ताऊ। तुम तो कमाल की चीज हो। इस उत्तर के बाद हमारे मस्तिष्क का कीड़ा एक बार फिर कुलबुलाया और हमने पूछा- अच्छा जी! क्या आदमी मरने के बाद भी आने पैसे को ऊपर ले जा सकता है।
हमने सोचा कि इस शाश्वत सत्य को जानते ही यह घमण्ड से फूला पैसा हवा निकले गुब्बारे की तरह लस्त पस्त हो जाएगा लेकिन पैसे ने ढिठाई के साथ मुस्कुराते हुए कहा- अरे बुद्धू मैं पैसा हूं और तुम मुझे मरने के बाद अपने साथ कहीं नहीं ले जा सकते लेकिन जीते जी अगर मैं तुम्हारे पास हूं तो मैं तुम्हें बहुत ऊपर तक ले जा सकता हूं।
सच कहें साहब। हमारे शाश्वत सत्य को पैसे ने अपने कटु सत्य से ऐसा धोया कि हम चुपचाप खड़े-खड़े पैसे की महिमा में रुबाइयां गाने लगे। हमने आखिरी सवाल पूछा- पैसे भाई! क्या तुम्हें कोई किसी तरह जीत भी सकता है? पैसे ने व्यंग्य भरी हंसी के साथ कहा- तेरे जैसे लकड़बग्घे तो मुझसे कभी जीत नहीं सकते। हां कबीर जैसे फक्कड़ों को मैं कभी नहीं हरा सका।
राही