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Patrika Opinion: बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय

पाकिस्तान का सियासी इतिहास देखें तो कमोबेश सभी शासन प्रमुखों का कार्यकाल किसी न किसी विवाद से जुड़ा रहा है। जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर यूसुफ रजा गिलानी, बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ तक प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटने के बाद जेल यात्रा कर चुके हैं।

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Patrika Desk

May 09, 2023

Patrika Opinion: बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय

Patrika Opinion: बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की गिरफ्तारी पर शायद ही किसी को अचरज हो। सत्ता पाने के लिए सेना का सहारा लेने और बाद में इसी सेना के जरिए सत्ता से बेदखली के उदाहरण पाकिस्तान में नए नहीं हैं। साथ ही यह कोई पहली बार भी नहीं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहे किसी नेता की सत्ता से बेदखली के बाद गिरफ्तारी की नौबत आई हो। पाकिस्तान का सियासी इतिहास देखें तो कमोबेश सभी शासन प्रमुखों का कार्यकाल किसी न किसी विवाद से जुड़ा रहा है। जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर यूसुफ रजा गिलानी, बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ तक प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटने के बाद जेल यात्रा कर चुके हैं।

एक तथ्य यह भी है कि इमरान खान ही नहीं बल्कि पूर्ववर्ती दूसरे प्रधानमंत्री भी पाकिस्तान में सेना की कृपादृष्टि तक ही सत्ता में रह पाए हैं। यह भी साफ नजर आता है कि वहां शासन की असल बागडोर सेना के पास ही रहती है। इसीलिए जब भी कोई नेता सेना के खिलाफ होता है तो उसका जेल जाना तय हो जाता है। इमरान खान, पाकिस्तान की सेना और वहां की खुफिया एजेंसी पर जिस तरह से सवाल उठा रहे थे तब से ही सेना के लिए आंख की किरकिरी बने हुए थे।
पिछले दिनों ही इमरान खान ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ के एक अधिकारी उनकी हत्या कराने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बाद पाकिस्तानी सेना की ओर से भी इमरान को फटकार लगाई गई थी। लेकिन इतना साफ है कि पाकिस्तानी हुक्मरान सेना की कठपुतली मात्र ही बने हुए हैं। आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, महंगाई का सामना कर रहे पाकिस्तान में लोकतंत्र का तो महज मुखौटा ही होता है। वह भी इसलिए ताकि इसी लोकतंत्र की दुहाई देकर वह विश्व समुदाय से तमाम तरह की आर्थिक व सैन्य मदद हासिल करता रहे। दुनिया इसे बखूबी जानती है कि आतंककारियों को आश्रय देने व आतंक का पोषण करने में पाकिस्तान सबसे आगे रहा है। यह सब भी सत्ता को अपने इशारे पर नचाने वाली सेना की सहमति के बिना संभव नहीं है।

इमरान के समर्थक भले ही अपने नेता की गिरफ्तारी को बदले की भावना से की गई कार्रवाई बता रहे हैं और उनके विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गए हैं, पर नतीजा क्या होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिर भी पाक हुक्मरानों को यह समझना ही चाहिए कि बबूल का पेड़ बोने वालों को आम का स्वाद सपने में भी नसीब नहीं हो सकता।